नेशनल मेडिकल फोरम एक गैर सरकारी संस्था है जो स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और बेहतर स्वास्थ्यकर्मी तैयार करने के लिए काम कर रहा है। देशभर में इसकी 1100 शाखाएं हैं। नीति निर्धारण, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और डॉक्टरों को जिम्मेवार बनाने के उपाय नेशनल मेडिकल फोरम का मुख्य काम है। एड्स के रोकथाम पर इस संस्था ने स्वच्छ खून की सप्लाई का बड़ा हाथ में ले रखा है. एड्स क्या उतना बड़ा खतरा है जितना हम देख रहे हैं. ऐसे बहुत सारे सवालों पर फोरम के अध्यक्ष डॉ0 प्रेम अग्रवाल से बातचीत।
सवाल – क्या एड्स का खतरा उतना बड़ा है जितना प्रचारित किया जा रहा है?
जवाब – एड्स की शुरूआत उन देशों में हुई जहां दूसरी बीमारियों का खतरा बहुत कम है। यह जानलेवा बीमारी थी और कोई इलाज उपलब्ध नहीं था। सेक्स के कारण पैदा होने वाली इस बीमारी का खतरा सचमुच बहुत बड़ा था। इस रोग का विस्तार महामारी का रूप ले सकता था। लेकिन आज की परिस्थितियां ऐसी नहीं है। एड्स एक जानलेवा बीमारी है, इसमें कोई शक नहीं लेकिन कुछ सामान्य एहतियात से इससे बचा जा सकता है। जहां तक भारत की बात है तो यहां सेक्स के कारण एड्स का खतरा उतना नहीं है जितना कि संक्रमित खून चढ़ाने से है।
यह बात सही है कि हमारे देश में एड्स का खतरा तो है लेकिन एड्स का प्रकोप उतना नहीं है जितना प्रचारित किया जा रहा है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि बीमारी ही नहीं है। बीमारी कोई भी हो उसका खतरा तो रहता ही है। इसका कारण यह है कि समय रहते हमने जो जन जागरण किया उसके कारण आज एड्स के प्रति लोग सावधन हो गये हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि मलेरिया, टीबी या फिर कैंसर जैसे प्राणघातक रोगों के सामने एड्स कहीं नहीं ठहरता।
सवाल- अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां एड्स के बारे में सीधे हस्तक्षेप करती हैं। क्या यह ठीक है?
जवाब – अंतरराष्ट्रीय एजंसियां उन्हीं बीमारियों के बारे में सचेत रहती है जिनका खतरा उनके अपने यहां ज्यादा है। वे लोग उन्हीं बीमारियों के रोकथाम के कार्यक्रम ज्यादा बनाते हैं जिनका खतरा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा आदि देशों में है। यही वे देश हैं जो इन एजंसियों को सबसे ज्यादा पैसा देते हैं। अब मलेरिया का डर अमेरिका में नहीं है तो दुनिया में कहीं भी मलेरिया हो वे उसके बारे में कोई प्रोग्राम नहीं बनाते।
एक बात समझ लेने की है कि हमारे पास जो पैसा आता है वह हमारा स्वास्थ्य ढांचा सुधरने के लिए नहीं आता। वह आता है किसी एक विशेष प्रोग्राम के लिए। कई बार इस तरह का पैसा हमारे लक्ष्य से हमें अलग कर देता है। हम भटक जाते हैं। फंण्डिंग एजंसियां अगर एड्स की रोकथाम के लिए पैसा देती हैं तो हम उसे मलेरिया की रोकथाम के लिए नहीं खर्च कर सकते। इसका परिणाम यह है कि एड्स का प्रोग्राम अलग जा रहा है, टीबी का अलग जा रहा है, मलेरिया का अलग जा रहा है। यह सब अलग-अलग इसलिए जा रहा है क्योंकि इनकी फण्डिंग अगल-अलग है। जरूरत इस बात की है कि इन कार्यक्रमों में एक समन्वय हो। ऐसा न हो पाने के कारण हमारे स्वास्थ्य सेवाओं का बहुत बड़ा हिस्सा बेकार जा रहा है।
आज हम अपनी जीडीपी का 1.3 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च कर रहे हैं। इसमें भी हमारा अधिकांश पैसा तनख्वाह, मंहगे सर्जिकल्स की खरीदारी और परिसरों के रखरखाव पर खर्च हो जाता है। दवाओं पर खर्च बहुत कम है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय एजंसियों से जो पैसा आता है वही हम स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं। जिससे वह प्रचारित हो जाता है। इसके कारण हमारे बेसिक प्रोग्राम जिन पर हमें सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, वे धरे के धरे रह जाते हैं।
< span style="font-size:130%;">आज एड्स की रोकथाम और उसके खिलाफ जागरूकता के लिए हम जितना पैसा खर्च कर रहे हैं, उसी का उपयोग अगर हम बहुउद्येश्यीय पद्धति से करें तो हमारी बहुत सी स्वास्थ्य समस्याएं समाप्त हो सकती हैं। वह हम नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हमारे सामने फण्डिंग एजंसियों की बाध्यता है।
सवाल – एड्स की रोकथाम करने के लिए स्वतंत्र विभाग या मंत्रालय बनाने की भी बात चल रही है। आपको लगता है इसकी जरूरत है?
