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गूगल गणराज्य का मालिकाना हक

14 October 2008 101 views No Comment

फेशबुक सोशल नेटवर्किंग की दुनिया में वैसे ही चमकता हुआ नाम है जैसे सर्च इंजनों की दुनिया में गूगल या फिर ब्लागरों के लिए वर्डप्रेस. फेशबुक के बारे में इतनी चर्चा सुनी थी कि मन हुआ एक बार देखें तो सही आखिर यह फेशबुक है क्या बला? देखने और जुड़ने के बाद कुछ खास नयापन नजर नहीं आया. वहीं चालाकियां फेशबुक के साथ भी हैं जो दूसरी साईटों के साथ है. आपके पास जो कुछ है वह आप इंटरनेट पर डाल दीजिए. जगह हम मुहैया करायेंगे. आप सिर्फ अपने आप को अभिव्यक्त करिए आदि.

क्या कभी आपने सोचा है कि ये साईटें हमें अभिव्यक्ति के लिए इतना प्रेरित क्यों करती हैं? माले मुफ्त खिलाकर आखिर उन्हें क्या हासिल होता है? एक प्रयोग करिए. गूगल इमेज सर्च में जब भी कोई फोटो आप सर्च करते हैं तो वह उसका मूल स्रोत दिखाता है. मूल स्रोत का आशय कि इस फोटो का मालिकाना हक किसके पास है. यह कानूनन जरूरी है. अगर हम सर्च से कोई फोटो खोजकर अपनी साईट पर चिपका लेते हैं फिर भी उसका मालिकाना हक और मूल स्रोत गूगल की नजर में उसी वेबसाईट का होता है जहां से हमने वह फोटो कापी की है. (किसी हैकर ने इसका तोड़ निकाल लिया हो तो मुझे मालूम नहीं.)

ऐसे ही एक दिन मैंने एक ब्लागस्पाट के ब्लाग से एक फोटो कापी की. कापी करने के दौरान मैंने यूआरएल एड्रेस की ओर देखा तो वहां फोटो का मूल स्रोत ब्लागर दिखा रहा था न कि ब्लागस्पाट का वह ब्लाग. आप कहेंगे इसमें ऐसा खास क्या है? खास यह है कि आप जिस सर्वर पर अपनी सामग्री लोड कर रहे हैं वह ब्लागर के नाम दर्ज है. यानी आप ब्लागस्पाट पर जो भी सामग्री देते हैं उसका मालिकाना हक ब्लागर कंपनी के पास चला जाता है. यह बात सही है कि गूगल शायद ही कभी ऐसा दावा करे लेकिन अगर आपकी सामग्री कोई अन्य व्यक्ति लेता है तो कानूनन आप ब्लागर की ओर से ही दावा कर सकते हैं न कि सीधे तौर पर. ज्यादा विस्तार से समझना हो ब्लागर की सेवा शर्तों को पढ़ लें.

यही हाल सभी दूसरी पब्लिक साईटों का है. डाटकाम पराभव से बूम पर जिस एक क्रांतिकारी विचार से आ पहुंचा उसके मूल में यही सोच थी कि लोगों को अपने साथ शामिल करो. आज जितनी भी सफल डाटकाम कंपनियां हैं वे सब यही कर रही हैं. जो काम वे कर्मचारी रखकर करवातीं वह काम लोग अपने खर्चे से पूरा कर रहे हैं. आप कल्पना करिए कि फेशबुक पर एक अरब लोगों का प्रोफाईल मौजूद हो या फिर गूगल दुनिया की आधी आबादी को सेवाएं मुहैया कराता हो या फिर उनको मुफ्त में अभिव्यक्ति का मौका देता हो तो वे क्या वास्तविक गणराज्य नहीं बसा रहे हैं? 

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