दिल्ली दरबार “पप्पू कान्ट वोट साला”

भारतनामा “शिक्षा चाहिए संस्कार नहीं”

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अंग्रेजों से पहले का भारत

Posted by संजय तिवारी on Aug 19th, 2007 and filed under बात करामात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

विज्ञान और प्रौद्योगिकी

यह एक बहुप्रचारित मान्यता हो गयी है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हमारे पिछड़ने और ब्रिटेन के आगे होने के कारण हम ब्रिटेन से हार गये. क्या यथार्थ यही है? सत्य को एक ही कोण से क्यों देखें? सौभाग्य से कुछेक विद्वानों ने इस बारे में काम किया है और हमारे सामने तस्वीर का दूसरा पहलू भी आने लगा है.

लोहा और इस्पात का उत्पादन भारत में बहुत पहले से हो रहा है. उत्तर प्रदेश के अतिरंजन खेड़ा जैसी जगहों से कम से कम 12 सदी ईसा पूर्व से लोहे की ढलाई के प्रमाण मिलते हैं. लेकिन अठारहवी सदी में भारत में यह उद्योग कितना फल फूल रहा था, इसकी तकनीकि कितनी उन्नत थी यह बहुत कम लोगों को पता है. सन 1794 में एच स्काट ने ब्रिटिश रायल सोसायटी के अध्यक्ष सर जे बैंक्स को भारतीय भारतीय “वुटज” इस्पात का नमूना भेजा था. इंग्लैण्ड के अनेक विशेषज्ञों ने उसका विस्तृत परीक्षण किया था. उन दिनों ब्रिटेन में जो सर्वोत्तम इस्पात पैदा हो रहा था उससे यह वुटज इस्पात किसी मामले में उन्नीस नहीं था. ब्रिटेन में इस इस्पात की मांग हुई और लगातार बढ़ती गयी. पहले तो अंग्रेजों को विश्वास नहीं हुआ कि इतनी उन्नत किस्म का इस्पात भारत में बनाया जा सकता है और साजिशन कई वर्षों तक वे इसे अविकसित बताते रहे. कई वर्षों बाद जे एम हीथ लिखते हैं “भारतीय इस्पात निर्माण प्रक्रिया में ऐसा लगता है कि बंद पात्र में पिघले लोहे को कार्बनीकृत हाईड्रोजन गैस से अति उच्च तापमान में गुजारते हुए लोहे को इस्पात में बदलने की विधि प्रयोग की जाती है. इससे लोहे का इस्पात बनने में कम समय लगता है. ब्रिटेन में प्रचलित पुरानी विधि में 14 से 20 दिन लगते हैं, जबकि भारत में ढाई घंटे में लोहे को इस्पात में ढाल दिया जाता है” हालांकि हीथ ने यह मानने से इंकार कर दिया कि भारतीयों को ब्रिटेन से ज्यादा सक्षम तकनीकि ज्ञान है फिर भी वे इसे कठिन कौशल कला तो मानते ही हैं.

अंग्रेजों की इस्पात में रूचि बढ़ गयी. इसलिए अंग्रेजों द्वारा भारत में इस्पात निर्माण से संबंधित तथ्यों के अनेक वृतांत तैयार किये गये. भारत के विविध हिस्सों में अनेक स्थानों पर अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध और उन्नीसवीं सदी के आरंभ तक लोहे और इस्पात के संबंध में उन्होंने दस्तावेज लिखे और प्रकाशित किये. डाक्टर बेंजामिन हेन ने 1795 में लिखा है कि नूजीद और रमन का पेठा ऐसे स्थान थे जहां अनेक लोहे की भट्ठियां काम करती थीं. आपको यह भी बता दें कि हेन जिस नूजीद क्षेत्र का उल्लेख कर रहे हैं वहां 1786 में जनसंख्या एक लाख से ऊपर थी. 1790-92 में वहां अकाल पड़ा और जनसंख्या घटकर 57 हजार के करीब रह गयी. हेन ही बताते हैं कि अकाल से पहले रमन का पेठा में 40 लोहे की भट्टियां और संपन्न सुनार और तंबेर थे. यहां हेन एक चालाकी भरा सुझाव भी देते हैं. वे ब्रिटिश सरकार को कहते हैं कि जब कच्चा माल, तकनीकि और कुशल कारीगर सभी कुछ यहां मौजूद हैं तो इन्हें “ठेके” पर काम दिया जा सकता है.

