भारत में कंपनियों का प्रभाव बढ़ रहा है. 2001 में देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में कंपनियों की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत थी. 2007 में बढ़कर 21 प्रतिशत पहुंच गयी. कंपनियों से मेरा आशय सिर्फ कारपोरेशन है न कि पूरी इंडस्ट्री. यह कंपनीराज के लिए सुखद समाचार हो सकता है कि वे देश के कुल उत्पादन के 21 प्रतिशत पर अपनी दावेदारी रखते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो देश की 21 प्रतिशत अर्थव्यवस्था को देश की चंद बड़ी कंपनियां नियंत्रित करती हैं. छह सालों में 7 प्रतिशत की यह तेजी कंपनियों के सुनहरे भविष्य का संकेत है. इस सुनहरे संकेत को देश के भविष्य के साथ जोड़कर देखनेवालों को कुछ और बातों पर भी ध्यान देने के बाद ही कोई निर्णय करना चाहिए.
देश की 21 प्रतिशत जीडीपी पर काबिज हो चुकी कंपनियों के लाभार्थी देश की कुल आबादी के 0.1 प्रतिशत से भी कम हैं. यानी आप मान सकते हैं कि पूंजी का बहुप्रतिक्षित केन्द्रीयकरण शुरू हो चुका है. जल्द ही हम इस तरह के आंकड़ों से खेलने लगेंगे कि भारत में एक प्रतिशत आबादी के पास देश के कुल संसाधन का शायद 60-70 फीसदी है बाकी के 30-40 फीसदी संसाधन पर पूरा देश जीवन यापन कर रहा है.
इस बात को तब और बल मिलता है जब खबर आती है कि सरकार देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली को फूड कूपन से बदलने जा रही है. सब कुछ वैसा ही जैसा शायद अमरीका वगैरह में होता है. हम यह भूल जाते हैं कि सड़क पर दिखनेवाला गरीब एक समृद्ध अतीत से आता है. दिल्ली की झुग्गी बस्तियों का 2005 में एक लघु सर्वे किया गया था. कुछ उत्साही युवकों ने एक डाक्युमेन्ट्री फिल्म बनाने के लिए यह सर्वेक्षण किया था. दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में नर्कयापन कर रहे गरीब और उपेक्षित लोग एक समृद्ध अतीत से आते हैं. वे कभी सम्मानित कारीगर या किसान होते थे. राज ने अपने हिसाब से समाज में हस्तक्षेप किया तो किसान और कारीगर दिहाड़ी के अशिक्षित मजदूर बन गये. ऐसे ही एक किसान ने कहा था कि खेतों में यूरिया-डाई का प्रयोग इतना किया कि खेत सुरसा का मुंह बन गये. जितना मिलता है उससे ज्यादा निवेश करना पड़ता है. जब खेती मंहगा सौदा बन गयी तो शहर आ गये. यहां मजदूरी करते हैं तो दो वक्त की रोटी मिल जाती है.
विदेश की समझ से शहरी नासमझ जो योजनाएं तैयार करते हैं उससे गांव का विकास कम, शहर और विदेश में बैठे पूंजीपतियों का विकास ज्यादा होता है. यह एक शोषण यंत्र की भांति काम करता है जो गांव की समृद्धि को सोखकर शहर और विदेश में उड़ेल आता है. शोर यह सुनाई पड़ता है कि पूंजीनिवेश के जरिए विकास का काम हो रहा है. जबकि अति मर्यादित शब्दावली में भी कहें तो इसे किसी षण्यंत्र से कम नहीं कहा जा सकता. फिर भी जमाना ऐसा है कि षण्यंत्र को विकास और शोषण को पूंजीनिवेश का नाम दे दिया गया है. अब आप विकास और पूंजीनिवेश का विरोध कैसे कर सकते हैं?
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समाधान क्या है उस पर भी लिखें.
संजय आपने इन बड़े सरमायेदरों के कुचक्र और मुनाफाखोरी पर पर्याप्त लिख दिया है. अब अपना ब्लू-प्रिण्ट बतायें कि देश कैसे चले.
विकास के नाम पर पूरे राष्ट्र को खोखला करने का यह काम बेहद खतरनाक राह पर जा रहा है। कल को जब किसानों और बेरोजगारों की फौज बगावत पर उतरेगी तो सारी झांकी गायब हो जाएगी। संजय जी, सही बात उठाई है।
ज्ञानदत्त जी से सहमत!!