उमाशंकर मिश्र
गैरसरकारी पर सवाल कितना जरूरी?
महात्मा गांधी ने ग्रामीण विकास में स्वयंसेवी प्रयासों की भूमिका को यह कहकर प्रोत्साहित करने का प्रयास किया था कि ‘राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक दायित्व’ भी आवश्यक है।’ हम भले ही राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल कर चुके हों, लेकिन विडंबना ही कहा जायेगा कि परोपकार का जो काम कभी भारतीय समाज में नैतिक जिम्मेदारी समझ कर किया जाता था आज वह संगठित जरूर है, लेकिन कई किस्म की विकृतियां उसमें घर गई हैं और अब इसमें सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है।
अवध के ग्रामीण महिलाओं की अलख
अमेठी एवं रायबरेली की ग्रामीण महिलाएं अब स्थानीय लोकजीवन में व्याप्त पितृसत्तामक अवधारणा के समक्ष चुनौती बनकर उठ खड़ी हुई हैं और बड़े पैमाने पर उन्होंने श्वेत क्रांति का आगाज किया है। डेयरी व्यावसाय में जुटी इन महिलाओं ने 240 लीटर दूध उत्पादन से काम शुरु किया, जो बढ़कर अब 80,000 लीटर के स्तर तक जा पहुंचा है और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की मदद से यह दूध दिल्ली के बाजार तक पहंुच रहा है। उत्तर प्रदेश के परंपरागत अवधी ग्रामीण जनजीवन मे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संबल प्रदान करने वाला यह अब तक का सबसे बड़ा अभियान माना जा रहा है। ...दर्द से भरा दर्दपुरा
आतंकवाद की मार झेल चुके कुपवाड़ा जिले के दर्दपुरा को विधवाओं का गांव कहा जाता है, क्योंकि इस गांव में 200 से भी अधिक विधवा महिलाएं और करीब 400 यतीम बच्चे हैं। कश्मीर में जेहादी आतंकवाद की लड़ाई में दर्दपुरा के अधिकतर पुरुष आतंकवादियों की गोली के शिकार बन गए या फिर वे फौज की गोलियों से मारे गए।...एक जैविक गांव की ऑडिट रिपोर्ट
दुनिया के बड़े बड़े दादा लोग दुनिया के पर्यावरण को बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं. इन कोशिशों से बहुत दूर मध्य प्रदेश के खण्डवा में एक गांव ने पर्यावरण के नाम पर तो नहीं लेकिन लगातार पड़ रहे सूखे और मंहगी होती जिंदगी से पीछा छुड़ाने के लिए प्राकृतिक खेती और नैसर्गिक जीवन को अपना आधार बना लिया. अब मलगांव पर कोई संकट नहीं है. सूखे के बीच उन्होंने प्राकृतिक तरीकों से अपनी जिंदगी तर कर ली है. ...अडनी महा ठगिनी हम जानी
"यह जंगल हमारे बुजुर्गों का लगाया हुआ है, इसे हम कटने नहीं देंगे! हमने 10 फुट रास्ता सरकार से मांगा था, जो हमें नहीं मिला, जबकि अडनी समूह को पूरा जंगल दिया जा रहा है।" यह कहना है महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले ताड़ोबा अंधेरी बाघ अभ्यारण्य के बफर क्षेत्र के गांव मामला के सरपंच भारत काटवले का। उल्लेखनीय है कि चंद्रपुर शहर से सटे घने जंगल ताडोबा अंधेरी टाइगर रिजर्व के लिए एक ढाल की तरह हैं और ये जंगल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक दक्षिणवर्ती कॉरीडोर का हिस्सा है जो बाघों के प्रजनन एवं उनके अस्तित्व के लिए काफी अहम् है।...आरटीआई का अपना-अपना इस्तेमाल
