प्रभाष जोशी
न हन्यते हन्यमाने शरीरे
हम प्रभाष जी के लिखे को विस्फोट पर प्रकाशित करते थे. अब हम ऐसा नहीं कर पायेंगे. 29 मई 1994 को प्रभाष जोशी ने यह कागद कारे लिखा था. अजल (मौत) के बारे में लिखते हुए प्रभाष जोशी ने लिखा था- जिस बंबई अस्पताल में सिर्फ एक दिन के चेक अप के लिए भर्ती हुआ था उसमें 28 दिन लग गये. तुरत-फुरत बाईपास जैसा आपरेशन हो गया. और अपन ऐसा महसूस कर रहे हैं जैसे किसी गिल्टी का आपरेशन हुआ है या भांग के जहर का इलाज. यह लफ्फाजी नहीं है भाई साहब। आप चाहें तो बंबई अस्पताल की नयी विंग में ग्यारहवीं मंजिल के कमरा नंबर 64 में जाकर इस आदमी का दिलफेंक तमाशा देख सकते हैं. अपने एक शायर दोस्त ने कहा है- "अजल से वो डरें जीने को जो अच्छा समझते हैं, यहां हम चार दिन की जिंदगी को क्या समझते हैं?" प्रभाष जी का ही लिखा हुआ कागद कारे उनके जाने के बाद-
फच्चर मत फंसाओ। टिकोगे नहीं!!
चलो, कोई तो मैदान में उतरा। न सही लोकसभा चुनाव जैसे नाजुक और निर्णायक मौके पर काला धन लेकर चुनावी विज्ञापन को खबर बना कर बेचने वाला अखबार मालिक, उसका संपादक या जनरल मैनेजर। कोई प्रमोद रंजन ही सही, जिनका मानना है कि विज्ञापन को खबर बना कर बेचने से ज्यादा बुरा और खतरनाक तो पत्रकारिता में जाति धर्म और मित्र धर्म का निर्वाह है। ...राजनीति के 'ट्रैजिक फिगर' का असमय अंत
धीरे धीरे वे दिल्ली के राजनीतिक, बौद्धिक और पत्रकारीय इलाकों में एक ट्रैजिक फिगर हो गये. मनमोहन सिंह के नव उदार राज के खुले खेल फर्रूखाबादी में राजनीति ऐसी बदली कि उद्योग व्यापार का ही बोलबाला हो गया. प्रमोद महाजन और अमर सिंह जैसे दलालों के हाथ में सत्ता की चाभी आ गयी. बाजार और उद्योग की किसी लाबी के साथ आप नहीं हैं तो राजनीति में टिके रहना भी मुश्किल हो गया है. पैसा इतना हावी हो गया है कि लोक राजनीति की बात करनेवाले या तो शोहदे माने गये या फिर लोगों को पटाने वाले ठग. जाति, संप्रदाय और उद्योग व्यापार को तरकीब और करामात से साधनेवाली राजनेताओं की नयी पौध पनपी. उनके बीच देवेन्द्र द्विवेदी न तो राजनीति के थे और न वकालत के....खबरों को रिचार्ज करने का काला धंधा
बहुत सवेरे ही ......... के संवाददाता का फोन आया. मैंने उससे जानना चाहा कि ...... के तीन-तीन फोटो कैसे छप रहे हैं? वह बोला उन्होंने मंहगा पैकेज लिया है. ...... जी ने भी दो लाख दिये हैं. उन्होंने पांच लाख का पैकेज लिया है. आपको फोन इसलिए किया क्योंकि आप लोगो का पैकेज पूरा हो रहा है. आज आपके......आनेवाले हैं. रिचार्ज करवा लीजिए तभी हम कवर कर पायेंगे. दस दिन की ही बात है. बड़ा पैकेज ले लीजिए सब कवर हो जाएगा. ...एटा-मैनपुरी का यादव, कृष्ण का सच्चा वंशज
