हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को एक बेचैनी से दो चार होता हूं. वह बेचैनी है हम 15 अगस्त और 26 जनवरी को सरकारी तौर पर इतना महत्व क्यों देते हैं? क्या हम सचमुच एक शासनतंत्र की व्यवस्था को राष्ट्रीय पर्व मान लें और सत्ता हस्तांतरण को अपनी आजादी मान ढ़िढोरा पीटें कि हम आजाद हैं. जिनसे लड़कर हस्ता हस्तांतरण का खेल किया गया वे मुख्य दरवाजे को फट बंद करके बाहर गये और चोर दरवाजे से चुपके से अंदर आ गये. साठ साल के बाद आज आजादी का जश्न सबसे ज्यादा दो ही लोग मना रहे हैं. पहली है सरकार और दूसरी हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियां. क्यों सरकार, बहुराष्ट्रीय कंपनियां और इनके पैरोकार ही 15 अगस्त तथा 26 जनवरी को राष्ट्रीय पर्व बनाने पर अमादा है?
बचपन में मास्टर साहब प्रभात फेरी करवाते थे. गीत रटवाते थे और घर-घर घूमकर पैसा मांगते थे. जो इकट्ठा होता था उसमें से ज्यादातर आपस में बांट लेते थे और कुछ पैसों की मिठाई मंगवाते थे. एक लड्डू मिलता था. कुछ जिन्दाबाद वाले नारे लगाते और घर लौट आते थे. थोड़े और बड़े हुए तो इन दो तारीखों का उपयोग मुफ्त की रेलयात्रा और किसी पिक्चर हाल में सिनेमा देखने के लिए करते थे. इसी तरह स्वतंत्रता दिवस की इतिश्री कर देते थे. आप कह सकते हैं कि हमारी परवरिश में जश्ने आजादी का घोल पड़ा नहीं. लेकिन 90 फीसदी देश में आज भी 15 अगस्त और 26 जनवरी को यही होता है. इस बारे में हम क्या निष्कर्ष निकालें?
पिछले सात सालों से इस दिन आम दिनों की ही तरह आठ बजे सोकर उठता हूं. तब तक पड़ोस के लालकिले पर शोरगुल खत्म हो चुका होता है.(लालकिला मेरे घर से महज एक किलोमीटर दूर है) नौ-दस बजते-बजते बंद दुकाने खुलने लगती हैं. और फिर जिन्दगी सामान्य होने लगती है. पुलिस की घेरेबंदी खत्म हो जाती है. लेकिन अब फिल्मे नहीं देखता, प्रभात फेरी नहीं करता उल्टे यह सोचता हूं कि क्या सचमुच यह आजादी का पर्व है?
मैं मानता हूं इस तरह के आयोजन नहीं होने चाहिए. ब्यूरोक्रेटिक घुट्टी पिलाने से किसी के मन में राष्ट्रप्रेम नहीं पैदा होता. अगर मेरा देश मुझे जीने के समान अवसर देता है तो राष्ट्रप्रेम अपने आप झर-झर कर बहेगा. मेरा मानना है कि यह सब सरकारी खानापूर्ति है. इसे सरकारी पर्व कहना ज्यादा ठीक होगा. जो लोग आजादी का जश्न मनाते हैं सारी समस्याओं के मूल में वही लोग बैठे हैं. और फिर भारत एक विकसित देश है. इसका एक विकासक्रम है, दुनिया के अन्य कई देशों की तरह इसका गठन नहीं हुआ है. इसकी जड़े गहरी हैं और वे 1947, 1857, 1757 और 1526 से पीछे जाती हैं. जब हम 15 अगस्त को अपना राष्ट्रीय पर्व मान लेते हैं तो हम भारत की आत्मा से कट जाते हैं. ऐसा लगता है कि पाकिस्तान और भारत दोनों ही नया इतिहास लिखने में लगे हैं. जहां अंग्रेजों से लड़ाई है और उससे मिली आजादी है. इसके पहले कोई तारीख नहीं जाती. जाती भी है तो इतिहास गणना करने के लिए. मैं भारत की सनातन व्यवस्था का हिस्सा हूं.
मेरा अस्तित्व कहता है कि 15 अगस्त कोई जश्ने आजादी नहीं है. यह सत्ता हस्तांतरण की एक तारीख है जब गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज हमारे सिर पर सवार हो गये. इन काले अंग्रेजों और उनके नये-नवेले गोरे रिश्तेदारों की जश्ने आजादी में भला मेरा क्या काम?
(यह मेरे निजी विचार हैं और आप इसे पूरी तरह से खारिज करने के लिए स्वतंत्र हैं)
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संजय जी, भले ही यह आप के निजि विचार हो,लेकिन हैं तो सच्चे ।आज यही तो मायने रह गए हैं आजादी के ।
स्वतंत्रता दिवस की पावन संध्या पर शुभकामनायें !!।