यमुना की गंदगी और उसकी सफाई के बारे में ऊपर जितनी हलचल दिखती है घाट पर उतना ही सूनापन है. साफ-सफाई के सरकारी दावे और गैरसरकारी प्रयास दोनों ही खोखले साबित हुए हैं. हो सकता है कि पर्यावरणविद कही जानेवाली वंदना शिवा की अनाम संस्थाएं अमरीका स्थित वाटर कीपर्स एलांयस को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो गयी हों कि वे यमुना बचाने का काम कर रही हैं लेकिन कुरैशिया घाट पर बैठे हरि मल्लाह की आंखों का सूनापन साफ बताता है कि दिल्ली में उनके दिन गिने-चुने ही बचे हैं, और शायद यमुना के भी. हरि मल्लाह को नहीं पता कि वंदना शिवा कौन हैं लेकिन उन्हें यह पता है कि राजेन्द्र सिंह कौन हैं. हरि मल्लाह यहीं इसी घाट पर पैदा हुए हैं. बाप-दादाओं ने यहीं जिन्दगी गुजार दी. आज सत्तर साल की उम्र में भी वे दिन-भर अपनी छड़ी के साथ कुरैशिया घाट की पैमाईश करते रहते हैं. लेकिन अचानक तीन-चार महीना पहले मैगसेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह वहां आये. राजेन्द्र सिंह यमुना सत्याग्रह करना चाहते थे. हरि मल्लाह से बात हुई तो उन्हें सत्याग्रही बना दिया और घाट का औघट यमुना बचाने का सत्याग्रही हो गया. कुछ खास बदला नहीं है. दो-चार बैनर लग गये हैं जिनपर यमुना सत्याग्रह का जिक्र है और लोग आते हैं फोटो खींचकर ले जाते हैं. हरि मल्लाह को भी यह सब अच्छा लगता है लेकिन इस फोटों खिंचाई का कहां क्या व्यवसाय होता है यह हरि मल्लाह को बिल्कुल पता नहीं. हां, सत्याग्रही का बैनर लगने के बाद वे कुछ शब्द बोलने लगे हैं जो सिखाए हुए और सुने-सुनाए से लगते हैं.
राजेन्द्र सिंह दावा करते हैं कि यमुना को बचाने के लिए वे दिल्ली में 12 स्थानों पर सत्याग्रह कर रहे हैं. फिर खुद ही संख्या ठीक करते हैं और कहते हैं कि सत्याग्रह केवल चार स्थानों पर चल रहा है बाकी जगहों पर सांकेतिक है. उन चार जगहों में एक कुरैशिया घाट भी है. दूसरी जगह अक्षरधाम मंदिर के पिछवाड़े में है. जहां फोटो खिंचाई की रस्म अदायगी चलती रहती है. दिल्ली के दो-चार स्थानीय लोग जरूर यहां से जुड़े हैं लेकिन उन्हें खुद भी नहीं पता इस सत्याग्रह का लक्ष्य क्या है? क्योंकि जिन उद्येश्यों को पाने के लिए सत्याग्रह की घोषणा की गयी थी वे पूरे होते दिखाई नहीं दे रहे हैं. कामनवेल्थ खेलों की तैयारियां शुरू हो गयी हैं. बुलडोजरों ने अपना मोर्चा संभाल लिया है. कामनवेल्थ खेलों का स्थान बदलेगा इसकी उम्मीद न के बराबर है. उधर दिल्ली मेट्रो ने भी यमुना डिपो का अधिकांश कार्य पूरा कर लिया है. और जिस एक बात से सत्याग्रह परिणामकारी हो सकता था वह हुआ नहीं. दिल्ली के लोगों ने इस सत्याग्रह पर अब तक ध्यान ही नहीं दिया.
