निजी डायरी लेखन से अलग हटकर ब्लाग सार्वजनिक हित का माध्यम बने यह हिन्दी ब्लागिंग की सबसे बड़ी जरूरत है और काम भी. इसके सामाजिक और आर्थिक कारण हैं. आज भारत में अधकचरे भूमंडलीकरण का दौर है. कंपनियां अपना प्रभुत्व स्थापित कर रही हैं और लोगों को बताया जा रहा है कि विकास जैसा कोई काम हो रहा है. ऐसे में जनसंचार माध्यम पूरी तरह से कंपनियों के प्रभाव में काम कर रहे हैं. ऐसा करना उनकी मजबूरी है. अब समाज की बात, मूल समस्याओं की बात चाहते हुए भी मीडिया घराने नहीं उठाते हैं. ऐसे में ब्लागिंग एक सशक्त माध्यम बन सकता है. भारत कोई अमेरिका और यूरोप नहीं है जहां भरे-पेट लोगों को अभिव्यक्ति का साधन चाहिए. यहां लोगों की आवाज उठाने का माध्यम चाहिए जो लगभग मुफ्त हो और जिसकी पहुंच सार्वदेशिक हो. अपनी भाषा में हो तो क्या कहने. यहां विज्ञापनों की वैसी बंदिशें भी नहीं हैं कि आपके लिखने पर तय हो कि आपको विज्ञापन मिलेगा या नहीं. इसलिए हिन्दी ब्लागिंग का स्वरूप थोड़ा भिन्न होगा. कोई ब्लागिंग को इस नजरिये से देखता है तो खुशी होती है.
मैं खुद ब्लाग को वैकल्पिक मीडिया के रूप में देख रहा हूं और इसी दिशा में काम करने के लिए अपने दूसरे कई सारे कार्यों से निजात पा ली है. भूमंडलीकरण के इस दौर में जब टीवी और अखबार भी सच कहने से कतराते हैं तो ब्लाग्स एक शसक्त माध्यम बनकर उभर सकते हैं. हिन्दीवाले अपनी कहानी कविता के चक्कर में पीछे रह गये तो एक उभरते माध्यम के साथ न्याय नहीं होगा. क्योंकि अगला नया माध्यम कब अस्तित्व में आयेगा नहीं कह सकते. 15 अगस्त के मौके पर जार्ज पंचम और रवीन्द्र नाथ टैगोर के राष्ट्रगान लेखन पर जो बहस चली थी वह अपने-आप में दस्तावेजों का संकलन बन गयी. इसी तरह परमाणु समझौते पर भी ब्लागरों द्वारा की गयी बहस का परिणाम है कि आपको इंटरनेट पर इस विषय पर पर्याप्त सामग्री मिल जाएगी. ऐसे और अवसरों को पैदा करने की जरूरत है जब हिन्दी ब्लागिंग साहित्य की राजनीति और निजी अभिव्यक्ति से थोड़ा आगे निकलकर सार्वजनिक हित के मुद्दों को अपना विषय बनाएं.
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