आंकड़ो से भूख भले न मिटती हो फिर भी आंकड़े महत्वपूर्ण तो होते ही हैं. कई बार ये आंकड़े बुद्धि विलास के साधन हैं तो कई बार आंकड़े हमारे नकली चेहरों को आईना भी दिखाते हैं. आप देख सकते हैं कि सेंसेक्स 19 हजार छू गया है और इस छुअन में कई पूंजीपतियों की पेटियां थोड़ी और वजनी हो गयी हैं लेकिन क्या इससे उन पच्चीस हजार लोगों की मौत रूक जाएगी जो रोजाना इसलिए काल के गाल में समा जाते हैं क्योंकि उनके पेट खाली हैं. यह दोनों आंकड़े ही हैं. सवाल है हमारी प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? क्या हम आंकड़ों की विलासिता से अपने फटे में पैबंद लगाएं या फिर नये सिरे से सोचना शुरू करें ताकि भय पैदा करते आंकड़े कुछ अच्छे संकेत दें.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक-दो बार कहा है कि असमानता का बढ़ना खतरनाक है. इसी साल 24 मई को सीआईआई की एक बैठक में उन्होंने उद्योगपतियों से कहा था कि यह असमानता अच्छा संकेत नहीं है. यह प्रधानमंत्री की सदिच्छा है. और इसे केवल उनकी सदिच्छा ही मानना चाहिए. क्योंकि अमीरी और गरीबी के बीच संतुलन कभी सरकारी नीतियों से नहीं साधा जा सकता. जैसे अमीरी कोई व्यावसायिक व्यवस्था नहीं है वैसे ही गरीबी भी कोई सरकारी आंकड़ेबाजी का ही विषय नहीं है. अमीरी और गरीबी दोनों समाज और जीवनदर्शन का हिस्सा हैं. अमीर होना अच्छा है. लेकिन गरीबों की लाश पर अमीर होना अच्छा नहीं है.
पूंजीपति होने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन दूसरों के हक अधिकार को सीमित कर पूंजी इकट्ठी करना अपने आप में बहुत बड़ी बुराई है. समाजवाद के पतन के साथ भारत में यह दौर तेजी से बढ़ा है. हालांकि अभी यह शुरूआती दौर में है और पूंजीपतियों ने अभी लाशों के ढेर लगाने शुरू ही किये हैं लेकिन ऐसे ही नीतियों पर काम होता रहा तो अमीरी और गरीबी के बीच का अंतर चार सौ प्रतिशत से बढकर चार हजार प्रतिशत और फिर चार लाख प्रतिशत भी हो सकता है. इस असमानता को प्रधानमंत्री सदिच्छा में दिये गये अपने एक भाषण से खत्म नहीं कर सकते.
असल में हमें अपने विकास के वर्तमान फार्मूले से निजात पानी होगी. असमानता और गरीबी इसके सिद्धांत में है. मैं नहीं जानता कि असुर कभी धरती पर रहे हों. लेकिन अगर रहे होंगे तो उनके काम करने का तरीका भी बिल्कुल वैसा ही रहा होगा जैसा आज कारपोरशन्स का दिखता है. अपनी अमरता के लिए ये कंपनियां कोई भी फार्मूला गढ़ सकती हैं और पैसे की ताकत से उसे विकास का अनिवार्य हिस्सा घोषित कर सकती हैं. कंपनियों और सरकार में बैठे कंपनियों के दलालों ने शब्दों के मायने बदल दिये हैं. विकास, आर्थिक सुधार, निवेश, ढांचागत विकास, मजबूत अर्थव्यवस्था आदि अच्छे शब्द हैं. लेकिन कंपनियों ने इन शब्दों के मायने बदल दिये हैं.
इन बदले हुए मायनों की धुंध से सच बाहर झांके भी तो कैसे? क्योंकि जो भी इनके खिलाफ बोलता है वह विकास के खिलाफ बोलनेवाला समझ लिया जाता है. ऐसे में प्रधानमंत्री भी असमानता के बढ़ते संकेतों को भले ही खतरनाक मान लें लेकिन उनकी इस सदिच्छा से गरीब का भाग्य नहीं बदल जाएगा. यह इस विकास का अनिवार्य हिस्सा है कि एक ओर जैसे-जैसे पेटियों का भार बढ़ेगा दूसरी ओर पेट का खालीपन बढ़ता चला जाएगा.
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सैंसेक्स का बढना देश की प्रगति का प्रतीक नहीं हो सकता. देश की प्रगति अपने ही हित हेतु बनाये गये आंकड़ों से भी नहीं नापी जा सकती है. देश सचमुच प्रगति तब तक नहीं कर सकता जब तक देश में भूख से एक भी मौत होती है.अच्छा विचारोत्तेजक लेख.
वाकई! कल यही ख्याल आ रहा था कि सेंसेक्स फ़ि्र चढ़ गया सरकार से लेकर मीडिया तरक्की का ढोल पीटेंगी! पर इस बढ़त के पीछे जो देश की हालत है उसका क्या!!
प्रभावी लेख!!
“इन बदले हुए मायनों की धुंध से सच बाहर झांके भी तो कैसे? क्योंकि जो भी इनके खिलाफ बोलता है वह विकास के खिलाफ बोलनेवाला समझ लिया जाता है.”
सही कहा आपने. कुछ दिनों पहले सोनियाजी ने भी कुछ एसी ही र्राग मे कहा था जो भी इस नुक्लेअर डील का विरोध करेगा वो देश का, देश के विकास का विरोध करेगा. अब ऐसे में प्रधानामंत्रिजी की सदिच्छा भी किस काम की.
एक बहुत ही अच्छा लेख.
विकास और समृद्धि की सरिता का प्रवाह पूंजी के हिमालय से गरीब जनता के महासागर की तरफ नहीं है। यह एक ऐसी नदी है जो उल्टी दिशा में बहती है।
जब तक भ्रष्टाचार को पूरी तरह से खत्म नहीं किया जाएगा और जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों में संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का भाव पैदा नहीं होगा, तब तक देश में विकास और समृद्धि को समाज के अंतिम आदमी तक ले जाना पाना असंभव है।
यह तब होगा जब प्रेस और न्यायपालिका आम जनता के हित में काम करना शुरु करे। चिंता की बात यही है कि न तो मीडिया में आम जनता के हितों के प्रति सरोकार बचा है और न ही न्यायपालिका में।