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	<title>Comments on: भाषा का साहित्य बोझ</title>
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		<title>By: संजय तिवारी</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-352</link>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 18:44:00 +0000</pubDate>
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		<description>आप सबका धन्यवाद. मैं साहित्यविरोधी नहीं हूं लेकिन केवल साहित्य लेकर मैं क्या करूं? आपके सवाल और अपनी चिंताओं के संदर्भ में मैं अगली पोस्ट लिखूंगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप सबका धन्यवाद. मैं साहित्यविरोधी नहीं हूं लेकिन केवल साहित्य लेकर मैं क्या करूं? आपके सवाल और अपनी चिंताओं के संदर्भ में मैं अगली पोस्ट लिखूंगा.</p>
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		<title>By: Isht Deo Sankrityaayan</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-351</link>
		<dc:creator>Isht Deo Sankrityaayan</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 18:12:00 +0000</pubDate>
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		<description>संजय जी! मसिजीवी की बात पर गौर करें. आप की बात वास्तव में समझ से परे है.  &lt;br/&gt;और हाँ, डरना-वरना ज़रा छोड़ दें. अब आपकी डरने की उम्र नहीं रही.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>संजय जी! मसिजीवी की बात पर गौर करें. आप की बात वास्तव में समझ से परे है.  <br />और हाँ, डरना-वरना ज़रा छोड़ दें. अब आपकी डरने की उम्र नहीं रही.</p>
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		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-350</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 16:56:00 +0000</pubDate>
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		<description>आपकी पोस्ट कुछ हड़बड़ी में लिखी गयी लगती है। साहित्य अगर समृद्ध है तो वो रोजी-रोटी के अवसर कम करेगा-यह समझ नहीं आता। लेखक-प्रकाशक गठजोड़ होना अलग बात है, साहित्य का बोझ होना अलग बात है। आगे शायद विस्तार से अपनी बात फिर कभी लिखें। जानकारी के लिये सब लोग अपने-अपने स्तर से नेट पर अपने-अपने क्षेत्र की चीजें डालें। विकीपीडिया में लिखें। :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी पोस्ट कुछ हड़बड़ी में लिखी गयी लगती है। साहित्य अगर समृद्ध है तो वो रोजी-रोटी के अवसर कम करेगा-यह समझ नहीं आता। लेखक-प्रकाशक गठजोड़ होना अलग बात है, साहित्य का बोझ होना अलग बात है। आगे शायद विस्तार से अपनी बात फिर कभी लिखें। जानकारी के लिये सब लोग अपने-अपने स्तर से नेट पर अपने-अपने क्षेत्र की चीजें डालें। विकीपीडिया में लिखें। <img src='http://visfot.com/blog/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
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		<title>By: Shrish</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-349</link>
		<dc:creator>Shrish</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 13:49:00 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;i&gt;&quot;इंटरनेट पर हिन्दी में जानकारी चाहिए रोजी रोटी की. विज्ञान की. तकनीकि की. इतिहास की. भूगोल की. पर्यावरण की. पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान की. लोकतंत्र की. गांव-गणराज्य की.&quot;&lt;/i&gt; &lt;br/&gt;&lt;br/&gt;एकदम सही बात कही है आपने। हम भी बहुत समय से यही कहते आए हैं कि इंटरनैट पर इस तरह की उपयोगी जानकारी यूक्त लेखन होना चाहिए। &lt;br/&gt;&lt;br/&gt;हाँ इसके लिए ज्यादा साहित्य लिखना ही जिम्मेदार है, ये शायद जरुरी नहीं। इस बारे में अनुनाद जी सही कहते हैं कि लोग अपने क्षेत्र विशेष से संबंधित लिखें। लेकिन क्या देखता हूँ कि यहाँ डॉक्टर से लेकर सॉ्फ्टवेयर इंजनियर तक कविता करने में लगे हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><i>&#8220;इंटरनेट पर हिन्दी में जानकारी चाहिए रोजी रोटी की. विज्ञान की. तकनीकि की. इतिहास की. भूगोल की. पर्यावरण की. पारंपरिक और आधुनिक ज्ञान की. लोकतंत्र की. गांव-गणराज्य की.&#8221;</i> </p>
