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पलायन पहाड़ से ही नहीं हो रहे

Posted by संजय तिवारी on Jun 6th, 2008 and filed under बात करामात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

नीरज जोशी ने विस्फोट के लिए दो किश्तों में पहाड़ से पलायन की समस्या उठायी है और उन कारणों को भी तलाशने की कोशिश की है जिनके कारण पहाड़ से पलायन एक नियति बनी हुई है. पहले हिस्से में वे कहते हैं कि पहाड़ निर्जन बियाबान हो रहे हैं लेकिन उनके लिए जो यहां रह गये हैं. दूसरी ओर पहाड़ नयी तरह की सभ्यता की अगवानी करने की भी कोशिश में जुट गये हैं जो शहर से पलायन करके पहाड़ की ओर जा रही है.

इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि नीरज जोशी की बात में दम है. लेकिन उन्होंने पलायन के जो कारण गिनाये हैं उसमें सरकारी अक्षमता और पहाड़ के समाज के हारने की कहानी भी चलती है. आप क्या सोचते हैं, इस बहस में शामिल होकर जरूर बताएं. वैसे भी पलायन केवल पहाड़ की समस्या नहीं है. देश के तथाकथित बीमारू राज्यों में पलायन की ही अर्थव्यवस्था चलती है. यह पलायन की अर्थव्यवस्था ऐसे दौर में है कि इसे रोक देने पर लाखों जिंदगियां रूक जाएंगी. इसलिए पलायन और ब्रेन ड्रेन के तात्कालिक समाधान नहीं हो सकते.

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