न्याय-अन्याय की इस लड़ाई में आखिरकार न्याय हार गया. सुप्रीम कोर्ट को सम्माननीय होने का दर्जा देते हुए भी मैं यह महसूस करता हूं कि एसएस नार्वे अथवा ब्लूलेडी को तोड़ने का आदेश देकर 12 पंचायतों, कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं और हजारों मजदूरों के साथ अन्याय किया है जो इसके तोड़ने का विरोध कर रहे थे. मुझे इस बात का कोई भय नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आलोचना करने से मैं कानून का असम्मान करनेवाला घोषित हो जाऊंगा. अगर सच को कहने में सुप्रीम कोर्ट भी आड़े आता है तो हमें सच का साथ देना चाहिए. कानून और कानूनी संस्थाएं भी आखिरकार इंसानों द्वारा बनायी और चलायी जाती हैं, इसलिए उनके निर्णयों की आलोचना करने का हक एक नागरिक होने के नाते हमसे कोई नहीं छीन सकता.
11 मंजली इमारत के समान और 46 हजार टन वजनी ब्लू लेडी अलंग के तट पर खड़ा है.
अलंग के तट पर यह धोखाधड़ी से ले आया गया था. इस जहाज पर रेडियोएक्टिव पदार्थ मौजूद हैं. पीसीबी और एसबेस्टस का भारी जखीरा है. यह जहाज जून 2006 से भारतीय समुद्र में खड़ा है और कई तरह के अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करता है. चार दिन पहले ही
अपने एक अंतरिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिन जहाजों पर प्रदूषित सामग्री का खतरा है उन्हें भारतीय तटों पर नहीं तोड़ा जा सकता. इसकी जांच कर भारतीय एजंसियां सुनिश्चित करें कि उन जहाजों में प्रदूषण फैलानेवाले पदार्थ हैं या नहीं. लेकिन चार दिन बाद ही उसी अदालत ने ऐसा आदेश दिया जो उसके अपने ही आदेश का मखौल उड़ाता है.
एसएस नार्वे पर बनी संसदीय समिति ने भी यह माना था कि जहाज पर ऐसे जहरीले रसायन, पीसीबी, पीवीसी और रेडियोएक्टिव पदार्थ मौजूद हैं जो न केवल भारतीय पर्यावरण को गंदा करेंगे बल्कि उस जहाज को तोड़नेवाले मजदूरों को भी नुकसान पहुंचाएंगे. यह रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट के पास है. फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने यही माना कि ब्लू लेडी को तोड़ने से सैकड़ों मजदूरों को काम मिलेगा. भले ही इस काम के लिए मजदूरों को
1240 मीट्रिक टन रेडियो एक्टिव पदार्थ से जूझ कर अपनी जिंदगी को दांव पर लगाना पड़े.
सुप्रीट कोर्ट सुप्रीम है और उसे चुनौती देना किसी के लिए भी भारी पड़ सकता है. इसलिए अब व्यावसायिक अपराधी सुप्रीम कोर्ट को अपने साथ मिलाने की जुगत लगाते हैं. इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि ऐसे व्यावसायिक अपराधी अपनी जुगत में सफल हो रहे हैं.
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जब समिति ने अपनी रपट में कहा कि उसमें हानिकारक पदार्थ है फ़िर यह फ़ैसला आखिर किस आधार पर दिया गया, सिर्फ़ और सिर्फ़ इस आधार पर कि सैकड़ों मजदूरों को काम मिलेगा।
बात कुछ हज़म नही होती। क्या सैकड़ो लोगो को काम मिलने से पर्यावरण को नष्ट किए जाने की कोशिश को सहमति दी जा सकती है वह भी तब जबकि उन सैकड़ों लोगों की भी जान पर बन ही आएगी!!
चार दिन में ही फैसले का बदलना दिखा देता है कि कानून के व्याख्याकार कितने निहित स्वार्थों से संचालित होते हैं। वरना, शब्दों के मायने में चार दिन में नहीं बदला करते।