हमारे मित्र प्रेम सिंह लाइलाज समाजवादी हैं। ऐसे कि राममनोहर लोहिया की जन्म शताब्दी से मुलायम सिंह यादव का कोई भी लेना देना उन्हें बर्दाश्त नहीं है। वे मानते हैं कि मुलायम सिंह लोहिया की जन्मशती का इस्तेमाल अपने सरासर समाजवाद विरोधी जीवन और राजनीति पर समाजवाद का झूठा ठप्पा लगवाने में करेंगे। उनमें न समाजवाद के विचार के लिए कोई समझ और सम्मान है न लोहिया के लिए। मुलायम सिंह बेपेंदे के लोटे और अवसरवादी हैं। सत्ता के लिए कुछ भी कर सकते हैं....घर बैठो और घाव चाटो
हमारी मुंबई कहती है कि पाकिस्तान पर तत्काल हमला करो और उसे मिट्टी में मिला दो। आतंकवाद से लड़ने का यही अमेरिकी तरीका है. लेकिन अमेरिका कहता है कि पागलपन मत करो। हमारी तरह तुम उसके लायक नहीं हो। पागल होने के लिए हथियार और पैसे चाहिए जो तुम्हारे पास नहीं है। घर बैठो और घाव चाटो।...उस दिन मैं भी नेक्सन की तरह रोया था
अपने भी देश-समाज में गोरे रंग की बड़ी महिमा है. लेकिन सोलह गुण संपन्न कृष्ण को सांवरा बनाकर हमने गौर-वर्ण को फीका कर दिया. अपने यहां भी भेदभाव और ऊंच-नीच बहुत है. लेकिन किसी एक जाति के सभी लोग इसलिए भेदभाव के शिकार नहीं होते कि उनकी चमड़ी काली होती है. अपने यहां भेदभाव की कई परतें हैं. इसलिए रंगभेद उतना निंदनीय और वांछनीय नहीं होता जितना पश्चिम में होता है. ऐसे में काले ओबामा का ह्वाईट हाउस में बैठना अपने को उतना उल्लेखनीय नहीं लगता जितना अमेरिका के श्वेत-अश्वेत लोगों को लगता होगा....धन की लक्ष्मी या पूंजी की अप्सरा?
कनाट प्लेस और लक्ष्मीनगर दोनों ही अर्थव्यवस्था के बम-बम होने से पहले के बाजार हैं. खुले बाजार की अर्थव्यवस्था आने और भारत के अमेरिका से जुड़ने से पहले भी ये बाजार थे. धूमधाम से दिवाली मनाते थे. लेकिन देखते ही देखते कनाट प्लेस का अमेरिकीकरण हुआ. बहुमंजिला इमारते बनीं. अंतरराष्ट्रीय ब्राण्डों के आउटलेट खुले. पालिका बाजार बना, जिसमें सस्ती और नकली चीजों की भरमार हो गयी....भारतीय परंपरा से दूर होती पत्रकारिता
आज के इस विश्वग्राम में सभी छोटे हैं, बड़ी है तो केवल टेक्नोलाजी। जिस विज्ञान ने यह कहा कि दुनिया एक विश्वग्राम बनती जा रही है वह विश्व तो जानता था लेकिन उसे गांव के बारे में पता नहीं था. क्योंकि एक गांव एक छोटी बस्ती नहीं है बल्कि गांव एक जैविक समाज है। हम जिस टेक्नोलाजी को बढ़ा रहे हैं वह सब चीजों को छोटी करके जैविक समाज को नष्ट करने वालि टेक्नोलाजी है। यानि आदमी छोटा है उसकी मशीन उससे बड़ी है।...स्वर्ग की सीढियां टूट गयीं
अमेरिका के एक नवउदार पूंजीवादी विचारक ने कहा था कि मैं चाहता हूं कि राज्य छोटा से छोटा और निर्बल से निर्बल होता चला जाए. एक दिन वह इतना छोटा हो जाए कि नहाने के टब में लेटने लायक हो जाए ताकि उसको उसी टब में डुबो-डुबो कर मारा जा सके. ये विचारक अब भी वहीं हैं और बुश सरकार के सात सौ अरब डालर के जमानत पैकेज पर तालियां बजा रहे होंगे. ...Author info
