आर बी राय
सौदा नहीं पटा तो शुरू किया अभियान
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ खोजी खबरों के लिए नहीं जाना जाता। उसकी छवि सरकार के मुखपत्र की रही है। गत 31 जुलाई को टाइम्स ऑफ इंडिया के पाठकों को नया अनुभव हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि अपना अखबार नए अवतार में हैं। उसने भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ जैसा बड़ा अखबार जब खेल-कूद के एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन की तमाम गड़बड़ियों को उजागर करने पर उतर आया तो लोगों को चारो तरफ गड़बड़ ही नजर आने लगा। उन्हें क्या पता था कि यह वह खीझ है जो अखबार में इसलिए प्रकट हो रही है, क्योंकि सौदा पटा नहीं।
मनमोहन का मंत्री माओवादियों का मुखौटा
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चाहे जितने भी अराजनीतिक हांे पर वे यह तो समझते ही होंगे कि ममता बनर्जी को मंत्रिमंडल में नहीं रखा जाना चाहिए। ममता बनर्जी को चुनावी राजनीति से कोई रोक नहीं सकता। लेकिन प्रधानमंत्री को इतना साहस तो करना ही चाहिए कि उनका एक मंत्री माओवादियों का मुखौटा न बन जाए।...राजीव गांधी ने किया था एंडरसन की रिहाई का सौदा
भोपाल गैस त्रासदी पर तत्कालीन भारत सरकार ने एक सौदा किया था. सौदा यह कि उसने एंडरसन को सकुशल जाने दिया बदले में अमेरिका ने 11 जून 1985 को आदिल सहरयार को छोड़ दिया था. क्या यह महज संयोग भर है कि जिस दिन आदिल शहरयार जेल से रिहा हुआ उसके अगले दिन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी अमेरिका में थे?...प्रेस परिषद में भी पेड न्यूज की पैरोकारी
प्रेस परिषद की जिस जांच रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था वह आंतरिक उपद्रव का शिकार हो गई है। रिपोर्ट बन गई है। उम्मीद की जा रही थी कि 26 अप्रैल को प्रेस परिषद की विशेष बैठक में उसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया जाएगा। वैसा नहीं हुआ, हंगामा ज्यादा हुआ। रिपोर्ट से उन अखबारों और चैनलों के चेहरे पर कालिख पुत जाएगी और उसपर प्रेस परिषद की मुहर लग जाएगी जो चुनावों में खबरें बेच रहे थे। प्रेस परिषद में उनके पैरोकार भी हैं। उन लोगों को रिपोर्ट पर बहुत एतराज है। वे ही उपद्रव पर उतर आए हैं।...बेदाग व्यक्तित्व थे भैरो सिंह शेखावत
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति और देश के एक कद्दावर राजनेता भैरो सिंह शेखावत नहीं रहे. शनिवार की सुबह जयपुर के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली. 87 साल के भैरोसिंह शेखावत ने लगभग छह दशक तक भारतीय राजनीति में अपना सशक्त हस्ताक्षर बनाये रखा. ...सतह पर उभरा सत्ता संघर्ष
कांग्रेस के शिखर पर सत्ता संघर्ष चरम पर है. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने माओवाद के खिलाफ छेड़े गये संघर्ष पर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और गृहमंत्री पी चिदम्बरम के खिलाफ बयानबाजी करके उस सत्ता संघर्ष को सतह पर ला दिया है. दिग्विजय सिंह ने चिदम्बरम के खिलाफ आदिवासी सरोकारों के बरख्स ही बयान दिया हो ऐसा नहीं है. उनके बयान के पीछे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की मंशा साफ दिखाई दे रही है. ...संघ विचारधारा के विनोबा भावे थे नाना जी
नाना जी नहीं रहे. उनका जाना राजनीति में एक युग का अवसान है. एक ऐसे युग का अवसान जिसे खुद नानाजी देशमुख ने बानाया था. वे राजनीति में उस नैतिक साहस के प्रतीक थे जो बिनोबा भावे के बाद किसी और राजनीतिज्ञ में दिखाई नहीं देता. आज भले ही नानाजी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका काम काज और कीर्ति सदा अमर रहेगी....हमारा संविधान जो हमारा नहीं है
26 जनवरी 2010 को भारत एक गणतंत्र के रूप में 60 साल पूरे कर रहा है. अर्थात संवैधानिक आधुनिक भारत के 60 साल पूरे हो रहे हैं. भारतीय गणतंत्र के 60 साल पूरा होने के मौके पर हम देश के ख्यातनाम पत्रकारों, लेखको और संविधानविदों की एक लेखमाला प्रकाशित कर रहे हैं जो भारतीय गणतंत्र के आधार संविधान की समीक्षा करते हैं- संपादक...जैसे लिब्राहन वैसी रिपोर्ट
एक बार फिर जांच आयोग की निरर्थकता सामने आई है। राजनीति से उम्मीद वैसे ही बहुत कम हो गई है। आयोग ने भी निराश किया है। उम्मीद थी कि लिब्राहन आयोग न्यायिक प्रक्रिया से अपनी रिपोर्ट में लोगों को वह कुछ बताएगा जो अभी तक अनजाना है। इसपर आयोग खोटा साबित हुआ है। इससे जांच आयोग पर ही गंभीर सवाल खड़ा हो गया है।...प्रभाष दीपो भव !
23 नवंबर 2009 को प्रभाष जी के पार्थिव शरीर की आखिरी निशानी उनकी राख भी पावन गंगा में प्रवाहित कर दी गयी. अब वे पूरी तरह से पंचतत्व में विलीन हो चुके हैं. अब प्रभाष जी सिर्फ स्मृति में ही शेष रहेंगे. प्रभाष जोशी के सबसे निकट सहयोगी, मित्र, पत्रकार रहे रामबहादुर राय आखिर वक्त, यानी अस्थिकलश विसर्जन तक प्रभाष जी के साथ रहे. अपने मार्गदर्शक, गुरू और पिता तुल्य प्रभाष जी के बारे में राय साहब का यह एकमात्र लेख है-...Author info