<p>एकदम सही बात कही है आपने। हम भी बहुत समय से यही कहते आए हैं कि इंटरनैट पर इस तरह की उपयोगी जानकारी यूक्त लेखन होना चाहिए। </p>
<p>हाँ इसके लिए ज्यादा साहित्य लिखना ही जिम्मेदार है, ये शायद जरुरी नहीं। इस बारे में अनुनाद जी सही कहते हैं कि लोग अपने क्षेत्र विशेष से संबंधित लिखें। लेकिन क्या देखता हूँ कि यहाँ डॉक्टर से लेकर सॉ्फ्टवेयर इंजनियर तक कविता करने में लगे हैं।</p>
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	<item>
		<title>By: अनुनाद सिंह</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-348</link>
		<dc:creator>अनुनाद सिंह</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 13:21:00 +0000</pubDate>
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		<description>मेरा सोचना आपके सोच से ठोड़ा अलग है। मैं साहित्यकारों के कार्य को बुरा नहीं मानता हूँ। हिन्दी में कुछ चीजों का अभाव बुरा है  - जैसे मेडिकल जानकारी, कानूनी जानकारी, विज्ञान-विषयक जानकारी, शिल्प आदि की जानकारी आदि। लेकिन इसके लिये साहित्य की अधिकता को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? इसके लिये वे लोग जिम्मेदार हैं जो इन क्षेत्रों में हैं, इसी की रोटी खाते हैं, किन्तु इस जानकारी को हिन्दी में लिखने का कष्ट(?) नही उठाना चाहते। &lt;br/&gt;&lt;br/&gt;भारत में अंगरेजी की शिक्षा का उद्देश्य यह निर्धारित किया जाना चाहिये कि छात्र, शोधार्थी या विशेषज्ञ अंगरेजी की जानकारी को आत्मसात करें किन्तु जो जानकारी पैदा करें वह हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में हो। दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार कोई विद्युत मोटर वैद्युत उर्जा लेकर यांत्रिक उर्जा उत्पन्न करती है, उसी तरह ये लोग अंगरेजी की जानकारी लेकर उसे परिवर्धित करते हुए हिन्दी में परिवर्तित करके भारतीय जनता के लिये उपयोगी बनायें। &lt;br/&gt;&lt;br/&gt;इस प्रकार भारत को शाश्वत रूप से भाषायी मानसिक गुलाम बनने से बचाया जा सकता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मेरा सोचना आपके सोच से ठोड़ा अलग है। मैं साहित्यकारों के कार्य को बुरा नहीं मानता हूँ। हिन्दी में कुछ चीजों का अभाव बुरा है  &#8211; जैसे मेडिकल जानकारी, कानूनी जानकारी, विज्ञान-विषयक जानकारी, शिल्प आदि की जानकारी आदि। लेकिन इसके लिये साहित्य की अधिकता को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? इसके लिये वे लोग जिम्मेदार हैं जो इन क्षेत्रों में हैं, इसी की रोटी खाते हैं, किन्तु इस जानकारी को हिन्दी में लिखने का कष्ट(?) नही उठाना चाहते। </p>
<p>भारत में अंगरेजी की शिक्षा का उद्देश्य यह निर्धारित किया जाना चाहिये कि छात्र, शोधार्थी या विशेषज्ञ अंगरेजी की जानकारी को आत्मसात करें किन्तु जो जानकारी पैदा करें वह हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं में हो। दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार कोई विद्युत मोटर वैद्युत उर्जा लेकर यांत्रिक उर्जा उत्पन्न करती है, उसी तरह ये लोग अंगरेजी की जानकारी लेकर उसे परिवर्धित करते हुए हिन्दी में परिवर्तित करके भारतीय जनता के लिये उपयोगी बनायें। </p>
<p>इस प्रकार भारत को शाश्वत रूप से भाषायी मानसिक गुलाम बनने से बचाया जा सकता है।</p>
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		<title>By: yunus</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-347</link>
		<dc:creator>yunus</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 11:55:00 +0000</pubDate>
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		<description>सौ टके सही बात । भाई दिक्कबत साहित्यी से नहीं है । मुझे लगता है कि दिक्ककत है गोलबंदी से ।&lt;br/&gt;मुझे लगता है कि यही गोलबंदी उन तमाम क्षेत्रों में भी हो सकती है जो आपने गिनाए हैं । लेकिन वहां शायद ऐसी शाबाशी ना मिले जो आपस में बांटी जा रही है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सौ टके सही बात । भाई दिक्कबत साहित्यी से नहीं है । मुझे लगता है कि दिक्ककत है गोलबंदी से ।<br />मुझे लगता है कि यही गोलबंदी उन तमाम क्षेत्रों में भी हो सकती है जो आपने गिनाए हैं । लेकिन वहां शायद ऐसी शाबाशी ना मिले जो आपस में बांटी जा रही है ।</p>
