यह चंडूखाना कौन है, इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है. मैने जितना पता किया है उससे वह आदमी पकड़ में आ गया है. कहते हैं चोर कितनी भी सावधानी रखे कुछ सबूत छोड़ जाता है. उसने अपने लिखने में कुछ सबूत छोड़े हैं जिससे अंदाज लग गया है कि वह कौन है. अगर मैंने उसका नाम ले लिया तो वह सबकी नजरों में गिर जाएगा. वैसे भी यह कर्म उसने होश में नहीं किया है. इसके पहले भी ये सज्जन कमाल कर चुके हैं. और उस बैठक में थे. लोगों का प्यार बटोर रहे थे. पुराने चिट्ठाकार हैं, लिखने पढ़नेवाले आदमी हैं और अपनी मूल लेखनी के अलावा मजे लेने के लिए यह कर्म करते रहते हैं.
उनका इस बार मजा लेना हम सबको बहुत भारी पड़ गया.
अनूप शुक्ल बहुत सरल व्यक्ति हैं. मानों अहंकार उन्हें छू नहीं सका है. नहीं तो सरकारी नौकरी करनेवाला आदमी स्वभाव से अकड़ू होता है और सर्वज्ञ की गलतफहमी में जीता है. उनकी टिप्पणी है कि “चंडूखाने वाली पोस्ट पढ़कर मुझे अफसोस हुआ था कि मैं बेकार नंदनजी को वहां लेकर गया।”
आलोक पुराणिक को मैं सात सालों से जानता हूं. तब वे कोई मशहूर व्यंगकार नहीं थे. फिर भी उनके व्यवहार में कोई फर्क नहीं आया है. मिलने-जुलने वाले आदमी वे तब भी थे और आज भी हैं. वे टिप्पणी करते हैं- “कभी भी ब्लागर्स मीट में नहीं जाऊंगा। जिनसे मिलना है, उनसे व्यक्तिगत रुप से जाकर मिलूंगा।”
काकेश जी तो बहुत शांत व्यक्ति हैं. तकनीकि की दुनिया में रहनेवाले आदमी हैं. फिर भी हिन्दी ब्लाग्स के प्रति एक समर्पण और दीवानगी है. वे भी लिखते हैं-”अब लगता है कि शायद किसी और इस तरह की बैठक में भाग नहीं लुंगा.”
मसिजीवी ने भी टिप्पणी भेजी है कि “आगे से ऐसे मिलनों से दूर ही रहेंगे.”
और अरूण अरोरा ने अपनी अन्य टिप्पणियों को डिलिट कर जो आखिरी टिप्पणी भेजी वह यह कि “अब हम भी ऐसे लोगो से नही मिलना चाहेगे जी..”
मतलब लिखना भले ही जारी रहे मिलना शायद व्यक्तिगत ही होगा. एक गलत कदम कितना नुकसान कर सकता है इसका अंदाज महाशय को नहीं लगा जिन्होंने आनन-फानन में एक पोस्ट करके धीरे-धीरे शुरू हो रही एक परिपाटी को बनने होने से पहले ही खत्म कर दिया.
मैं तो सिर्फ इतना ही कहूंगा चंडूखाने वाले दोस्त यह तुमने अच्छा काम नहीं किया. याद रखना जो उजाड़ने का काम करते हैं वे खुद उजड़ जाते हैं. चिट्ठाकारिता लंका न बने, अयोध्या ही बनी रहे, इसी कामना के साथ
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सन्जीव जी
समय इन महाशयो पर व्यर्थ न करें ।
।वस्तुजगत में रहना तो मजबूरी है साइबर स्पेस पर ब्लाग शौक के लिए है । यहां हम किसी के लिए नही हैं। अपने लिए हैं बस । कोई अपना समझे तो सही न समझे तो भी सही । इमानदारी से भडास निकाले तो सही कुंठाएं भी निकाले कोई बात नही। देखिये,पढिये और आगे बढिये ।चन्डूखाने ,कसाईबाडे अपनी आते-जाते रहेन्गे ।
मुझे आश्चर्य है की एक बकवास को गम्भीरता से लिया गया. पढ़ो थुको और नए ब्लॉगर मिलन की तैयारी करो.
इसी बात पर खुश हो लें कल एक ब्लॉगर मिलन होने वाला है, अतः विवरण की प्रतिक्षा करें
वैसे हमें पत्रकारों की काबलियत पर शक नहीं, कोई कह रहा था, यह चण्डू गुजरात से है और हम दम साधे नाम उजागर होने की प्रतिक्षा कर रहे थे, पता तो चले…और अब आप कह रहें है वो मीट में हाजिर था.
अफसोसजनक!!
आप जानते हैं तो नाम बताईये, जो हुआ अच्छा नही है और यह नही भूलना चाहिये कि कल हिंदी दिवस है।
दीपक भारतदीप
अरे संजीव भाई आप भी नाहक परेशान हो रहे हैं। बकने दीजिए ऐसे लोगों को, उनके कहने से कुछ सच थोड़ी न हो जाएगा।
बाकी साथियों से भी मेरा यही अनुरोध है कि इस तरह की पोस्टों को लेकर परेशान न हों। बस नजरअंदाज करें।
सही है, नज़रअंदाज़ करना ही सही होगा ऐसे लोगो को और ऐसे चिट्ठों को!!
नीरज ने लिखा ,संजीत त्रिपाठी आपने तो जीतू के साथ मिलकर टिप्पणी की ,लिंक भेजे,क्या सारा बताया जाये.
हम छूईमुई नही है जो इनके कुछ कहने से मुरझा जायेगें।
वैचारिक मतभेद अपनी जगह होने चाहिऐ किन्तु सर्वजनिक कार्यक्रमों में उल्लेख नही किया जाना चाहिऐ। चंडूखाना पर जो भी लिखा गया वह तुच्छ मानसिकता को प्रतीक देता है। ऐसे लोगों के इग्नोर करना ही ठीक है। जहॉं तक मै समझता हूँ तो कभी कभी कुछ बात न ही कही जाये तो अच्छा है। चंडूखाना अभी नया ब्लाग लगता है और उन्हे व्यवहारिकता का ज्ञान नही है। अर्थात जितना अपने आपको लगाते है उतने है नही। मीट में कोई ब्लगर का ही आना एकाधिकार नही है। कोई भी आ सकता है मैने ऐसा करके दिखाया है।
फुरसतिया जी और नंदन जी के बारे में यह कहने से बचना चाहिऐ था। अभिव्यक्ति को इनता भी स्वतंत्र नही करें कि वह नंगी होकर नचने लगें।
मै भी दिल्ली में रहा, शायद यही कारण रहा कि मैने किसी पंचाइत का आयोजन का हिस्सा होने से बचने कि कोशिस की। क्योकि पंचाइत ब्लागर मीट मे अन्दर की बात भी बाहर आने लगती है जिसका अनुभव मैने इलाहाबाद के ब्लागर मीट में किया था। पर बखान करने की इच्छा नही हुई।
मै उस किसी भी ब्लागर मीट का हिस्सा नही बनूँगा जिसमें तीन से ज्यादा व्यक्ति होगें। ( अपवादों को छोड कर)