सूचना अधिकार कानून के चार साल पूरे होने पर दोनों तरह की समीक्षा सामने आ रही है. कुछ लोग इसे नागरिक को सांसद का दर्जा देनेवाला कानून बता रहे हैं तो कुछ मानते हैं कि इस अधिकार को नाकाम करने के लिए नौकरशाही ने ढाल विकसित कर ली है. दोनों ही बातों में सच्चाई है. आरटीआई का उपयोग कुछ लोग निहित स्वार्थ पूर्ति के लिए जरूर कर रहे हैं लेकिन नागरिक समाज के एक बड़े हिस्से को इसका व्यापक लाभ भी मिल रहा है....पारंपरिक समाज से जनसंवाद की अनूठी पहल
राष्ट्रीय स्तर के आयोजन महज शहरों तक ही सीमित क्यों हैं, ग्रामीणों, वंचितों एवं दूरदराज के युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने की बातें आखिर कब तक एयरकंडिशंड कमरों में होती रहेगी? क्या जमीनी स्तर पर सीधे जनसंवाद के माध्यम से विकास की राह तैयार नहीं की जानी चाहिए? दरभंगा के दूरदराज के गंवई परिवेश में आयोजित राष्ट्रीय युवा समागम इन्हीं सवालों का सशक्त जवाब है।...आम आदमी की राजनीति के शिखर पुरुष थे राजशेखर
राजशेखर रेड्डी की मौत की खबर ही न जाने कितनों के लिए मौत का कारण बन गयी. उधर अभी रेड्डी को दफनाया भी नहीं गया था कि उनके जाने के गम में 122 लोगों ने प्राण त्याग दिये. आंध्र प्रदेश की स्थानीय मीडिया के मुताबिक कुछ लोगों की मौत सदमें से हुई तो कुछ की मौत का कारण रेड्डी की मौत से आहत होकर आत्महत्या बताया जा रहा है। किसी ने गोदावरी में छलांग लगा दी तो किसी ने अपने प्रिय नेता की मौत के गम में खुद को आग के हवाले कर लिया। राज्य के 23 जिलों में से 19 जिलों से लोगों के मरने की ख़बरे मिली हैं। अंतत: राजशेखर रेड्डी के पुत्र वाई.एस. जगमोहन रेड्डी को लोगों से संयम बनाये रखने की अपील करनी पड़ी। ...सिर पर सवार है मैला उतरने का नाम नहीं लेता
सभ्यता के विकास में मल निस्तारण समस्या रही हो या न रही हो, लेकिन भारत में कुछ लोगों के सिर पर आज भी मैला सवार है. तमाम कोशिशों के बावजूद भारत सरकार उनके सिर से मैला नहीं उतार पायी है जो लंबे समय से इस काम से निजात पाना चाहते हैं. हालांकि सरकार द्वारा सिर से मैला हटा देने की तय आखिरी तारीख कल बीत गयी लेकिन कल ही 31 मार्च को दिल्ली में जो 200 लोग इकट्ठा हुए थे वे आज वापस अपने घरों को लौट गये हैं. तय है, आज से उन्हें फिर वही सब काम करना पड़ेगा जिसे हटाने की मंशा लिये वे दिल्ली आये थे. उमाशंकर मिश्र की रिपोर्ट- ...भयावह भोपाल का २५ वां साल
तीन दिसंबर 1984 से लेकर अब तक भोपाल गैस त्रासदी को गुजरे हुए 24 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज भी इस इलाके में जाने पर लगता है मानों कल की ही बात हो. २४ साल बाद भी हर सुबह दुर्घटनावाले दिन की अगली सुबह ही नजर आती है. यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से ज़हरीले गैस रिसाव और रसायनिक कचरे के कहर का प्रभाव आज भी बना हुआ है। बच्चे अपंग होते रहे, मां के दूध में ज़हरीले रसायन पाये जाने की बात भी सामने आई, चर्म रोग, दमा, कैंसर और न जाने कितनी बीमारियां धीमा ज़हर बनकर आज भी गैस प्रभावितों को अपनी चपेट में ले रही हैं। भोपाल से लौटकर उमाशंकर मिश्र की रिपोर्ट-...Author info
