क्या`बराबरी´ बहुत गूढ़ शब्द है ? पारिवारिक और सामाजिक जीवन में बराबरी की लालसा ही समस्त संघर्षों का आधार है। बराबरी शब्द का महत्व उनसे पूछिए जो निचली पायदानों पर खड़े हैं। जाति, धर्म, भाषा, अर्थव्यवस्था हर जगह अपने से नीचे की एक श्रेणी है जिसका शीर्ष पर आना मना है। वह निचला पायदान जाति में सेवक है, धर्म में पिछलग्गू है, भाषा में अनुवाद है और अर्थव्यस्था में दलित है।
मेरी समझ यह कहती है दलित पैदा किये हैं अर्थव्यवस्था ने। जो समूह में आये तो जाति बन गये। आज भी अर्थव्यवस्था दलित पैदा कर रहा है। नौकरीपेशा किसी समूह को जब मैं देखता हूं तो जाति की अवधारणा और उसके विरोध में चल रहे जन आंदोलनों की थोथी और भोथरी रणनीति पर हंसी आती है। ऊंच-नीच और छूआछूत का भेदभाव पहले कैसा था यह कहना मुश्किल है लेकिन आज जितना दिखता है उससे यही लगता है कि पहले शायद इतना भेदभाव नहीं रहा होगा। नये सामंत पैदा हो गये हैं। नये कुलीन और भद्र अस्तित्व में आ गये हैं जो जाति व्यवस्था को नये सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। आधार वही है – आर्थिक असमानता।
आरक्षण की राजनीति को समझने के लिए हमें मुख्यरूप से दो बातों को जानना होगा। पहला इसका सामाजिक आधार और दूसरा इसके आर्थिक कारण। मूल सवाल यह है कि क्या देश को जातिगत आरक्षण की जरूरत है? कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि हां जरूरत है और यही वह हथियार है जिससे उन समस्याओं का समाधान हो जाएगा जिसके बीज आज से सैकड़ों साल पहले रोपे गये थे। दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो यह मानते हैं कि आरक्षण से समस्याएं सुलझने की बजाय और उलझ जाएंगी। सरकारी नौकरियों में आरक्षण का परिणाम देखकर आश्चर्य होता है। यह क्रीमी लेयर कहां से पैदा हो गया? और उसको आरक्षण के लाभ से लाभान्वित और वंचित करने की बहस क्यों पैदा हो गयी है?
यह बहस इसलिए पैदा हो गयी है क्योंकि सरकारी नौकरियों में आरक्षण से पिछड़ों के बीच सवर्ण पैदा हो गये हैं। ये `सवर्ण´ अपनों के बीच रहते और जिस लाभ के कारण वे शीर्ष पर पहुंचे हैं उस लाभ को प्रसादरूप में दूसरों को बांटते इसकी बजाय वे जमात छोड़कर ही बाहर हो गये। वे भी अब पिछड़े वर्ग से उतने ही दूर हैं जितना कि अगड़ा तबका। सामाजिक रूप से देखें तो सवर्णों में दलितों और वंचितों का एक बड़ा तबका खड़ा हो गया है। सरकार के सर्वे और आंकड़ों में इसके विश्लेषण की कोई व्यवस्था नहीं है लेकिन शहर इस बात के प्रमाण हैं कि रोजी-रोटी के लिए सवर्ण उन उपायों को अपनाने लगे हैं जिससे जाति व्यवस्था के प्रभाव के कारण वे अभी तक परहेज करते थे। इसका असर गांवों में भी हुआ है। परंपरागत रोजगार की जगह आज बड़े पैमाने पर सवर्ण दुकानदार, मजदूर, तकनीशियन और सेवा के दूसरे कामों में लगे हुए हैं।
(जारी)
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सहमति तो है पर समाधान क्या है.
इतना तो गूढ़ नहीं है।