जवाब – जब हम स्वास्थ्य की बात करते हैं तो उसका संबंध किसी एक बीमारी के निदान से नहीं होता। स्वास्थ्य को समग्रता में देखना चाहिए जिसमें बीमारियों के प्रति जागरूकता, रोकथाम और इलाज तीनों ही शामिल हैं। अलग मंत्रालय की बात वही लोग चला रहे हैं जिनको एड्स के नाम पर भारी-भरकम पैसा आ रहा है।
इसके पीछे थाईलैण्ड का उदाहरण दिया जाता है जहां एड्स का प्रकोप बहुत ज्यादा था। थाईलैण्ड में सेक्स उद्योग की तरह है। एड्स की रोकथाम के लिए जरूरी था कि सरकार इन सेक्स वर्करों पर लगाम कसने के लिए सख्त नियम-कानून बनाती। इन कानूनों को ठीक से लागू किया जा सके इसलिए उनको अलग से मंत्रालय बनाने की जरूरत महसूस हुई। दुनिया के किसी और देश में एड्स के लिए अलग से मंत्रालय नहीं है।
सवाल – टीबी, मलेरिया और कैंसर पीड़ितों के समुचित इलाज में सरकार नाकाम है। ऐसे में एड्स को स्वास्थ्य की प्राथमिकता पर रखना कितना तर्कसंगत है?
जवाब – यह ठीक नहीं होगा कि हम एड्स को इतनी प्रमुखता दें और दूसरी बीमारियों को दोयम दर्जे की मान लें। सभी रोगों के इलाज की जरूरत है, एड्स भी उन्हीं में से एक है। हमारी नीति यही होनी चाहिए।
सवाल – देश में निजी चिकित्सा व्यवसाय सरकारी स्वास्थ्य तंत्र से बड़ा है। निजी क्षेत्र का इस पर क्या नजरिया है?
जवाब – आजादी के बाद 90 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं सरकार के पास थी। आज ऐसा नहीं है। आज सरकार के पास केवल 20 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं हैं बाकी 80 प्रतिशत निजी हाथों में हैं। दिक्कत यह है कि सरकारी तंत्र की एक जवाबदेही होती है लेकिन निजी तंत्र की कोई जवाबदेही नहीं है। निजी क्षेत्र का सारा ध्यान बीमारी के ईलाज पर है क्योंकि उसमें पैसा है। लेकिन बीमारी की रोकथाम या स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के प्रति निजी क्षेत्र पूरी तरह से उदासीन है। यह काम सरकार के जिम्मे छोड़ दिया गया है और सरकार अक्षम है। एड्स के बारे में यही स्थिति है। ऐसे में फंडिंग एजंसियां चाहती है कि निजी क्षेत्र को पैसा दें। लेकिन सरकार यह होने नहीं देगी। सरकार कहती है कि पैसा उन्हें आना चाहिए। निजी क्षेत्र की कमजोरी यह है कि उनके पास अपना कोई प्रशासनिक ढांचा नहीं है। पैसा देने वाली संस्थाओं को यह सटीक नहीं बैठता इसलिए सरकार के जरिए पैसा खर्च करना उनकी मजबूरी है।
सवाल – डॉक्टरों की अपनी बहुत सारी संस्थाएं हैं। फिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?
जवाब – वे संस्थाएं अक्षम हैं। उनमें कोई एकता नहीं है। फंण्डिंग एजंसी एक देश में सिर्फ एक आदमी से बात करना चाहती है।
सवाल – अंतरराष्ट्रीय एजंसियां भारत में एड्स रोगियों के आंकड़ें जारी करती हैं जिसे हर बार हमारा ही कोई स्वास्थ्यमंत्री खारिज कर देता है। सही कौन है और गलत कौन है?
