अंग्रेजों के इस कानून को मत हटाइये
समलैंगिकता का समर्थन करने वालों के लिए यह एक बड़ी एवं सुखद घटना है कि भारत की न्याययिक व्यवस्था ने अप्राकृतिक यौन संबधों पर कानून की मोहर लगा दी है। अब शायद भारत सरकार को भी इसके आड़े आने वाली कानूनी अड़चनों को दूर करने में कुछ राहत मिल सकती है। अंग्रेजी शासन के दौरान 1860 में धारा 377 को लागू कर ऐसे किसी भी संबध को अनैतिक एवं गैर कानूनी घोषित कर दिया था। आश्चर्य देखिए कि अंग्रेजों के बनाये बहुत सारे कानूनों से हम आज भी पीछा नहीं छुड़ाना चाहते लेकिन जिस एक कानून की वजह से भारत में यौन भ्रष्टाचार पर कानूनी रोक लगी हुई थी उसे दबाव डालकर खत्म करवाने की कोशिश हो रही है.
भारत में चोरी छिपे चल रहा है जीएम राइस का परीक्षण
दुिनया की सबसे बड़ी रसायन कंपनियों में से एक बॉयर कार्प साईंस भारत में चोरी-छिपे जीएम राईस का परीक्षण कर रहा है. इस बात का खुलासा करते हुए आज ग्रीनपीस ने आंध्र प्रदेश के चिन्नाकांजर्ला गांव में उस खेत पर धावा बोला जहां बॉयर कार्प आनुवांशिक छेड़छाड़युक्त चावल का परीक्षण कर रही है.खत्म होना चाहिए अंको का खेल
हमारी शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से अंकों के इर्द-गिर्द घूम कर रह गई है. प्रतिभा निखारने और उनमें आत्म विश्वास पैदा करने का काम हमारी शिक्षा व्यवस्था से दूर होता जा रहा है. बावजूद इसके, अगर आप में अपने मंजिल तक पहुंचने की दृढ़ इच्छा शक्ति और दृढ़ निश्चय है तो अंक कभी भी आप के कैरियर में रुकावट नहीं बन सकते.डायरी से डब्बे तक सट्टे का सफरनामा
भारतीय खेलों के साथ सटोरियों का संबंध दशकों पुराना है. पश्चिम बंगाल के सटोरिए फुटबाल और राजस्थान के सटोरिए हाकी पर पिछले 100 वर्षों से सट्टा लगाते आ रहे हैं. क्रिकेट पर सट्टा लगाने की परंपरा भी दशकों पुरानी है. लेकिन ये सट्टे संगठित व्यापार के रूप में 1980 के दशक में शुरू हो पाये. सटोरियों और खिलाड़ियों के बीच मैच फिक्सिंग की शुरूआत 1980 के दशक में ही हुई. 1983 में विश्वकप जीतने से पहले भारतीय क्रिकेटरों पर सटोरियों का प्रभाव न के बराबर था. 1983 में विश्वकप जीतने के बाद टेलीविजन पर क्रिकेट का बड़ा दर्शक वर्ग खड़ा हो गया था.फिर लौटेंगे कार्टून के दिन - काक
हम अखबार के कोने में कार्टून न देखें तो अखबार अधूरा लगता है. लेकिन क्या हमने कभी किसी कार्टूनिस्ट की जिंदगी में झांककर देखने की कोशिश की है कि उसके अपनी जिंदगी का कोना कितना पूरा या अधूरा है? काक हम सबके लिए सुपरिचित कार्टूनिस्ट हैं. काकदृष्टि ब्लिट्ज के जमाने से अपने पाठकों को दृष्टि देती आयी है. एक और मशहूर कार्टूनिस्ट चंदर की काक से की गयी बातचीत.अगर एस पी जिन्दा होते तो...
