15 अगस्त को अपने ब्लाग पर मैंने राष्ट्रगान के साथ एक सवाल किया था राष्ट्रगान में भाग्यविधाता कौन है? इस पर हिन्दी चिट्ठाकारों ने बहुत उम्दा बहस की है. हालांकि मेरे सवाल उठाने के पहले दो अन्य ब्लागर इस पर सवाल उठा चुके हैं.
हिन्दी ब्लागरों में सबसे पहले यह सवाल उठाया था प्रतीक पाण्डेय ने. 12 अप्रैल 2005 को अपने चिट्ठे पर उन्होंने पूछा था ये भाग्यविधाता कौन है भाई. अनिल रघुराज ने भी अपने इस पोस्ट में राष्ट्रगान के भाग्यविधाता का सवाल खड़ा किया था.
अब तक तीन बढ़िया लेख आये हैं और उस पर एक स्वस्थ्य चर्चा हुई है. पहला लेख दिया है अभय तिवारी ने. “जन-गण-मन का अधिनायक क्या जार्ज पंचम हैं?” आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेख से यह साबित करने का प्रयास है कि “रवीन्द्र मनस्वी कवि थे, वे कभी किसी विदेशी नरपति की स्तुति में इतना मनोहर गान लिख ही नहीं सकते थे।” इस लेख पर 15 लोगों ने अपनी राय दी है. इष्टदेव की टिप्पणी देखिये ” यह क्यों भूलते हैं कि द्विवेदी जी ने विश्वभारती में नौकरी भी की है?” तो अनुनाद सिंह का कथन है “द्विवेदी जी की बात किसी भी प्रकार से शंका का समाधान करने में सक्षम नहीं दिख रही है। दलीलों में दम नहीं है।”
आज 16 अगस्त को दूसरी पोस्ट फिर से अभय तिवारी ने लिखी है. चित्त जहां भयमुक्त हो. इसके अलावा ढाई आखर पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है “गुरूदेव ने क्या कहा जन-गण-मन के बारे में.” जिसमें कहा गया है कि गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने पुलिन बिहारी सेन को लिखे एक पत्र में इस गीत के बारे में लिखा है, “महामहिम की सेवा में लगे एक आला अफ़सर जो मेरे भी दोस्त थे, उन्होंने मुझसे गुज़ारिश की कि मैं सम्राट के अभिनन्दन में एक गीत की रचना करूं। इस गुज़ारिश ने मुझे चौंका दिया।” पत्र ढाई आखर पर दिया गया है.
इस विषय पर फुरसतिया के विचार भी जरूर पढ़िये.
पूरी बहस को जानने के लिए आप दिये गये लिंक पर जा सकते हैं.
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