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		<title>By: Sanjeet Tripathi</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-346</link>
		<dc:creator>Sanjeet Tripathi</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 09:57:00 +0000</pubDate>
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		<description>इस बात पर विचार करना ज़रुरी है कि बदलाव कैसे लाया जाए!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इस बात पर विचार करना ज़रुरी है कि बदलाव कैसे लाया जाए!</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: MAN KI BAAT</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-345</link>
		<dc:creator>MAN KI BAAT</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 08:32:00 +0000</pubDate>
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		<description>साहित्य की विधा ही तो अलग-अलग हैं पर साहित्य तो साहित्य  है!&lt;br/&gt;आवश्यकता है तो  बस इन्हीं साहित्यिक-विधाओं में  प्रकारान्तर से विषय-वस्तु चुनने की। जैसे- विज्ञान के विषयों पर कहानी या उपन्यास या सामाजिक बुराइयों पर नृत्यनाटिका का शब्दरुप।&lt;br/&gt;नीरस और बोझिल लेख/आलेख और निबंध   तो दस्तावेज़ की  तरह संजोए जाते हैं उनसे सर्वागींण साहित्य की  बात नहीं बनती।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>साहित्य की विधा ही तो अलग-अलग हैं पर साहित्य तो साहित्य  है!<br />आवश्यकता है तो  बस इन्हीं साहित्यिक-विधाओं में  प्रकारान्तर से विषय-वस्तु चुनने की। जैसे- विज्ञान के विषयों पर कहानी या उपन्यास या सामाजिक बुराइयों पर नृत्यनाटिका का शब्दरुप।<br />नीरस और बोझिल लेख/आलेख और निबंध   तो दस्तावेज़ की  तरह संजोए जाते हैं उनसे सर्वागींण साहित्य की  बात नहीं बनती।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-344</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Aug 2007 01:18:00 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत मौज़ूं सवाल उठाए हैं आप ने मित्र.. इस पर किसी की नाराज़गी की परवाह न करें.. और इन सवालों पर जो नाराज़ होता हो वह परवाह किए जाने योग्य है भी नहीं.. &lt;br/&gt;अब पिछले दिन आप ने जिन धर्मपाल जी का लेख छापा..उनके जैसा काम करने वाले हिन्दी में कितने लोग हैं.. विडमबना ये है कि तमाम दूसरे दानिशमन्दों की तरह वे भी अंग्रेज़ी में लिखते थे..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत मौज़ूं सवाल उठाए हैं आप ने मित्र.. इस पर किसी की नाराज़गी की परवाह न करें.. और इन सवालों पर जो नाराज़ होता हो वह परवाह किए जाने योग्य है भी नहीं.. <br />अब पिछले दिन आप ने जिन धर्मपाल जी का लेख छापा..उनके जैसा काम करने वाले हिन्दी में कितने लोग हैं.. विडमबना ये है कि तमाम दूसरे दानिशमन्दों की तरह वे भी अंग्रेज़ी में लिखते थे..</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: रजनीश मंगला</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/112/comment-page-1#comment-343</link>
		<dc:creator>रजनीश मंगला</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Aug 2007 23:34:00 +0000</pubDate>
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		<description>आपकी बात सही है लेकिन रोने धोने से भी कुछ नहीं होगा। हिन्दी को एकबार तो खुद को साबित करना ही होगा कि वो विज्ञान, तकनीक, शोध के लिए उपयुक्त भाषा है, बातों से नहीं यथार्थ में। यानि कम से कम एक ऐसा कार्यालय, स्कूल, लैब आदि तो होना ही चाहिए जहाँ हर काम हिन्दी में होता हो। फिर ही यकीन हो सकता है कि हिन्दी इस लायक भी है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपकी बात सही है लेकिन रोने धोने से भी कुछ नहीं होगा। हिन्दी को एकबार तो खुद को साबित करना ही होगा कि वो विज्ञान, तकनीक, शोध के लिए उपयुक्त भाषा है, बातों से नहीं यथार्थ में। यानि कम से कम एक ऐसा कार्यालय, स्कूल, लैब आदि तो होना ही चाहिए जहाँ हर काम हिन्दी में होता हो। फिर ही यकीन हो सकता है कि हिन्दी इस लायक भी है।</p>
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