एसपी को याद करने के लिए दिल्ली में शनिवार को पत्रकारों की जो जुटान हुई, उसके बिखरने का वक्त हो चुका था, ऐलान भी कर दिया गया था। लेकिन तभी एक लड़की मंच की तरफ आती है। कुछ कहने की इजाजत मांगती है। संचालक ने सभी से अनुरोध किया- प्लीज रुक जाइए, इनकी भी सुन जाइए। और वह लड़की बोली। जो जहां जिस मुद्रा में था, रुका और उसे सुना। कुछ ने उसके जज्बे को सराहा। कुछ ने उसके सवालों के जवाब देने की कोशिश भी। लेकिन बिखरती हुई सभा को कितने देर तक संभाला जा सकता था, सो, सब लोग चले गए। वह लड़की भी अपने सवाल को खुद के दिमाग में चिपकाए सवाल की तरह चली गई। उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला। मिलना भी नहीं था।लिब्राहन आयोग पर ही सवाल उठाने की जरूरत
6 दिसंबर 1992 को विवादित बाबरी ढांचे के विध्वंस के दस दिन बाद 16 दिसंबर को लिब्राहन आयोग का गठन हुआ था. भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करके आयोग के गठन की घोषणा की थी जिसका काम यह पता लगाना था कि बाबरी ढांचे के विध्वंस के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं. वे कौन लोग हैं जिन्होंने ढांचा गिराने की साजिस रची. आयोग को काम करने के लिए तीन महीने का समय दिया गया.राजनीति में सैटल होने की राजनीति
गोपाल शाही उत्तर प्रदेश के देवरिया से हैं. दिल्ली आये थे राहुल गांधी के टैलेण्ट हण्ट में हिस्सा लेने. राहुल गांधी राजनीति में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के अपने देशव्यापी अभियान में काफी समय से इस तरह के टैलेण्ट हण्ट का सहारा ले रहे हैं. गोपाल शाही भी राहुल की अपील से प्रेरित होकर आ गये थे. कांग्रेस मुख्यालय में जब उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने अपना मकसद साफ किया. 'यदि हमें राजनीति में एक भी अवसर मिल गया तो उसके बाद हमें कुछ करने की जरूरत नहीं है। सब अपने आप सैटिल होता चला जाएगा।' उनके इस साफ मकसद से राजनीति में राहुल गांधी के युवाओं को शामिल करने के बारे में किसी भी का भी दिमाग साफ हो सकता है. रूपया, पैसा और पावर के सहारे राजनीति में सैटल होने आये राजनीति के ऐसे युवा कलाकार रंगमंच पर कैसा प्रदर्शन करेंगे इसकी झलक उनसे बात करके ही मिल जाती है.हजार हाथियों का बोझ दलितों के सिर
लखनऊ के अंबेडकर पार्क में दलितों की बेटी ने स्वाभिमान का नया अध्याय लिखा है. हजार-हजार हाथियों के बुत दलितों को बिना कुछ बोले समझा रहे हैं कि उनका स्वाभिमान अब लखनऊ की सरजमीं पर बुलंदी से आ खड़ा हुआ है. लेकिन दलित और पददलित इसे कैसे स्वीकार कर लें? मैले-कुचैले नीले कपड़ों पर हाथी को लहराते हुए बहनजी के लिए वोटों की बारिश करवाने वाले दलित देख रहे हैं कि हाथी का उनका निशान और स्वाभिमान दोनों ही प्राडो और पजेरो की बोनटों पर जा सवार हुआ है. जो हाथी का निशान उन्हें सदियों की गुलामी से निर्भार करता था वही उनके लिए भार बनता जा रहा है.पेठिया की खाली होती पेटियां
बहुत सालों बाद इस बार गांव (गंगेया जिला मुजफ्फरपुर) जाना हुआ और संयोग से कुछेक दिन रूकने का भी सौभाग्य मिला। इस दौरान लोगों से मिलने-मिलाने के अलावा काफी कुछ देखने को मिला और इसी कड़ी में एक दिन पेठियां जा पहुंचा। पेठियां यानी ग्रामीण बाजार जो हर इलाके के कुछ गांव में हर रोज या सप्ताह में एक या दो बार लगता है। पूर्वांचल में इसे हाट या हटिया भी कहा जाता है और दिल्ली जैसे महानगरों में सोम बाजार से लेकर शुक्र या शनि बाजार तक। हालांकि पेठियां शहर के साप्ताहिक बाजार से इस मायने में अलग है कि यहां का ज्यादातर कारोबार दिन के उजाले में होता है और शाम होते-होते सिमट जाता है।मानसून की मार से याद आयी परंपरागत खेती
मानसून में देरी से हिली सरकार ने तमाम तरह के राहत इंतजामात का ऐलान किया है। लेकिन हकीकत ये है कि ये इंतजाम ना सिर्फ फौरी हैं, बल्कि लोकलुभावन ज्यादा हैं। किसी का ध्यान अपनी पारंपरिक और सतत विकास वाली खेती की ओर नहीं है।मौत मांग रहे हैं पलामू के पांच हजार किसान
भारत के इतिहास में यह ऐतिहासिक घटना भी हो सकती है और एतिहासिक त्रासदी भी. लेकिन यह घटना तो है. पलामू के छतरपुर इलाके के लगभग 5000 किसान मरना चाहते हैं. पिछले तीन साल से सूखे से पीड़ित पलामू के ये किसान अब चाहते हैं कि सरकार उन्हें राहत तो नहीं दे सकी तो कम से कम मरने की इजाजत दे दे. अर्जी अभी पांच हजार किसानों की है लेकिन 30 हजार और किसान इच्छामृत्यु की अपनी अर्जियां तैयार कर रहे हैं.असाढ़, अशोक और अकाल की आशंका