दिल्ली की प्रदूषित यमुना व्यवसाय हो गयी है. यमुना को मारने-बचाने का चाहे सरकारी प्रयास हो या गैर-सरकारी प्रयास दोनों उसी व्यवसाय का हिस्सा हैं. आधुनिक व्यावसायिक परिभाषा में इसे पर्यावरण तकनीकि का व्यापार कहते हैं. यमुना साफ-सुथरी हो यह सदिच्छा तब बेईमानी नजर आने लगती है जब इसकी रिपोर्टिंग किसी विदेशी दानदाता को की जाती है. मसलन वाटर कीपर्स एलायंस अमरीकी संस्था है. दुनिया की नदियों के प्रति इसका दृष्टिकोण है कि वे साफ-सुथरी होनी चाहिए. इसके इतिहास में जाये बिना भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि ऐसी संस्थाएं केवल सदिच्छा से नहीं चलती. एलायंस ने वंदना शिवा की कई बेनामी संस्थाओं को विभिन्न नदि
Possibly Related Posts:
- भाजपा नेताओं का मक्काः झंडेवालान
- पीने का पानी
- फिर अविनाश डाल पर
- अभिव्यक्ति की चरम अवस्था
- विस्फोट.कॉम को चाहिए निहंग पत्रकार
ये सब पढ़कर अपनी ही असहायता पर रोना आने लगता है.. जागरूकता की यह मुहिम जारी रहे..
हम कितना भी प्रयास कर लें लेकिन यमुना नहीं बच सकती है. क्यूंकि आज नदिया हमारे लिए कोई महत्व ही नहीं रखती हैं… लेकिन नदियों के अंत के साथ हमारा अंत भी नजदीक आता दिख रहा हैं मुझे संजय जी…आप इसे मुझे मेरी निराशा भी कह सकते हैं.
यमुना को प्रदूषण से मुक्त कराने हेतु स्वयमसेवी संस्थाओ को जनजागरण अभियान चलाना चाहिए और सरकारी तंत्र द्वारा क्या कार्य किए गए है उनकी समीक्षा करना चाहिए और यमुना को प्रदूषण से मुक्त कराने हेतु सतत अभियान की जरुरत है |
वाकई!! हमारे आसपास कितना कुछ और इस कितने कुछ पर कितनी ही राजनीति चलते रहती है और हम बस दर्शक की भूमिका चुनते हैं और अंत में कह जाते हैं कि हम कर भी क्या सकते हैं!!
For some time got connected to the satyagrah, but when I realized that nothing is going on the way to save I left it and now trying to alone ” elacholo”
sanjay g apney likha achha hai, aap shabdo ki bajigari khoob jantey hai.aapko bata doon 2007 mae mae punjab sae dellhi sirf yamuna satyagraha mae hissa lene k liey hi aaya tha. koi salery nahi lae reha tha yamuna bachaney k liey.8 month tak satyagrah waley paerr(tree) k neechey din raat reha na kisi room mae.
wanha yamuna ko ujad k ajj kankreet ka jangle ugg reha to iska jimmedar bi kanhi delhi k napusank media ko hi leni hogi .aisa nahi ki sara media hi napusank hai kuch mitron nae yamuna meri hai ki tarj pae kalam bi chaai.yamuna dellhi mae mar rehi hai. kalam k thekedaron ki basti dellhi mae yamuna ka har din balatkar ho reha hai, kabi akshardham to kabi khel gaoun. media bass khamoosh hai yae khamoshi matam ki nahi media ki beshermi sae upji hai jisey sonia gandhi ko agar jukam bi ho jaye to apni newspaper oor websites pae dalney ki itani jaldi hoti hai k kya likhu wanhi yamuna har roj dam torr rehi hai to jis media ko nadi ki siskian likh kar samaj ko jagana chaiey wo marasion ki tarah iss mamley pae annand lae rehey hai. baki vandana shiva marka logo sae jiadi umeed na rakhey to behter hai. wo kaam to badia kar rehi hai par uska apna style hai.
Wow!! I can’t believe it took me so long to find you! THANKYOU!