अनिल पाण्डेय
विस्थापन के 33 साल बाद,पूरी तरह बर्बाद
भारत की औद्योगिक प्रगति और शहरी विकास के लिए सबसे आधारभूत जरूरत है जमीन. जहां भी विकास का पहिया पहुंचता है, पहले वहां की जमीन और जमीन के वाशिंदों को रौंदता है. फिर अपनी मर्जी के मुताबिक एक नया साम्राज्य विकसित करता है जो विकास का विस्तार बताकर हमारे सामने प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन इस साम्राज्य के विकासक्रम में पीछे छूट गये लोगों की एक दुनिया शेष रह जाती है. सरकार और कंपनियां जिन्हें मुआवजा देकर "अमीर" बनाकर छोड़ देती हैं वे पीछे छूट गये लोग कितने दयनीय होकर रह जाते हैं इसका सटीक उदाहरण है गाजियाबाद का कड़कड़ मॉडल गांव. इस गांव के जरिए विकास और विस्थापन का जायजा ले रहे हैं अनिल पाण्डेय.
चेहरा बदलने आये थे, मोहरा बनकर रह गये
संघ की शाखाओं में स्वयंसेवकों को नेतृत्व क्षमता के बारे में सिखाया जाता है, "नेतृत्व वही, जिसके पास निर्णय क्षमता हो." लेकिन फिलहाल तो स्वयंसेवक गडकरी में इसका अभाव दिखता है. गडकरी की बड़े नेताओं के बीच संतुलन साधने और पार्टी के सभी गुटों को खुश रखने की रणनीति संगठन पर भारी पड़ रही है. कड़े फैसले लेकर पार्टी को सही दिशा देने की बजाए गडकरी नेताओं के महत्वाकांक्षाओं के खेल में मोहरा बन रहे हैं. ...अनीति का शिकार छात्र राजनीति
जुलाई में देशभर के विश्वविद्यालय और कालेज खुल गए हैं और नए छात्रों के आगमन के साथ ही परिसरों में छात्र संघ चुनावों की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. देश में एक धारणा बनने लगी है कि छात्र राजनीति और छात्र संघ गुंडागर्दी का पर्याय बनता जा रहा है इसलिए इसपर पाबंदी लगा देनी चाहिए। क्या इस धारणा में कोई सच्चाई है या फिर समाज के एक वर्ग विशेष द्वारा फैलाई गयी भ्रांति के अलावा कुछ नहीं है?...सिम में भी समाया चीनी ड्रैगन
देश का गृह मंत्रालय और खुफिया एजेंसियां चीनी कंपनियों पर सेलुलर आपरेटरों को बेचे जाने वाले उपकरणों और साफ्टवेयर में स्पाइवेयर डालने और इसके जरिए भारत की महत्वपूर्ण जानकारियों को चीन द्वारा हासिल करने की आशंका जता चुकी है. लेकिन बावजूद इसके नियमों को धता-बताकर चीन से अभी भी हर महीने लाखों सिमकार्ड भारत आ रहे हैं. सिमकार्ड बनाने वाली कंपनियों के एसोसिएशन स्मार्ट कार्ड फोरम आफ इंडिया के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि चीन से पिछले तीन महीनों (जनवरी-मार्च) में ही करीब साढ़े चार करोड़ सिमकार्ड भारत आ चुके हैं. ...झारखण्ड में सत्ता का सर्कस, संघ बना रिंगमास्टर
बात 28 अप्रैल की है. जैसे ही भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक बुला कर झारखंड में शिबू सोरेन सरकार से समर्थन वापसी का एलान किया, रांची से कार्यकर्ताओं का दनदनाता एक एसएमएस दिल्ली के नेताओं के पास पहुंचा, “भाजपा ने पहली बार मर्दों वाला फैसला किया है.” ...यह कैसा अंधा कानून है?
यह एक ऐसी कहानी है, जिसमें दहेज उत्पीड़न के मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए की भयावह प्रताड़ना से भयय़ीत देश का एक होनहार इंजीनियर 23 मार्च, 2008 को बंगलूरु में अपनी पत्नी की इसलिए हत्या कर खुद पंखे से लटक आत्महत्या कर लेता है कि वह अपने माता-पिता को जेल और अदालत की यातना से दूर रखना चाहता था....ब्लैकबेरी, फेशबुक और थोड़ा सा कुंभस्नान
ब्लैकबेरी के फीचर गिननेवाली पीढ़ी अगर गंगा की बहती धारा में गिरने के लिए दौड़ लगाते हुए आये तो क्या संकेत समझना चाहिए? उस दिन भी हरिद्वार में आयोजित कुंभ मेले में ऐसा ही नजारा था. हमारे समाज की फेशबुक पीढ़ी गंगा में डुबकी लगा रही थी, पाप धो रही थी और आस पास खड़े लोग कौतुहल से उन्हें निहार रहे थे. ...महामहिम, मुझे मौत की इजाजत चाहिए
यह एक ऐसे किसान की कहानी है जो सोलह साल से भू माफियाओं से अपनी चार एकड़ जमीन को बचाने के लिए सत्ता से संघर्ष कर रहा है और अब वह थक-हार कर आत्महत्या करना चाहता है. लंबे संघर्ष और कोर्ट कचहरी के चक्कर ने न केवल गरीब चंदन सिंह बंजारा की कमर तोड़ दी है बल्कि उसके ऊपर हजारों का कर्ज भी लाद दिया है....लोकतंत्र के योद्धाओं की खानाबदोश बस्ती
वैसे तो देश भर में हर राज्य की राजधानी में एक ऐसा स्थान नियत किया गया है जहां लोकतात्रिक तरीके से लोग अपनी बात कह सकते हैं. लेकिन संसद और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र होने की वजह से दिल्ली का अपना महत्व है. देश भर से हताश और निराश लोग इस उम्मीद में जंतर मंतर आते हैं कि यहां उनकी बात सुनी जाएगी. लेकिन संवेदनशून्य हो चुकी हमारी व्यवस्था और प्रशासन या तो उनकी बात सुनता ही नहीं, या फिर कार्रवाई इतनी लंबी होती है कि न्याय मिलते-मिलते जीवन का एक लंबा अरसा गुजर जाता है. कहते हैं दिल्ली उंचा सुनती है. जंतर-मंतर पर यह सही साबित होती है....हारते हारते हलाकान
हरियाणा, महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की करारी पराजय के बाद जब नई दिल्ली के अशोक रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में संसदीय बोर्ड की बैठक में हार की समीक्षा चल रही थी, तब मुख्यालय के बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं का एक समूह भी भाजपा के भविष्य की समीक्षा में जुटा था. भाजपा कार्यकर्ताओं के “पार्टी के भविष्य” पर शुरू हुई आपसी बातचीत ने अचानक आक्रामक बहस का रूप ले लिया और इसमें शामिल कार्यकर्ता दो फाड़ हो गए....Author info
