मेरा ब्लाग की दुनिया में आना न तो किसी प्रकार का निमंत्रण था और न ही सोची समझी योजना. वह तो कुछ लोगों की पत्रकारीय धोखाधड़ी थी जिससे आजिज आकर मैंने तय किया हिन्दी की इस मुफ्तखोरी में मैं काम नहीं करूंगा. अगर अपनी शर्तों पर काम करना इतना मुश्किल है तो मैं इन लोगो के साथ काम ही नहीं करूंगा. झटके में यहां-वहां जो लिखता था उसे छोड़ दिया. घर बैठ गये. उन लोगों को भी लगा कि आज नहीं तो कल मजबूर होकर इन्हें मेरे पास आना ही होगा. यह हिन्दी पत्रकारिता की टिपिकल मानसिकता है. नहीं आयेंगे तो करेंगे क्या? क्योंकि जिन विषयों पर मैं काम करता हूं उसके बारे में हिन्दी में कहीं कोई घास नहीं डालेगा. प्रो-मार्केट पत्रकारिता की हर जगह डिमाण्ड है, एन्टी मार्केट बात कौन सुनेगा?
उसी समय एक दिन जीमेल के एकाउण्ट में एक लिंक दिखा-ब्लागर. पहली बार कोशिश करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ. मुझे याद है कि ब्लागर एकाउण्ट भी मैं क्रियेट नहीं कर सका. एक एकाउण्ट तैयार करने में कुल दो दिन लगे. एक बार तो झक मारकर उठ गया कि छोड़ो यह क्या बकवास का काम है. लेकिन अगले दिन फिर लौट आये अपने कम्प्यूटर पर. थोड़ी हिम्मत और धैर्य से सर फोड़ना शुरू किया तो एकाउण्ट भी बन गया और थोड़ा बहुत उसकी रूपरेखा भी बन गयी. अब समस्या थी हिन्दी लिखने की. जितनी भी सहायता करनेवाली साईट्स थीं उनकी कोई भी बात पल्ले नहीं पड़ रही थी. वे जिस भाषा में लिखीं थी वे उनकी समझ में भले ही आती हों लेकिन मेरे जैसे नये आदमी के लिए कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था. मैंने ललन पाण्डेय को फोन किया क्योंकि वे जानते हैं कि हिन्दी में काम कैसे किया जाता है.
ललन पाण्डेय ब्लाग नहीं चलाते. वे एक पत्रिका में ले-आऊट डिजाईन का काम करते हैं. और उस पत्रिका की वेबसाईट भी चलाते हैं. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मुझे एक्सपी की एक सीडी कापी करके दे दी कि ऐसे-ऐसे आप हिन्दी का चुनाव करिए और जब कहे कि एक्सपी की सीडी लगाईये तो इस सीडी को इंसर्ट कर दीजिए. और उछलता हुआ मैं अपने दफ्तर आया. सबसे पहले मैंने अपने कम्प्यूटर पर वह सब स्थापित किया और हिन्दी में टाईप करना शुरू किया. क्योंकि मैं रेमिंगटन की बोर्ड पर काम करता था इसलिए यह नया की-बोर्ड सीखना मेरे लिए बहुत तनाव का काम था. अपने ही अभ्यास को पलट देना आसान नहीं होता. लेकिन एक हफ्ते के प्रयास से मैं 100-200 शब्द लिखने लगा. बात चल निकली.
लेकिन ब्लाग बनाने के बाद भी अभी लोगों को बताना पड़ता था कि मेरे ब्लाग को देखिए. पहली विधिवत पोस्ट मैंने लिखी 26 अप्रैल को. तब मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा जब मैंने उस पर एक टिप्पणी देखी. पहली टिप्पणी की थी परमजीत बाली ने. अगली पोस्ट पर एक सलाह भी मिली कि आप नारद के साथ अपना ब्लाग पंजीकृत करवा लें. अब एक नयी मुश्किल आ गयी यह नारद क्या बला है? खैर नारद पर पहुंचे तो इच्छा और प्रगाढ़ हो गयी कि यहां तो अपना ब्लाग होना ही चाहिए. एक-दो बार मशक्कत करने के बाद ब्लाग वहां रजिस्टर हो गया. महीना बीतते-बीतते नियमित पाठक आने लगे और कमेंट भी.
