मैं आज अपने आप को नहीं रोक पा रहा हूं, यह जानते हुए कि इससे कई मित्र नाराज हो जाएंगे. हो सकता है मुझे टिप्पणियों का टोटा भी झेलना पड़े और यह भी हो सकता है कि मुझे एक अघोषित बहिष्कार का सामना भी करना पड़े. फिर भी मैं अपने आप को नहीं रोक सकता. मैं यह सवाल उठा रहा हूं कि क्या भाषा पर साहित्य बोझ है? खासकर हिन्दी में?
आप कह सकते हैं कि मुझे साहित्य का कखग नहीं पता. मेरी हैसियत क्या है जो मैं इस तरह के सवाल उठाऊँ? शायद कुछ हैसियत न होना ही मेरे लिए फायदेमंद है कि मैं यह सवाल उठा रहा हूं. हिन्दी साहित्य भाषा के कांधे बोझ की तरह लदी है. हिन्दी साहित्यकारों ने प्रकाशकों के साथ मिलकर जो राजनीति की उसके कारण हिन्दी अनुवाद की भाषा बनकर रह गयी. पत्रकारिता को ही देख लीजिए. बदलते परिवेश के साथ पत्रकारिता ने अपनेआप को ढाला भी तो भाषा को सांप-छछूंदर और अजग-गजब शैली में ढाल दिया. टीवी मीडिया को सबसे ज्यादा प्रचारित किया हिन्दी ने और आज उसकी मलाई अंग्रेजीवाले काट रहे हैं. आप पूंछेगे क्यों? तो वह इसलिए क्योंकि हिन्दी चैनलों ने अपनी औकात दिखा दी. उन्होंने साबित कर दिया कि वे जन्मजात बौड़म हैं. जो नहीं हैं उन्हें हिन्दी की व्यवस्था बौड़म बना देती है.
अब चले आईये चिट्ठाकारी की दुनिया में. अव्वल तो कुछ लोग इसे वैकल्पिक मीडिया मानने से ही इंकार करते हैं. ऐसे लोगों की अपनी समझ और गोलबंदी है. वे भाषा को साहित्य की सतही समझ और आत्मप्रवंचना से आगे जाने नहीं देना चाहते. रोटी का रोना रोनेवाले समाज में लालित्य कैसे पैदा हो जाता है मुझे तो यही हजम नहीं होता. इंटरनेट पर हिन्दी में जानकारी चाहिए रोजी रोटी की. विज्ञान की. तकनीकि की. इतिहास की. भूगोल की. पर्यावरण की. पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान की. लोकतंत्र की. गांव-गणराज्य की. और हमें साहित्य सृजन से फुर्सत नहीं हैं. चिट्ठाकारों आपकी समझ आपको मुबारक लेकिन साहित्य से भाषा नहीं बचती. अगर वह बचती भी है तो उसका वही हाल होता है जो आज हिन्दी का है. आज के प्रतियोगी दौर में ऐसा साहित्य भाषा पर बोझ नहीं तो और क्या है?
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आपकी बात विचार करने योग्य है । इस पर और बात होनी चाहिये । कैसे इस स्थिति को बदला जाए भी सोचा जाना चाहिये ।
घुघूती बासूती
विचारणीय एवं गौरतलब.
“आज के प्रतियोगी दौर में ऐसा साहित्य भाषा पर बोझ नहीं तो और क्या है?”
आप ने एकदम सही कहा है, लेकिन सागर को गागर में भर दिया है, जिस कारण अधिकतर लोग आपके तर्क को समझ नहीं पायेंगे. इस विषय पर विस्तार से बिन्दुवार चर्चा होनी चाहिये — शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
ji aap ka ye prasan bahut hi jaroori hai aaj k samay me hindi ko log bhool rhae hai
एक तो लानत भेजो इस नाराजगी के डर पर- ओ भई अगर ये नहीं लिखोगे तो क्या नाराज होने वालों को नाराज होने से रोक लोगे
एक तो थोड़ा और खुलासे की जरूरत है पर प्रथम दृष्टया हमें थोड़ा सरलीकरण जान पड़ता है। मतलब साहित्य वाले हिंदी पर बोझ हैं तथा साहित्य हिंदी पर बोझ हैं ये अलग अलग बाते हैं, सही शायद इनमें से कोई भी न हो पर दोनों अलग अलग मात्रा में गलत हैं। ऐसा हमें लगता है।
साहित्य वालों की दुकानदारी की वजह से कुछ कुछ नुक्सान भाषा को हुआ है पर फिर थेड़ा बहुत फायदा भी हुआ है।
कुल मिलाकर तो हमें लगता है कि थोड़ा बात को आगे बढ़ाएं तो बात से मर्म की बात निकलकर आए
सत्यवचन। खबरनवीस होने के नाते मैं इसे रोज शिद्दत से महसूस करता हूं। विचारणीय सवाल उठाने के लिए शुक्रिया..