राजस्थान सरकार बिजली पानी के संकट से जूझते प्रदेश को अभी तक कोई राहत नहीं दे पाई है वही आम किसान को एक बार फिर से आशंकाओं ने घेर लिया है। उसकी चिंता ये है कि कहीं एक बार फिर से पॉच साल पुराना इतिहास न सामने आ जाऐ।वो ऐसे में अकाल की स्थिति का अनुमान प्रदेश के मुखिया अशोक गहलौत से जोड रहा है और उसकी आशंका निर्मूल भी नजर नहीं आ रही है।राजस्थान में जून माह में सामान्तया 72 मिमी बारिश होती है जो इस बार 39 मिमी ही हुई है। बर्षा की कुछ क्षेत्रों में पडी फुहारों ने कुछ राहत अवश्य दी हैं।धर्मों के बहुराष्ट्रीयकरण की सियासत
किसी एक देश में घटने वाली घटनाओं की गूंज-अनुगूंज अब, धार्मिक आधार पाकर, दूसरे कई देशों में सुनाई देनी शुरू हो गई है। बहुराष्ट्रीय होते इन और अन्य बहुत से धर्मों-संप्रदायों की एक और खासियत यह है कि इनकी संस्थाओं की चंदों-अनुदानों से पाई गई सार्वजनिक संपत्ति का निजीकरण होता रहता है, जिससे इन्हें सीमित किस्म की `आत्मशासी´ व्यवस्था मिल जाती है। इसीलिए इन संस्थाओं से जुड़ी किसी भी अप्रिय घटना की वजह से जो प्रतिक्रिया होती है-गुस्सा और विरोध सामने आता है- वह भी `संपत्ति´ और `व्यवस्था´ पर फूटता है। एक अनुमान के अनुसार हाल में धार्मिक गुरू के अपमान के विरोध में हुए प्रदर्शनों के कारण पंजाब में चार दिनों में सत्तर हजार करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ और इन धर्मों की बहुराष्ट्रीयता से अहसास होता है कि जैसे इनसे जुड़े मसले पूरी मानवजाति के साझे मसले हो।खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है जैविक खेती
मॉनसेंटों जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों और खाद से हो रही खेती के दुष्परिणाम देश के हर इलाके में दिखने लगे हैं। हर साल पंजाब और हरियाणा में भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। इसके जरिए होने वाली खेती की खाद-पानी और कीटनाशकों की भूख लगातार बढ़ती जा रही है।24 साल बाद मिली 'काजू' को जमीन
आखिरकार उड़ीसा के कोरापुट जिले में पिछले 24 सालों से चला आ रहा आदिवासियों का आंदोलन थम गया है। आदिवासियों का यह आंदोलन काजू फल की खेती को लेकर था जिसमें वे फसल उगाने के लिए जमीन पर अधिकारों की मांग कर रहे थे। देश में उड़ीसा काजू के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। सबसे पहले इस आंदोलन की पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। उड़ीसा में 20 जिले ऐसे हैं जहां काजू की खेती बहुतायत में होती है। आदिवासी और दलित बहुल इस राज्य में काजू के उत्पादन पर इन दोनों वर्गों का अधिपत्य रहा है, लेकिन खेती-गृहस्ती का इनका सिलसिला बहुत दिनों तक चल नहीं पाया।राजनयिक से राजनीति के शिखर पर मीरा कुमार
पटना में पैदा हुई और दिल्ली में पली-बढ़ी मीरा कुमार पंद्रहवीं लोकसभा अध्यक्ष होंगी. जनता पार्टी के शासन के दौरान देश के उप प्रधानमंत्री रहे जगजीवन राम की पुत्री मीरा कुमार स्वभाव और वाणी दोनों से बहुत मृदुल स्वभाव की हैं. मीरा कुमार का जन्म 31 मार्च 1945 को पटना में हुआ था. लेकिन पिता की राजनीतिक सक्रियता के कारण उनका लालन-पालन दिल्ली में हुआ. दिल्ली के ही इंद्रप्रस्थ कालेज और मिराण्डा हाउस से उन्होंने एमए, एलएलबी और स्पैनिश में डिप्लोमा की डिग्री हासिल की.Log in
- हिन्दू आतंकवाद का अतिवाद
- अब भोजपुरी में बोलेगा बाजार
- तालिबान के देसी संस्करण
- विस्फोट पर अस्थाई कार्य विराम
- 10 रूपये के शपथपत्र पर पत्रकारिता गिरवी
Aapne bilkool sahi aur sateek likhaa. Lekin kyaa kare...It's happen only in India!
aaj ke sab bade patrakar chhote patrakaro ka shoshan kar rahe hai ..we maliko se mile hue hai ..apne to sale moti sailery uthate hai ...
ऐसा लगता है अवधेश जी राजस्थान की राजधानी या फिर किसी दूसरे बडे शहर में रहते है जहॉ इन्हें बिजली कि किल्लत का सामना शायद ...
चंद्रिका जी, आप सही कहती हैं। वैसे लालगढ़ की घटना के पीछे पश्चिम बंगाल में वाम दलों के एकछत्र शासन के दौरान पिछड़े इलाकों की ...
यह तो बहुत अच्छा हो गया. काश मैं इसे दो दिन पहले ही प्रकाशित कर देता?
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आर बी राय
पत्रकार. छात्र आंदोलन से राजनीति और राजनीति से पत्रकारिता में आये रामबहादुर राय हिन्दी में खोजी पत्रकारिता के शीर्षपुरूष समझे जाते हैं. वर्तमान में प्रथम प्रवक्ता के संपादक. संपर्क- 09350972403
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