बात उन दिनों की है जब अयोध्या में रामजन्मभूमि आंदोलन चल रहा था. दिल्ली से जत्थे कारसेवा करने के लिए जा रहे थे. बजरंगदल का एक जत्था अटल बिहारी वाजपेयी से आशिर्वाद लेने उनके आवास 6 रायसीना रोड गया था. अटल जी ने बजरंगियों से कहा था- “बजरंगदलवालों, अयोध्या जा रहे हो. लंका नहीं. इस बात का ध्यान रखना.” बजरंगियों ने ध्यान नहीं रखा. वे अयोध्या और लंका का फर्क नहीं समझ पाये और शायद अपनी भूमिका भी.
बजरंगियों ने अयोध्या को लंका समझ लिया और वह सब किया जो लंका में हनुमान करके लौटे थे. परिणाम क्या हुआ हम सब जानते हैं.
हमारे कुछ चिट्ठाकार भी चिट्ठाजगत को लंका बनाने में लगे हुए हैं. इससे किसका भला होगा कह नहीं सकते. कल चंडूखाना पर जो कुछ पढ़ने को मिला उससे तो यही लगता है कि हम अयोध्या जाना पसंद ही नहीं करते. हमें तो लंका जाना है. ऊधम मचाना है. वही भाषा समझनी है जो भड़ास, मां भवानी या चंडूखाने के नक्कारे से उठेगी. सवाल है क्या हमारी मानसिकता इतनी नकरात्मक है? अगर हां तो भाषा की दरिद्रता बनी रहेगी. भाव की दरिद्रता बनी रहेगी. हम गर्व से कभी न कह सकेंगे कि हम हिन्दी के चिट्ठाकार हैं, शायद…………
जिस बैठक का विश्लेषण चंडूखाना में किया गया है उसमें विशेष अतिथि के तौर पर आये कन्हैया लाल नंदन ने एक बात कही थी जिसे हममें से कईयों ने शायद नहीं सुनी. उन्होंने कहा था “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरूपयोग जो करता है सबसे अधिक खामियाजा उसे ही भुगतना पड़ता है.” एक बात इसमें और जोड़ देते हैं कि स्वतंत्रता का ऐसा दुरूपयोग करनेवाले लोग अच्छी-खासी अयोध्या को लंका बना देते हैं.
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अच्छा लगा कि आपने इस बात को रेखांकित किया। चंडूखाने वाली पोस्ट पढ़कर मुझे अफसोस हुआ था कि मैं बेकार नंदनजी को वहां लेकर गया। पता नहीं किसने लिखी है और किसने लिखवायी है वह पोस्ट। मुझे तो वसीम बरेलवी का एक शेर याद आता है- नये जमाने की खुद मुख्तारियों को कौन समझाये, कहां से बच निकलना है कहां जाना जरूरी है।
ईश्वर इन्हे सन्मति दे जिससे इन्हे अयोध्या और लंका का फ़र्क समझ आये ।
अनूपजी और श्री कन्हैयालाल नंदन के बारे में ऐसी बाते लिखने का आखिर क्या उद्देश्य हो सकता है, मेरी समझ से तो परे है ।
उस दिन वहाँ नारद का कौन सा आदमी मौजुद था, बताया जाय.
नारद पर वाहियात चिट्ठो और चिट्ठाकारों के लिए कोई स्थान नहीं है.
मैने अभी तक एक दो ही चिट्ठाकार-बैठकों में भाग लिया है और उनमें भी तटस्थ रहने की ही कोशिश की है.अब लगता है कि शायद किसी और इस तरह की बैठक में भाग नहीं लुंगा.मिलना ही किसी से होगा तो वन टू वन मिल ही सकते हैं ना.
मुझे भी लगा कि नंदन जी का वहां आना बेकार ही गया.
तुच्छ मानसिकता वाले चाहे जहाँ भी जाए और जहाँ भी बिठा दिए जाएंगे, लिखेंगे वही कचरा जो उनके दिमाग मे होगा। यही हाल चंडूखाना और भड़ास मे दिखा, भवानी वाला ब्लॉग मैने देखा नही, इसलिए नही जानता। ऐसे लोगों को इग्नोर करना ही सही है, किसी भी तरह का बढावा नही देना चाहिए।
गंदी भाषा चाहे किसी भी ब्लॉग मे हो, उसका भर्त्सना की जानी चाहिए।
@अनूप जी,
वसीम बरेलवी की इस गजल का पहले शेर का भी जिक्र होना चाहिए…
उसूलों पर जो आंच आए, तो टकराना जरूरी है
अगर जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना ज़रूरी है
और मेरी समझ से तिवारी जी ने ये बात अपने पोस्ट के द्वारा कह दी है.
sanjay ji rashtra vandaneiya hai.
काकेशजी की बात से सहमति जताता हूं-कभी भी ब्लागर्स मीट में नहीं जाऊंगा। जिनसे मिलना है, उनसे व्यक्तिगत रुप से जाकर मिलूंगा।
अब हम भी ऐसे लोगो से नही मिलना चाहेगे जी..
ट्रालिंग के मसले पर पूर्व में कई मित्रों ने लिखा है। पिछले दौर में मोहल्ला से लेकर भड़ास, पंगेबाज़, भवानी और अब चंडूखाना के बहाने हिन्दी ब्लॉगजगत में अनेकानेक विवाद खड़े हुए हैं। कुछ के नाम छूट गए हैं जो याद नहीं आ रहे हैं। बहसें छिछालेदर के स्तर तक पहुंच गई। शुक्र है कि कुछ ने अपने रास्ते बदल लिए और रचनात्मक हो गए।
संजय जी के नज़रिए से मैं सहमत हूं। चंडूखाने की यह नकारात्मक ब्लॉगरी है, कुंठागीरी कहें तो ज़्यादा ठीक होगा।
नंदन जी की उपस्थिती वाकई हिंदी चिट्ठकारों के लिये गर्व का विषय होना चाहिये थी मगर अफसोस है कि उनकी उपस्थिती का न तो लाभ लिया गया और न ही कोई मार्गदर्शन।
अफसोस कि चिट्ठाकारी में गंदगी फैलाने वालों के पीछे हर बार कुछ गिने चुने चेहरे ही नजर आते हैं।
संजय भाई आपने बहुत ही सटीक उदाहरण के साथ बात रखी है!!
दर-असल अपनी वैचारिक बुद्धि को सर्वश्रेष्ठ मानने और दूसरों को कमतर आंकने वालों की लेखनी ही ऐसी पोस्ट लोगों से लिखवाती है जैसी कि चंडूखाने में लिखी गई है।
हद है!!
जब मूल्यों के प्रति केवल अवमानना व्यकत होने लगे तो संवाद की सभी संभावनाएं नष्ट हो जाती हैं। हम खेद व्यक्त करते हैं कि हम अनूपजी व नंदनजी से मिलने का लोभ संवरण न कर सके आगे से ऐसे मिलनों से दूर रहेंगे।