यह हिन्दी ब्लागरी का विस्फोट काल है. कोई साल भर पहले जिस शैशव अवस्था की बात हम लोग करते थे आज सालभर बाद वह शैशव किशोरावस्था में बदल चुका है. किशोरावस्था ही असल में जीवन का भी विस्फोटकाल होता है. यही वह उम्र होती है जब शरीर और मन में सबसे ज्यादा बदलाव होते हैं. आप अबोध से सुबोध होते हैं. आप भी किशोर रहे ही हैं. आप कल्पना करिए कि उस समय शक्ति का कैसा ज्वार आपके अंदर होता है. शरीर का अंगर-अंग बारूद बन जाता है. यह काल कोई पांच-सात साल रहता है. इसी काल में बहुत सारे संस्कार और स्वभाव बनते हैं जो आगे आपकी जिंदगी की दशा तय करते हैं.
हिन्दी ब्लागरी भी अब किशोरावस्था में है. इसलिए अचानक ही विस्फोट की आहट साफ सुनाई देने लगी है. मानों बांध के उस पार जल ज्वार हिलोरे मार रहा है और उसे रोकने की कूबत किसी बांध में नहीं है. अगर बांध का दरवाजा न खुला तो हिलोरे मारती लहरे बांध को तोड़ आगे निकल जाएगी. अगले एक साल में हिन्दी ब्लागिंग में एक नया आयाम जुड़ेगा जिसे हम वेब पत्रकारिता के नाम से जानेंगे. हिन्दी ब्लागिंग के लिए यही इसका अभीष्ट भी होगा. क्योंकि भारतीय समाज और खासकर हिन्दी पट्टी के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं जिसपर संवाद करने के लिए और रास्ता तैयार करने के लिए इस सबसे प्रभावी माध्यम का उपयोग करना चाहिए. वेब के संपूर्ण स्वभाव को अगर आप देखते हैं तो यह तीन हिस्सों में बंटता दिखाई देता है.
इसका पहला हिस्सा सूचना और व्यापार का है, दूसरा हिस्सा विकृत मानसिकता के पोषण का है और तीसरा लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा जन सरोकारों के बारे में रिपोर्टिंग और जानकारी का है. मुख्यधारा की मीडिया जिसके निर्माण और प्रसार में भारी पूंजी निवेश की जरूरत होती है उससे पार पाने के लिए वेब एक सस्ता, सर्वव्यापक और स्थाई माध्यम है. अगर लालच का पोषण वेब के जरिए हो सकता है तो त्याग की शिक्षा भी इसके जरिए मिल सकती है. जब बात हिन्दी की करते हैं तो यह बात बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है.
इसमें निजी घराने और व्यावसायिक प्रतिष्ठान क्या करेंगे मालूम नहीं लेकिन इस किशोरावस्था में अगर ब्लागरों ने ब्लाग-जगत के संस्कार ठीक रखे तो जब हिन्दी ब्लागिंग कल को युवा होगी वह लंपट और रीढ़विहीन बाजार की दब्बू नहीं बल्कि स्वाभिमान से अपनी बात रखनेवाला माध्यम होगा.
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