आज संजीव भाई ने तीजनबाई पर एक सुंदर लेख अपने ब्लाग पर डाला है. लेख पढ़ते और तीजनबाई के बारे में सोचते हुए न जाने क्यों आँखों से आंसू छलक गये. मन में यह धारणा फिर पक्की हो गयी कि हमारे आसपास आज भी बड़े लोग हैं जो किसी न किसी माध्यम से हमारे कष्टों को कम करने का प्रयास कर रहे हैं. और ऐसा करने का वे कोई ढिंढोरा नहीं पीटते. वे हमेशा तुच्छ और असार दिखनेवाले माध्यमों से अपना संदेश देते हैं. यह तो उनका बड़प्पन है कि उनके छूने से छोटी-छोटी बातें भी बड़ी और सारगर्भित लगने लगती हैं.
संजीव के लेख में यह पढ़ा कि तीजनबाई भी अपने खेतिहर संगीतकारों के लिए किस तरह चिंतित रहती हैं तो अचानक खां साहब की याद आ गयी. शरीर को छोड़ते समय भी उनको भी दो ही चिंताएं थी. बेटी (शहनाई) का क्या होगा और साजिंदों की चिंता कौन करेगा. आप क्या कहेंगे कि उस्ताद बिस्मिल्ला खां क्या केवल एक उम्दा शहनाईवादक थे? जब उन्होंने शहनाई पकड़ी थी तब के दौर में शहनाई शादी ब्याह में बजने वाला एक आम वाद्ययंत्र था जो आधुनिक वाद्ययत्रों के शोर में लगातार मौन होती जा रही थी. फिर अचानक शहनाई को बिस्मिल्ला खां मिल जाते हैं. और मजाक में पिपिहरी बन चुकी शहनाई लाखों लोगों का अजीज वाद्य बन गयी. उस्ताद को सुनते हैं तो लगता है यह शहनाई हमारे भीतर के तारों को झंकृत कर रही है. वे शहनाई में प्राण फूकते थे तो सारी प्रकृति उनके साथ मिलकर सुरों की रचना करती थी. और सच मानिये वे और शहनाई दो नहीं थे. यह तय करना जरी मुश्किल काम है कि कौन शरीर था और कौन आत्मा. लेकिन थे दोनों एक-दूसरे के पूरक.
तीजनबाई को देखता हूं तो मुझे खां साहब याद आते हैं. शायद तीजनबाई और पांडवानी को हम आप अलग-अलग करके देखें लेकिन दोनों एक ही हैं. एक शरीर तो दूसरी उसकी आत्मा. जब तीजनबाई गाती हैं तो समूची प्रकृति उनके साथ लयबद्ध होने के लिए आतुर हो जाती है. उनके गाये शब्द हमें अंदर से निशब्द कर देते हैं. वे स्रोता के साथ सहज और मौन संबंध स्थापित करती हैं. संजीव ने उन्हें छत्तीसगढ़ की बेटी का संबोधन दिया है. जरूर वे छत्तीसगढ़ की बेटी हैं और ऐसी बेटी पर केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं समूचे भारत और पूरी मानवता को नाज होना चाहिए.
आप कभी आबिदा परवीन को सुनिये. आबिदा परवीन पाकिस्तान की हैं और सूफी कलाम गाती हैं. पंजाबी और सिन्धी के कलाम ज्यादा गाये हैं. हो सकता है आपको उनके गाये शब्दों के अर्थ समझ में न आयें लेकिन वे गाती हैं तो सुर सरूर हो जाते हैं और देह की मट्टी पार करके रूह में समा जाते हैं. शब्दों को समझने की फुर्सत किसे रहती है.
ऐसे महान लोग कितनी साधारण जिन्दगी जीते हैं और कैसी छोटी-छोटी बातों से अपने को अभिव्यक्त करते हैं. वे हमें कोई शोध प्रबंध से उद्धरण नहीं देते है. अपनी बात कहने के लिए वे श्रेष्ठ उपकरणों का भी चुनाव नहीं करते. लेकिन बात में इतनी ताकत कि बात ही बात बचती है और हम खो जाते हैं. शायद ऐसा ही होता है कि बड़े लोग हमेशा छोटी-छोटी बातों को अपना माध्यम बनाते हैं. इन माध्यमों का उपयोग कर वे कुछ कहना चाहते हैं. शायद वे कोई संदेशवाहक हैं जो किसी भी माध्यम के सहारे लोगों तक पहुंचना चाहते हैं. उनका काम है हमारे मन को साफ करना. हमारी दिलों में जमी गर्द को झाड़कर वे हमें हमारा ही अक्स दिखाते हैं. वे क्या माध्यम चुनते हैं इसका बहुत मतलब नहीं है. फिर चाहे वह पांडवानी हो, शहनाई हो या फिर आबिदा परवीन का सूफी कलाम. माध्यम कोई भी हो वे अपना संदेश बड़ी सहजता से हम तक पहुंचा देते हैं.
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बेहतरीन!!!!!!!!!!! सलाम आपको!!
महानता सामान्य कार्य में परिलक्षित हो जाती है।
काश इसका कुछ प्रतिशत भी हम लोग किसी काम में दे पाते.
सही फरमाया. आप ही की बात हमारी भी मानी जाये.
इन लोगों द्वारा किये गये कार्य महान हैं.