आशीष कुमार
सहज उकेरी पीर घनेरी
क्षमा कुलश्रेष्ठ जब अठारह साल की थी तो उन्होंने एक कविता लिखी थी. ‘बन के तारा झिलमिलाऊं, चंाद मेरे पास हो, ऐसा कुछ मैं कर दिखाऊं, सबको मुझपर नाज हो, मानती हूं मेरा जीवन, गहरी काली रात है, दिन में तारों का नजारा, एक असंभव बात है।’ आज क्षमा की उम्र होगी यही कोई तीस साल के आसपास, लेकिन जब आप उनसे मिलेंगे, आपको कोई जब तक उनकी उम्र का हिसाब ना बताए, आप उनकी उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकते।
मौत पर पत्रकारिता
कोडरमा में निरुपमा की मौत की खबर उसके दोस्तों की वजह से इस मुकाम तक पहुंची कि प्रशासन को भी इसे गंभीरता से लेना पड़ा। वरना रोज कितनी ही निरुपमाएं मरती हैं, किसी को परवाह नहीं होती, सिवाय उन पत्राकारों के जो सिंगल कॉलम की खबर लिखकर अपनी जिम्मेवारी खत्म मानते हैं या इलैक्ट्रानिक मीडिया के वे बाइट कलेक्टर जो इस मौत की अच्छी पैकेजिंग करके ‘सनसनी’ बनाते हैं।...भाषा भी होती है सर्वहारा, दलित और सवर्ण
बड़ोदरा में भाषा अनुसंधान एवं प्रकाशन संस्था ने एक बेहतरिन आयोजन किया। जिसमें भाषा और बोली के सवाल पर देश भर के विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता इकट्ठे हुए। भाषा के सवाल पर इतने बड़े पैमाने पर विद्वानों के जुटान का शायद यह एक अभूतपूर्व कार्यक्रम था। प्रोफेसर गणेशी देवी के संयोजन में हुए इस कार्यक्रम को बड़ोदरा की स्थानीय मीडिया में तो अच्छी कवरेज मिली लेकिन नहीं कह सकता उसके बाहर वह खबर बनी या नहीं। ...अब कोई नहीं पूछता पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन
अब कोई नहीं पूछता पत्रकारिता मिशन है या प्रोफेशन। शायद अब सब जान-बूझ गए हैं कि भारत में 25000 करोड़ रुपए की मीडिया इण्डस्ट्री मिशनरी भाव से खड़ी नहीं की जा सकती है। यह शुद्ध व्यावसायिक हितों से ही सम्भव है। बिरला से लेकर उषा मार्टिन तक हर तरह के व्यावसायी इस व्यवसाय में क्या किसी सामाजिक परिवर्तन की अकांक्षा लेकर आए हैं? बिल्कुल नहीं।...सूचना मिलने की राह में हैं रोड़े बड़े
यह सूचना का अधिकार नहीं चमत्कार है। अब बीडीओ साहब देखकर बैठने के लिए पूछते हैं। इज्जत से बात करते हैं। गांव के आदमी को और क्या चाहिए? कमलेश कामत मैनही पंचायत अमही प्रखंड मधुबनी के रहने वाले हैं। सूचना के अधिकार से उनका परिचय अभी नया-नया है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि हाल में जब प्रखंड कार्यालय से उन्होंने अपने पंचायत में होने वाले विकास संबंधी कार्यों में हो रहे व्यय का ब्यौरा मांग तो क्यों पंचायत से लेकर ब्लॉक तक में उनकी इज्जत पहले से कई गुना बढ़ गई है। ...झरियाः आग का दरिया
विकास के जिस उड़नखटोले पर बैठकर देश का खास वर्ग यात्रा कर रहा है, उसी विकास ने झरिया से उसकी हरियाली और खुशहाली दोनो छीन ली है। एक समय झारखंड का कोयला क्षेत्र झरिया जो अभ्यारण्य हुआ करता था आज आग के दरिया में तब्दील हो गया है। झरिया की कोयला खदानें ऐसी पहचान अख्तियार कर चुकी हैं जिसके नीचे कोयले में आग लगी हुई है लेकिन ऊपर माफिया का राज चल रहा है. ...पत्थर में पिसती जिन्दगी
रायखेड़ा के बालमुकुन्द वर्मा के घर इस साल 19 अगस्त की तारीख बड़ी मनहूसियत लेकर आई। वे नहींं भूलते उस दिन को जब दो लोग इनके घर आए, यह खबर लेकर की उनका 22 वर्षीय लड़का दीपक वर्मा अस्पताल में भर्ती है। उसे गंभीर चोट लगी है। वे दो लोग बालमुकुन्द को अपने साथ लेकर अस्पताल जाना चाहते थे। बालमुकुन्द को पहले गड़बड़ की आशंका हुई और उसने साथ जाने से इंकार कर दिया। लेकिन बेटे के मोह में वे अपने को रोक भी नहीं पाए।...मथुरा के ग्वाल-बाल, हार्वर्ड के लाल
मथुरा से 22 किलोमीटर की दूरी पर राया, सादाबाद रोड़ पर एक गांव है रुजगेला। हो सकता है मथुरा में रहने वाले बहुत सारे लोगों को इस गांव का नाम पता ना हो, लेकिन इस गांव की शिक्षा को लेकर सात समुन्दर पार हावर्ड बिजनेस स्कूल के कुछ छात्र बेहद गंभीर हैं। हार्वर्ड स्कूल के इन विद्यार्थियों ने मिलकर `इंडिया स्कूल फंड´ के नाम से एक संस्था बनाई है। इस संस्था के माध्यम से एचबीएस के छात्रों का उद्देश्य भारतीय गांवों में अच्छी शिक्षा पहुंचाना है। इस संस्था की सहायता से पहला स्कूल लगभग तीन साल पहले रुजगेला में `गजराज विद्या निकेतन´ के नाम से प्रारंभ किया गया।...कोसी का घर कांधे पर और मुसीबत सिर पर
दो महीने से भी कम में मानसून पुन: आ जाएगा। बिहार में पिछले मानसून में कोसी नदी में आई बाढ़ की क्षतिपूर्ति अभी तक नहीं हो पाई है। आज भी बाढ़ पीड़ितों को एक वर्ग राहत शिविरों एवं खुले आसमान के नीचे रहने को अभिशप्त है। कोसी क्षेत्र में एक कहावत प्रसिध्द है- 'कोसी का घर कांधे पर।' अर्थात् बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में रहने वाले यायावरों सी जिन्दगी जीने को विवश हैं। इस साल वे जहां रह रहे हैं, जरूरी नहीं कि अगले साल भी वे उसी जगह मिले। ...यहां लाचार है हर आम आदमी
मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार कह रही है कि उसने बहुत काम किया है. उसने क्या किया है उसके आंकड़े उसके पास छोड़ दीजिए लेकिन मध्य प्रदेश आज भी भूख से हो रही मौतों, पानी की किल्लत, बांधों की बढ़ती महामारी और उससे निकले विस्थापन जैसे मूलभूत सवालों में उलझा हुआ है. क्या सरकार बदल जाने से इन समस्याओं का समाधान हो जाएगा? या फिर यह सरकार दोबारा आ भी गयी तो क्या कर लेगी? ...Author info