इसी तरह बंगाल सेना के मेजर जेम्स फ्रैंकलिन ने 1829 के आसपास मध्य भारत में लोहा बनाने की विधि के बारे में लिखा है. जबलपुर जिले के अगरिया, गटना, लमतरा, बेला, मंगैला, जौली, इमलिया और बड़ागांव में, नर्मदा के दक्षिण डंगराई, पन्ना जिले में वृजपुर के पास सिमरिया, केन नदी के पास पांडव पहाड़िया, अमरौनिया, महगांव, मोतिही, कोटा जिले के सैगढ़ और चंद्रपुर, पिपरिया, रेजकोरी, कंजरा, सेरवा, हीरपुर, तिघोरा और मंडवरा में लोहे की खानें हैं और यहां इस्पात से जुड़ा कारोबार होता है. फ्रैंकलिन इसी तरह खटोला से ग्वालियर के बीच लगभग सभी पहाड़ियों पर लोहे की खदान होने की सूचना देते हैं. सागर जिले के तेंदूखेड़ा में कच्चे लोहे के विविध रूपों गुलकू, सुरमा, पीरा, काला और देवी साही का भी उल्लेख करते हैं. भट्टियों
की बनावट बहुत उन्नत थी. इसलिए फ्रेंकलिन भी अंदाज लगाते हैं ब्रिटिश शासन इस ओर ध्यान दे तो अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है.मद्रास के असिस्टेंट सर्वेयर जनरल कैप्टन जे कैंपबेल ने दक्षिण भारत में तैयार किये जाने वाले चार प्रकार के लोहे का विवरण इंग्लैण्ड को भेजा. इसमें कच्चा माल, भट्टी, ईँधन, निर्माण विधि का विवरण था. उनका भी इरादा यही था कि ब्रिटिश लोहा निर्माता और लोहा व्यापारियों को इस जानकारी का लाभ उठाना चाहिए.

मेरा अनुमान है कि 1800 ईस्वी के आसपास भारत में लगभग 10 हजार भट्टियां थीं जिसमें लोहा और इस्पात बनता था. यदि एक औसत भट्टी पर साल में 30 से 40 सप्ताह भी काम होता होगा तो साल में एक भट्टी से 20 टन बढ़िया इस्पात का उत्पादन होता होगा. ये भट्टियां वजन में हल्की होती थीं और बैलगाड़ी पर रखकर एक जगह से दूसरी जगह ले जायी जा सकती थीं. इसलिए यह मानने का कोई तुक नहीं है कि अठारहवीं सदी में ब्रिटेन का इस्पात उद्योग भारत से बेहतर था.

अठारहवीं सदी में भारत में बर्फ बनाने की तकनीकि भी विकसित अवस्था में थी. इलाहाबाद जैसे कुछ स्थानों बर्फ बनाने का विवरण अंग्रेजों ने ही दिया है. इसी तरह पटसन पौधे के उपयोग से कागज बनाये जाने का विवरण भी मिलता है. डामर बनाये जाने, गारा, रंगाई के विविध रसायनों के निर्माण की प्रौद्योगिकी भी भारत में बहुत विकसित अवस्था में थी.

