जेएल कौल
बुरे फंसे उमर अब्दुल्ला
कश्मीर में हर बड़े राजनीतिक दल या फिर नेता ने भारत विरोध को सत्ता पाने या बचाने का माध्यम बनाया है. शेख अब्दुल्ला से लेकर मुफ्ती मोहम्मद सईद तक सबने इस सिक्के का इस्तेमाल किया है. उम्मीद की गयी थी उमर अब्दुल्ला इस राजनीति को त्यागकर सही रास्ते को अख्तियार कर लेंगे और अपनी पार्टी को मजबूत करने के साथ साथ घाटी में अमन चैन लाने की दिशा में काम करेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
बाढ़ से लथपथ हुआ लद्दाख
इस बात पर मौसम वैज्ञानिक बहस करते रहेंगे कि यह कैसी घटना थी जिसमें बादल फटने से किसी गांव या जिले पर विपत्ति नहीं बल्कि लद्दाख जो कि क्षेत्रफल में देश के कुछ छोटे राज्यों के बराबर है, पूरा का पूरा इसकी चपेट में आ गया जिसके कारण लद्दाख से करगिल तक का मार्ग ध्वस्त हो गया. छह पुल उड़ गये और लेह मनाली के मार्ग में दो पुल टूट गये जिसने लेह को सारे देश से काट दिया. वैज्ञानिक कोई भी दलील दें यह बात फिर भी अनुत्तरित ही रहेगी कि आखिर लेह कस्बे को कब्रिस्तान में बदलने के लिए बादल फटने की एक घटना काफी क्यों थी?...नेपाल में सिर्फ नाउम्मीदी
काठमांडू में माओवादियों का घेराव उठ चुका है, लेकिन शांति की आशा अभी लौटी नहीं है। नेपाल की त्रस्त जनता को वहां का सत्ता संघर्ष चैन का जीवन जीने का अवसर देगा, इसके दूर-दूर तक कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं।...गैर कांग्रेसवाद के असफल पराक्रमी साबित हुए लोहिया
डॉ राममनोहर लोहिया के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने देश में विपक्ष को विकल्प दिया. वह विकल्प था- गैर कांग्रेसवाद. लेकिन क्या गैर कांग्रेसवाद सफल रहा? जवाहरलाल कौल मानते हैं कि आज जो सिद्धांतहीन राजनीति का बोलबाला है उसकी जड़ें कहीं न कहीं उसी गैर कांग्रेसवाद में निहित हैं जिसका कोई वैचारिक आधार नहीं था. ...आतंकवाद का मनोविज्ञान
दुनिया में जब आतंकवादी गतिविधियां फैलने लगीं तो अन्य विषयों की तरह यह भी वैज्ञानिक अनुसंधान का मुद्दा बन गया। शुरू में यह माना जाने लगा था कि एक आतंकवादी मनोवैज्ञानिक रूप से अस्थिर या विकार ग्रस्त व्यक्ति होता है। उसके व्यक्तित्व की यह रोगग्रस्त स्थिति ही उसे आतंकवाद की ओर ले जाती है। साउथ ईस्टर्न ओकलहोमा स्टेट विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रिचार्ड पेइरिस्टीन का मानना है कि `आतंकवादी पूरी तरह तर्कसंगत व्यक्ति होते हैं, वे विक्षिप्त नहीं होते। उनके लक्ष्य होते हैं और उन लक्ष्यों की ओर वे बढ़ते रहते हैं।´ ...जरदारी के ज़र और ज़ेवर
जरदारी के राष्ट्रपति बनने में शुरू से ही किसी को संदेह नहीं था, परवेज मुशर्रफ और नवाज शरीफ दोनों ये जानते थे। उन्होंने अपने उम्मीदवार केवल चुनाव की औपचारिकता निभाने के लिए खड़े किए थे और शायद यह बताने के लिए कि हम जरदारी से पूरी तरह सहमत नहीं है। लेकिन आसिफ जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति की भूमिका का निर्वाह कैसे करेंगे ये देखना दिलचस्प होगा। उनके सामने अनेक विरोधाभास हैं, जिनमें से बिना फिसले सही रास्ते निकालना आसान नहीं है। ...कश्मीरः नासमझी ने बनाया नासूर
पचपन वर्ष पहले १९५३ में दो अलग-अलग दुश्मन राज्यों की तरह जम्मू और कश्मीर आपस में भिड़ रहे थे. शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की नीतियों के विरूद्ध जम्मू में प्रजा परिषद नाम के संगठन ने आंदोलन छेड़ रखा था. तब जम्मू का नारा था- एक विधान, एक प्रधान और एक निशान. कश्मीर में धारा 370 की आड़ में जो अपना संविधान बना था वह कई मायनों में भारतीय संविधान की पहुंच से बाहर था....मधुमक्खी का छत्ता
इंसान जैसे-जैसे विकसित हुआ है वह अकेला पड़ता गया है. प्रकृति में मौजूद दूसरे जीवजंतु, प्राणी, वनस्पतियां सब उससे लगातार दूर होते गये हैं. ऐसा कोई एक दिन में नहीं हुआ लेकिन यह क्रम कभी रूका भी नहीं. जीवजंतु तो न जाने कब के हमारे लिए पालतू हो गये थे. मनुष्य ने सबसे पहले जिस जानवर को पालतू बनाया वह संभवतः गाय थी. उसके पहले तक का जो इतिहास हम देखते हैं वह यही है कि अस्तित्व में बने रहने के लिए ...Author info