आपकी बात सही है लेकिन रोने धोने से भी कुछ नहीं होगा। हिन्दी को एकबार तो खुद को साबित करना ही होगा कि वो विज्ञान, तकनीक, शोध के लिए उपयुक्त भाषा है, बातों से नहीं यथार्थ में। यानि कम से कम एक ऐसा कार्यालय, स्कूल, लैब आदि तो होना ही चाहिए जहाँ हर काम हिन्दी में होता हो। फिर ही यकीन हो सकता है कि हिन्दी इस लायक भी है।
बहुत मौज़ूं सवाल उठाए हैं आप ने मित्र.. इस पर किसी की नाराज़गी की परवाह न करें.. और इन सवालों पर जो नाराज़ होता हो वह परवाह किए जाने योग्य है भी नहीं..
अब पिछले दिन आप ने जिन धर्मपाल जी का लेख छापा..उनके जैसा काम करने वाले हिन्दी में कितने लोग हैं.. विडमबना ये है कि तमाम दूसरे दानिशमन्दों की तरह वे भी अंग्रेज़ी में लिखते थे..
साहित्य की विधा ही तो अलग-अलग हैं पर साहित्य तो साहित्य है!
आवश्यकता है तो बस इन्हीं साहित्यिक-विधाओं में प्रकारान्तर से विषय-वस्तु चुनने की। जैसे- विज्ञान के विषयों पर कहानी या उपन्यास या सामाजिक बुराइयों पर नृत्यनाटिका का शब्दरुप।
नीरस और बोझिल लेख/आलेख और निबंध तो दस्तावेज़ की तरह संजोए जाते हैं उनसे सर्वागींण साहित्य की बात नहीं बनती।
इस बात पर विचार करना ज़रुरी है कि बदलाव कैसे लाया जाए!
सौ टके सही बात । भाई दिक्कबत साहित्यी से नहीं है । मुझे लगता है कि दिक्ककत है गोलबंदी से ।
मुझे लगता है कि यही गोलबंदी उन तमाम क्षेत्रों में भी हो सकती है जो आपने गिनाए हैं । लेकिन वहां शायद ऐसी शाबाशी ना मिले जो आपस में बांटी जा रही है ।
मेरा सोचना आपके सोच से ठोड़ा अलग है। मैं साहित्यकारों के कार्य को बुरा नहीं मानता हूँ। हिन्दी में कुछ चीजों का अभाव बुरा है – जैसे मेडिकल जानकारी, कानूनी जानकारी, विज्ञान-विषयक जानकारी, शिल्प आदि की जानकारी आदि। लेकिन इसके लिये साहित्य की अधिकता को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? इसके लिये वे लोग जिम्मेदार हैं जो इन क्षेत्रों में हैं, इसी की रोटी खाते हैं, किन्तु इस जानकारी को हिन्दी में लिखने का कष्ट(?) नही उठाना चाहते।
भारत में अंगरेजी की शिक्षा का उद्देश्य यह निर्धारित किया जाना चाहिये कि छात्र, शोधार्थी या विशेषज्ञ अंगरेजी की जानकारी को आत्मसात करें किन्तु जो जानकारी पैदा करें वह हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में हो। दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार कोई विद्युत मोटर वैद्युत उर्जा लेकर यांत्रिक उर्जा उत्पन्न करती है, उसी तरह ये लोग अंगरेजी की जानकारी लेकर उसे परिवर्धित करते हुए हिन्दी में परिवर्तित करके भारतीय जनता के लिये उपयोगी बनायें।
इस प्रकार भारत को शाश्वत रूप से भाषायी मानसिक गुलाम बनने से बचाया जा सकता है।
“इंटरनेट पर हिन्दी में जानकारी चाहिए रोजी रोटी की. विज्ञान की. तकनीकि की. इतिहास की. भूगोल की. पर्यावरण की. पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान की. लोकतंत्र की. गांव-गणराज्य की.”
एकदम सही बात कही है आपने। हम भी बहुत समय से यही कहते आए हैं कि इंटरनैट पर इस तरह की उपयोगी जानकारी यूक्त लेखन होना चाहिए।
हाँ इसके लिए ज्यादा साहित्य लिखना ही जिम्मेदार है, ये शायद जरुरी नहीं। इस बारे में अनुनाद जी सही कहते हैं कि लोग अपने क्षेत्र विशेष से संबंधित लिखें। लेकिन क्या देखता हूँ कि यहाँ डॉक्टर से लेकर सॉ्फ्टवेयर इंजनियर तक कविता करने में लगे हैं।
आपकी पोस्ट कुछ हड़बड़ी में लिखी गयी लगती है। साहित्य अगर समृद्ध है तो वो रोजी-रोटी के अवसर कम करेगा-यह समझ नहीं आता। लेखक-प्रकाशक गठजोड़ होना अलग बात है, साहित्य का बोझ होना अलग बात है। आगे शायद विस्तार से अपनी बात फिर कभी लिखें। जानकारी के लिये सब लोग अपने-अपने स्तर से नेट पर अपने-अपने क्षेत्र की चीजें डालें। विकीपीडिया में लिखें।
संजय जी! मसिजीवी की बात पर गौर करें. आप की बात वास्तव में समझ से परे है.
और हाँ, डरना-वरना ज़रा छोड़ दें. अब आपकी डरने की उम्र नहीं रही.
आप सबका धन्यवाद. मैं साहित्यविरोधी नहीं हूं लेकिन केवल साहित्य लेकर मैं क्या करूं? आपके सवाल और अपनी चिंताओं के संदर्भ में मैं अगली पोस्ट लिखूंगा.