उन्नत खेती
खेती और सिंचाई की व्यवस्था भी अति प्राचीनकाल से भारत में बहुत उन्नत रही है. फसल चक्र, खाद-बीज का वैज्ञानिक प्रयोग और उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी हमारे यहां थी. और आज भी है. खाद्यान्न, तिलहन, दलहन, फल, सब्जी, वृक्षारोपण, वनोपज और बागवानी की भारत में बहुत गहरी समझ थी. अकाल, सुकाल, वर्षागम, शरदागम, आदि काल ज्ञान, ऋतु ज्ञान, वायु प्रवाह और उसके परिणाम, फसल के रोगों का लक्षण और उसका उपचार, फलों और अनाजों की विविध किस्में और उनके गुण धर्म प्रभावों का ज्ञान, बीजों की पहचान, पशुओं की नस्ल व क्षमता की पहचान, पशु पालन एवं पशु आहार का ज्ञान, यह सब अठारहवीं सदी तक भारत में समृद्ध अवस्था में था. कृषि और बागवानी के लिए उन्नत उपकरण मौजूद थे. इन्हें बनानेवाले कारीगरों की एक समृध्द कड़ी मौजूद थी. सिंचाई के अत्यंत समुन्नत तरीके थे जिससे वर्षाजल और भूजल का समुन्नत उपयोग हो सके. मद्रास प्रेसीडेन्सी और मैसूर राज्य में अठारवी सदी में करीब एक लाख तालाब थे. लेकिन ब्रिटिश राज्य में उपेक्षा के कारण 1850 तक आते-आते ज्यादातर तालाब खत्म हो गये.

सन 1800 ईस्वी में भारतीय खेती की उपज दर इंग्लैण्ड की कृषि उपज दर से तीन गुनी थी. भारत में कृषि का अधिकांश काम किसान स्वंय करते थे जबकि इंग्लैण्ड में कृषि दासों के भरोसे थी.

लेखक परिचय
धर्मपाल (1922-2006) का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में हुआ था. भारत से लेकर ब्रिटेन तक लगभग 30 साल उन्होंने इस बात की खोज में लगाये कि अंग्रेजों से पहले भारत कैसा था. इसी कड़ी में उनके द्वारा जुटाये गये तथ्यों, दस्तावेजों से भारत के बारे में जो पता चलता है वह हमारे मन पर अंकित तस्वीर के उलट है. उनकी प्रमुख किताबे हैं- साइंस एण्ड टेक्नालॉजी इन एट्टींथ सेंचुरी, द ब्यूटीफुल ट्री, भारतीय चित्त मानस और काल, भारत का स्वधर्म, सिविल डिसआबिडिएन्स एण्ड इंडियन ट्रेडिशन, डिस्पाइलेशन एण्ड डिफेमिंग आफ इंडिया.

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7 Responses for “अंग्रेजों से पहले का भारत”

  1. अनुनाद सिंह says:

    धरमपाल जी के योगदान पर हिन्दी में प्रविष्टि लिखकर आपने हिन्दी चिट्ठाकारी को एक अनछुए धरातल तक पहुँचा दिया है। उनके जीवन और महान कार्यों के उपर अन्तरजाल पर अंगरेजी में बहुत सामग्री है किन्तु हिन्दी में सर्वथा अभाव है। मैने उनकी कैइ पुस्तकें पढ़ी है। बहुत आननद आता है। धरमपाल जी मौलिक हैं, थोथे नकलची नहीं।

    अन्तरजाल पर कुछ सम्पर्क सूत्र:
    Dharampal, the Great Gandhian and Historian of Indian Science
    http://www.infinityfoundation.com/mandala/t_es/t_es_agraw_dharampal_frameset.htm

    http://www.dharampal.net: online repository of the works of Shri. Dharampal
    http://www.dharampal.net/

    http://www.dharampal.blogspot.com: Blog on Shri. Dharampal by Nagarjuna – Westthink
    http://www.dharampal.blogspot.com/

