कल की बात है. सदन में तमिल सांसदों ने एकराय होकर इस बात का विरोध किया कि ऊंची अदालतों में हिन्दी का प्रयोग अनिवार्य नहीं होना चाहिए. आखिरकार सरकार ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे ऐसी किसी सिफारिश पर अमल करने नहीं जा रहे हैं जिससे हिन्दी को अदालतों में जगह मिल जाए. तमिल सांसदों का एक प्रतिनिधिमण्डल प्रधानमंत्री से भी मिला. बकौल केन्द्रीय मंत्री टी आर बालू “प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया है कि संबंधित सिफारिश पर केन्द्र सरकार विचार नहीं करेगी.”
सिफारिश क्या है?
संसद की भाषा समिति ने सिफारिश की है कि भारत के सभी उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी को दूसरी भाषा के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए. विधि आयोग ने भी इस बात से सहमति जताई है. बात आगे बढ़ती इसके पहले ही संसदीय कार्यमंत्री प्रियरंजन दासमुंशी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दोनों ने आश्वासन दे दिया है कि सरकार इस पर अमल नहीं करेगी. दासमुंशी ने सदन में कहा कि समिति का काम है सिफारिश करना. अमल करना सरकार के हाथ में है. फिलहाल सरकार ऐसा कोई निर्णय नहीं लेगी जिससे देश की एकता और अखण्डता के लिए खतरा पैदा हो. इसका मतलब है कि हमारे देश का संसदीय कार्यमंत्री मानता है कि हिन्दी देश की एकता और अखण्डता के लिए खतरा है.
जनाब दाशमुंशी सही कहते हैं
संसदीय कार्यमंत्री दाशमुंशी ठीक ही कहते हैं कि हिन्दी देश की एकता और अखण्डता के लिए खतरा है. अगर सरकार अदालतों में हिन्दी में काम-काज को अनिवार्य कर देंगे तो करोड़ों लोग इस व्यवस्था के साथ अपनापन महसूस करने लगेंगे. इससे देश की एकता और अखण्डता तो खतरे में पड़ ही जाएगी. अदालती फैसले उन लोगों को भी समझ में आने लगेंगे जो अभी सिर्फ भाषा के अवरोध के कारण वकीलों के चक्कर लगाते रहते हैं. निश्चित रूप से इससे देश की एकता और अखण्डता को खतरा ही पैदा होगा. अगर हिन्दी को अदालतों में जगह मिल गयी तो देश और कानून के ऊपर अंग्रेजी का प्रभुत्व कम होगा इससे भी देश की एकता और अखण्डता को खतरा ही होगा.
यह देश तब तक ही अखण्ड, प्रभुत्वशाली और विकसित होता रहेगा जब तक अंग्रेजी कामय है. हिन्दी से तो खतरा ही है. क्यों दाशमुंशी साहब?
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निसंदेह खेद का विषय है
हिन्दी दिवस मनाने जैसे बेहुदे कार्यों के लिए अमेरीका तक जाने की कोई तुक नहीं, पहले घर की भाषा तो बनने दो, विश्वभाषा कह कर व्यंग्य न मारो.
अत्यन्त दुखद क्षण है. मन क्षुब्ध है.
ऐसे डी एम के और दासमुंसी दोनो का काम बहुत गैरजिम्मेदाराना है।
वैसे यदि समिति की सिफारिस लागू कर दी जाती है तो देश की जनता इसका जोरदार स्वागत करेगी।
दासमुंशी जैसे लोग ही देश की एकता-अखंडता और राष्ट्र-निर्माण में सबसे बड़ी बाधा हैं। दिक्कत ये है कि हम अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए और कांग्रेस द्वारा स्वीकार किए गए भारत में रहते हैं। भारतीयों का भारत तो अभी तक बन ही नहीं पाया है। दक्षिण तक के लोग हिंदी को स्वीकारने लगे हैं, लेकिन डीएमके जैसी पार्टियां अभी तक अतीत का झुनझुना बजा रही हैं।
दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे ऐसे नेता; मंत्री बन जाते हैं।
देश का और साथ-साथ मे हमारा भी दुर्भाग्य है. एक हम ब्लॉगर है जिनके हाथ मे कोई पावर नही है पर फ़िर भी हिन्दी के लिए जद्दोजहद कर रहे है और एक ये नेता है जिनके पास सब कुछ होते हुए भी ये अपने मुँह पर कालिख पोतवाने का काम कर रहे है.
और हमारी सरकार ऎसी बेशरम है कि उसे इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ता.
आइये, अगली ब्लॉग पोस्ट की तैयारी करें। ऐसे बयान तो बहुत आयेंगे भविष्य में भी।
ये नेता और इनके ऐसे बयान……
इनको भगवान सद्बबुद्धि दे। क्योंकि, सरकारों में ऐसे लोगों को रोकने के लिए जनता तो जाग नहीं रही है। दक्षिण भारत छोड़िए असम जैसी जगह में मैं कल एक अंग्रेजी चैनल पर स्टोरी देख रहा था उसमें स्वाभाविक तौर पर तीनों बाइट हिंदी में थी। हिंदी से किसी को दिक्कत नहीं है सिवाय राजनेताओं के।
ऐसे हिन्दी विरोधी साँसदों की सचमुच पूजा की जानी चाहिए, उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए, सम्मानित किया जाना चाहिए। क्योंकि उनके ऐसे प्रयासों से ही वस्तुतः हिन्दी का सौगुना विकास होगा। क्योंकि भारतीय जनता विरोध होने पर ही जागती है, कुरेदे-खरोंचे जाने पर ही सक्रिय होती है। इसे मालूम है कि जल के विपरीत प्रवाह और हवाओं के विपरीत बहाव के बावजूद पाल के जहाज को कैसे और तेजी से चलाया जाता है। विरोध/प्रतिबल को कैच कर सुबल के रूप में इस्तेमाल करके कैसे तेजी से सफलता मिलती है। वैसे तमिल नेता जयललिता जी जो कभी हिन्दी विरोधी थीं, अब हिन्दी-प्रेमी बन चुकी हैं। यहाँ भी देखें।