जफर नकवी
कुछ तो समझे ख़ुदा करे कोई
जैसे-जैसे दिन गुज़रते जा रहे हैं वैसे-वैसे अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला भी प्रभावहीन होता जा रहा है। सुलह और समझदारी की बातें अब सौदेबाजी, अप्रत्यक्ष धमकियों व चेतावनी के रूप में सामने आ रही हैं। यही वजह है कि सभी पक्ष न्याय की अंतिम सीढ़ी सुप्रीम कोर्ट की ओर देख रहे हैं, वो भी जो फैसला आने पर दिखावटी रूप से खुश हुए और वो भी जो वास्तविक रूप में निराश हुए। देर सवेर फैसले को अपनी जीत बताने वालों के कंठ में दबे हुए विचार बाहर आने लगे हैं कि हाई कोर्ट ने विवादित भूमि का जो हिस्सा बंटवारा किया, वो अनुचित और अमान्य है अर्थात फैसला आने के बाद उदारता, सहिष्णुता के साथ शांति का प्रवर्तक बनने और दिखाने की जो तात्कालिक होड़ शुरू हुई थी, उसकी हवा निकल चुकी है।
सेकुलरिज़्म ऐसा है तो फिर हिन्दू राष्ट्र में बुराई क्या?
हमारे संचार माध्यमों में प्रतिदिन सर्वाधिक सुर्खियों में रहने वाला शब्द 'धर्म निरपेक्षता’ ही है। बाबरी मस्जिद विवाद पर अदालत का फैसला आने के बाद अब ये हर एक की जुबान पर है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र 'पांचजन्य’ के सम्पादक तरुण विजय का एक लेख नज़र से गुजरा। जिस में उन्होंने लिखा है कि ''अयोध्या पर फैसला आने के बाद 'सेकुलर’ समझ नहीं पा रहे हैं कि कुछ तनाव, झगड़ा और मारकाट तो हुई नहीं इसलिये अब कैसे अपने झंडे उठाए और अमन की मोमबत्तियां जला कर रखें।...इस्लामिक आतंकवाद बनाम आदिवासी नक्सलवाद का भेदभाव
आतंकवाद शब्द पर यह भेदभााव क्यों? आखिर यह धारणा कब खत्म होगी कि अगर किसी घटना में मुसलमान पकड़े जाएं तो वह आतंकवादी घटना होगी अन्यथा नक्सलवाद, उग्रवाद या फिर अतिवाद कहलाएगा। हालांकि आतंक का शाब्दिक अर्थ तो दहशत फैलाना ही है फिर वो काम कोई भी करे आतंकवादी ही कहलाया जाना चाहिए फिर देश में मुसलमानों के साथ यह भेदभाव क्यों किया जा रहा है?...खबरदार ! अब कोई नया 'जिनाह' इस्तेमाल न हो
देश को विभाजित हुए तिरसठ वर्ष बीत चुके है लेकिन एक सवाल आज भी अनसुलझा ही है कि अखंड भारत को खंडित करने का असल जिम्मेदार कौन है? भारतीय समाज का यह ताना अकसर कानों में गूंजता रहता है कि अगर देश विभाजित न होता तो आज भारत दुनिया का सुपर पावर होता। न गरीबी की समस्या होती और न आतंकवाद व प्रृथकतावाद का रोना होता, न ही किसी राष्ट्र की हिम्मत होती कि वो विशाल और शक्तिशाली भारत की ओर आंख उठा कर देखता।...Author info