    http://en.wikipedia.org/wiki/Dharampal

    Dharampal – Modern Indian Philosopher
    http://dharampal.wordpress.com/

  2. Anonymous says:

    कुछ तो कारण रहे होंगे जो हम इतने कमज़ोर पड़ गये की आक्रमणकारियों ने हम पर इतने सालों तक राज किया?
    मेरे ख्याल से ये कारण सामाजिक थे. हमारी जात-पात में बंटी व्यवस्था इतनी लचर और स्वार्थि हो गयी थी की लोग सोचते थे की जब तक उनका घर या राज्य सुरक्षित है, उन्हें चिंता की जरुरत नहीं. इसका बहुत बड़ा दोष हमारी धार्मिक व्यवस्था को जाता है. जहां हमें साथ नहीं अलगाव सिखाया गया.
    कई सौ साल पहले हमारे यहां जनपद थे, फिर ये सभ्यता कैसे सड़ गई, इसका विश्लेषण कहं मिलेगा.

  3. संजय तिवारी says:

    जाने के बाद धर्मपाल जी बहुत याद आते हैं. जहां कहीं भारत-भारतीयता की बात उठती है, पट उनकी कही गयी बातें याद आती हैं. मेरा उनसे दो तीन साल का संबंध था वो भी उनके जीवन के आखिरी दिनों में. लेकिन दिल्ली आते तो मुझे बुलवाते. मैं नहीं जानता क्यों? लेकिन बुलवाकर मिलते थे.

    जीवन के आखिरी दिनों में वे बहुत विदग्ध थे. कहते थे आज के दौर में गांधी जी होते लाठी के सहारे टेककर चलते नहीं उसी लाठी से लोगों को मारते. और मार-मार कर ठीक कर देते. उनकी इन बातों का मतलब अब समझ में आता है लेकिन मैं जाकर उन्हें बता भी नहीं सकता कि धर्मपाल जी आप ठीक कहते हैं.

    उनके किये गये कार्य को मैं क्रमिक रूप से नेट पर हिन्दी में ले आने की कोशिश करूंगा. भाई अनुनाद सिंह ने जो लिंक दिये हैं उससे मुझे बहुत मदद मिलेगी. क्योंकि उनके कार्य का जो हिन्दी अनुवाद हुआ है वह स्तरीय नहीं है.

  4. Shastri JC Philip says:

    आप ने इस लेख को छाप कर हम सब भारतीयों को गौरवान्वित किया है. समाज के एक और चिंतक/नायक के बारे में जानने का मौका भी मिला — शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

  5. अनूप शुक्ला says:

    अच्छा लगा यह लेख!

  6. Sanjeet Tripathi says:

    साधुवाद इसे यहां पेश करने के लिए!

  7. Isht Deo Sankrityaayan says:

    मित्र! १८वीं शताब्दी से पहले पारे के शोधन की विधि केवल भारत के पास थी. लेकिन उन लोगों का क्या करिएगा जिन्हे सिर्फ अपने पूर्वजों ko gariyane mein jeevan का sara aanand dikhaaii deta hai . दूसरे यह भी क्यों भूलते हैं कि यहाँ मलाई काटने का हक हमेशा कुछ खास लोगों को ही रहा है. जो उस तबके से बाहर राहे हैं उनके लिए हमेशा यही कोशिश की गई है कहीँ उनके भीतर आत्मसम्मान न पैदा हो जाए. क्योंकि यह बड़ा बेहूदा कीडा होता है. अगर इसने किसी को पकड़ लिया तो उस पर शासन करना मुश्किल हो जाता है. इस बात को महात्मा गांधी और उनके चेले बहुत अच्छी तरह जानते रहे हैं. यकीन मानिए, भारतीय समाज को आज भी जितनी अच्छी तरह सोनिया गांधी समझती हैं, कोई और नहीं जानता. इसके सबसे बडे प्रमाण मनमोहन सिंघहै. बताइए, अब भी आप चाहेंगे कि हमें अपनी उपलब्धियों पर गौरव हो?

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