उमेन्द्र दत्त
किस दिन मनाएं हम अपना पर्यावरण दिवस?
पर्यावरण दिवस का आयोजन 1972 के बाद शुरू हुआ। 5 से 15 जून 1972 को स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम मेें मानवी पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन हुआ। जिस में 113 देश शामिल हुए थे। इसी सम्मेलन की स्मृति बनाए रखने कि लिए 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस घोषित कर दिया गया। सवाल तो यह है कि पर्यावरण दिवस के इस दिन का हमारे से क्या रिश्ता? क्या 1972 के बाद लगातार पर्यावरण दिवस मना लेने से हमारा पर्यावरण ठीक हो रहा है? या फिर ठिकाने लगाया जा रहा है? यह विवेचना आप करिए।
शैतानों के हवाले स्वास्थ्य सुरक्षा
हाल ही में रूस में जीएम सोयाबीन के चूहों पर हुए प्रयोगों की रिपोर्ट आई है। रिपोर्ट बताती है कि जीएम फसलें मनुष्यों के खाने के लिए कतई सुरक्षित नहीं हैं। यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आयी है जब भारत में जीएम फसलों को जनता पर जबरदस्ती थोपने की भरसक कोशिश की जा रही है। यह प्रयास करने वालों में सरकार के कुछ मंत्रालय, जीएम बीज उत्पादक कम्पनियां, कृषि वैज्ञानिक, नौकरशाह और देश की भूख मिटाने की नौटंकी में शामिल योजनाकार और अर्थशास्त्रियों तथा मीडिया के एक खासवर्ग के शतुरमुर्ग शामिल है।...खेती के मोक्षमार्ग पर पंजाब
किसी दौर में अपनी "विकसित खेती" के दम पर देश का पेट भरने का दावा करनेवाला पंजाब उस खेती की ऐसा मार झेल रहा है कि माटी पानी और जीवन सब कुछ दूषित प्रदूषित हो गया. पंजाब में प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा अतिक्रमण हुआ कि मजबूरन समाज को प्रतिक्रमण के रास्ते चलना पड़ा. रासायनिक खेती से आध्यात्मिक खेती के मोक्ष मार्ग की ओर यात्रा शुरू करनी पड़ी. प्रयोग के स्तर पर ही सही लेकिन आत्महत्या के लिए प्रयासरत पंजाब खेती के मोक्षमार्ग पर दोबारा लौटने लगा है. ...बीटी बैंगन पर सवाल ही सवाल
देश के नये पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा है कि वे बीटी बैंगन पर चल रहे प्रयोगों के परिणामों की बिना पूरी जांच-पड़ताल किये उसे बाजार में लाने की अनुमति नहीं देंगे. जयराम रमेश के इस बयान से उन आंदोलनकारियों को राहत मिली है जो लंबे समय से इसका विरोध कर रहे हैं. बीटी बैंगन के फील्ड ट्रायल कभी बंद नहीं हुए. जबकि विरोध करनेवाले जन संगठन लगातार यह मांग कर रहे हैं कि जब पूरी दुनिया बीटी (बायो-टेक्नालाजी) जनित उत्पादों को नकार रहा है तो फिर भारत इतनी जल्दबाजी में बीटी बीजों को अपने खेतों तक क्यों पहुंचने दे रहा है. बीटी बैंगन का विवाद उसी में से एक है. बीटी बैंगन के बारे में विस्तार से बता रहे हैं खेती विरासत मिशन के संस्थापक उमेन्द्र दत्त....पंजाब के किसानों का संताप
यह पंजाब मे आत्महत्याओं का दौर है जो थमने का नाम नहीं ले रहा। हरित क्रांति ने जो खुशहाली पैदा की वो बीस साल भी नहीं टिकी और 1985 से आत्महत्याओं की दुर्घटनाएं सामने आने लगीं। पहले पहल संगरूर, मानसा और बठिंडा से शुरू हुई संताप की इन लपटों ने मालवा क्षेत्र के अन्य जिलों मुक्तसर, फरीदकोट, फिरोजपुर और मोगा को अपनी चपेट में ले लिया। आज कमोबेश समूचा पंजाब किसान आत्महत्याओं से पीडित है। फिर चाहे वह माझा का अमृतसर जिला हो पुआध का पटियाला या दोआबा का जालंधर। मालवा क्षेत्र में संगरूर, मानसा, मोगा और बठिंडा सर्वाधिक पीडित जिले हैं।...यह पर्यावरण किसका है?
कनाडा स्थित इटीसी ग्रुप ने कल एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट का नाम है- हू ओन्स नेचर? ४८ पन्नों की यह रिपोर्ट कई तरह के सवाल खड़े करती है. रिपोर्ट जो सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है वह यह कि यह पर्यावरण किसका है? हमारे आस-पास जो प्राकृतिक संसाधन हैं उस पर किसका हक है? वहां निवास करनेवाले निवासियों का या फिर दूर-दराज बैठी किसी कंपनी का? ...Author info