जवाब – हमारे यहां आंकड़ों को इकट्ठा करने की कोई व्यवस्था नहीं है। सरकार के पास कोई विश्वसनीय आंकड़ा होता नहीं है क्योंकि 80 प्रतिशत इलाज तो निजी क्षेत्र में हो रहा है। सरकार जो आंकड़े रखती है वह उसका अपन 20 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा होता है। इसलिए बार-बार इस तरह का भ्रम होता है।
सवाल – नाको की क्या भूमिक
ा है?
जवाब – नाको की भूमिका सराहनीय है। एक विभाग जितना काम कर सकता है उससे बेहतर काम नाको कर रहा है। वह स्वास्थ्य मंत्रालय का सबसे अच्छा विभाग है लेकिन निर्माण भवन के चार कमरों से इतने बड़े देश पर नजर रखना संभव नहीं है।
सवाल- एड्स पर किये जा रहे शोधकार्यों का खर्च कितना है और एक डॉक्टर होने के नाते आप इसे पर्याप्त मानते हैं?
जवाब – एड्स पर शोध का वही हाल है जो दूसरे रोगों पर किये जा रहे शोधकार्यों का है। हम कोई खास प्रयास कर रहे हैं, ऐसा नहीं है।
सवाल – आप नेशनल ड्रग फोरम के अध्यक्ष हैं। आपके सामने स्वास्थ्य के लिहाज से सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
जवाब – एक अरब लोगों के लिए स्वास्थ्य की योजना बनाना बहुत मुश्किल काम है। उसके लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होगी जिसका अभी सबसे ज्यादा अभाव है। हमारे देश में स्वास्थ्य नीति बनाते समय स्वास्थ्य समस्याओं की जगह सस्ती लोकप्रियता को èयान में रखा जाता है। आजादी के बाद से हमारे देश यही होता आ रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जितने स्वास्थ्य मंत्री बदले हैं उतना किसी और मंत्रालय में मंत्रियों का फेरबदल नहीं हुआ था। स्वास्थ्य सेवाओं पर नौकरशाही हावी है और पूरी सरकारी नीति दिग्भ्रमित है।
जहां तक समस्या का संबंध है तो बढ़ती आबादी आज हमारी सबसे बड़ी समस्या है। इससे निपटने के लिए न तो कोई योजना है और न ही कोई कार्यक्रम। हर रोज पांच लाख बच्चे पैदा हो रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में कौन सी स्वास्थ्य नीति कारगर हो सकती है? संजय गांधी ने नसंबंदी को लेकर जो दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाई थी उसको आगे ले जाने की जरूरत है। दुर्भाग्य से संजय गांधी को बदनाम करने के लिए इसका दुरूपयोग किया गया।
सवाल – बहुत सारे डॉक्टर स्वास्थ्य मंत्री बने हैं। आज जो स्वास्थ्य मंत्री हैं वे भी एक डॉक्टर हैं। आप स्वास्थ्यमंत्री होते तो क्या नीति अपनाते?
जवाब – ऐसा तो कभी मैंने नहीं सोचा है। लेकिन एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता होने के नाते में मैं इतना जरूर कह सकता हूं जनसंख्या पर नियंत्रण स्वास्थ्य के लिहाज से देश की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इसको एक अभियान की तरह चलाना होगा। सभी स्वास्थ्य सेवाओं में एक बेहतर समन्वय होना चाहिए। ऐसी नीतियां बननी चाहिए जिससे निजी क्षेत्र को और जिम्मेदार तरीके से स्वास्थ्य सेवाओं के लिए इस्तेमाल किया जा सके। आज निजी क्षेत्र का सारा èयान सिर्फ पैसा कमाना है। उनके प्रति हमारी नीति यह होनी चाहिए कि आप अच्छा करेंगे तो आपको ईनाम मिलेगा लेकिन आप केवल अपने लाभ के लिए काम करेंगे तो आप कोड़े पड़ेंगे। यही नियम पूरी दुनिया में चल रहा है।
एक सबसे महत्वपूर्ण काम यह करना होगा कि आम आदमी को भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना होगा। आज ऐसा नहीं है। आज हम बीमार होने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन जब ईलाज न हो तो सरकार की कमियां निकालते हैं। यह एक बहुत बड़ा काम है जिसे करने की जरूरत है। हर आदमी को एक स्वास्थ्य कोष बनाना होगा जिसका उपयोग वह अपने स्वास्थ्य के लिए कर सके। नहीं तो आज हमारे देश में जो स्वास्थ्य अराजकता है वह शायद ही कभी खत्म होगी।
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पता नहीं इस बड़े देश में एक यूनीफार्म स्वास्थ्य नीति उपयुक्त है क्या?
फण्डिंग वाली बात बहुत सही कही डॉ साहब ने!!
सारा खेल इस फण्ड का ही तो है!!