शुरूआत में जैसे बहुत सारे लोग करते हैं मैंने भी कई सारे ब्लाग बनाये. फिर बिगाड़े. फिर बनाए. इस तरह के प्रयोगों के कारण थोड़ी जानकारी जरूर बढ़ी लेकिन जल्द ही एक बात समझ में आ गयी कि इसका कोई फायदा नहीं है. और विस्फोट नाम भी अचानक ही था. मैंने शुरू में जो ब्लाग बनाया था उसका नाम रखा था युगवार्ता. लेकिन बात जम नहीं रही थी. मैं उस समय अक्षरधाम मंदिर के सामने से गुजर रहा था और सोच रहा था कि मैं अपने ब्लाग का क्या नाम रखूं? अचानक एक शब्द गूंजा-विस्फोट. बस इसके बाद इस नाम के बारे में जितने तर्क किये सब हल्के पड़ गये. और विस्फोट ब्लाग का जन्म हो गया. इधर-उधर बने कई सारे ब
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aapka ye post prerna daayak hai.. aap bas yun hi lage rahen..
“yahan hindi me likhne me kuchh dikkat hai so HINGLISH me likh rahaa hun..”
हम्म….भई, हम तो आपके फैन हो गए हैं।
आप लिखते रहिए इसी तरह अनवरत। अभिव्यक्ति की आजादी मिली तो सबको है, लेकिन केवल ब्लॉगर ही सही मायने में उसका उपयोग करते हैं।
नववर्ष में आपके सपने, अरमान और उम्मीद पूरे हों, उनके लिए आप पूरे लगन, उत्साह से काम करते रहें।
क्या आप नए लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं करते? पहले भी एक बार आपको मेल किया था। कल फोन पर भी संपर्क करने की कोशिश की। यदि कोई विशेष परेशानी आपको न हो तो सप्ताहांत में मिलने का प्रोग्राम बनाइए न।
बस इसी हिम्मत से डटे रहें. नया साल आपकी कामनाओं की पूर्ति करे यही शुभकामना है.
आप घबड़ाने वालों में कत्तई नहीं हैं । लड़ते रहिए।
न आप टूटेंगे, न आप झुकेंगे यही हमारा आप पर विश्वास है बंधु!!
बच्चन साहब की यह पंक्तियां याद आती हैं-
वृक्ष हो भले खड़े,
हो घने,हो बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
मांग मत,मांग मत, मांग मत,
अग्निपथ,अग्निपथ, अग्निपथ ।
तू न थकेगा कभी,
तू न थमेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ,कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ,अग्निपथ, अग्निपथ ।
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु,स्वेद,रक्त से,
लथपथ,लथपथ,लथपथ,
अग्निपथ,अग्निपथ,अग्निपथ ।
अभी तो ये अंगडाई है
आगे और मलाई है।
लगे रहिये। हम आपके साथ है। नव-वर्ष की अग्रिम शुभकामनाए।
2007 मेरे जीवन का सबसे चुनौती का साल रहा. इतना असफल मैं जीवन के किसी वर्ष में नहीं हुआ जितना इस साल
बीता साल भले ही आपके लिया अच्छा ना रहा हो पर आने वाला साल आपके लिये जरूर शुभ होगा, नये साल की हार्दिक शुभकामनायें।
हिम्मत न हार, रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। नववर्ष में तुम्हारा मनोबल और भी सुद2ढ1 हो ऐसी मेरी कामना हा।
नया साल मुबारक मित्र।
इस साल धैर्य और सहनशीलता की परीक्षा दी है, आने वाले साल में सुंदर परिणाम मिलेंगे। विपरीत परिस्थितियाँ ही जीने की कला सिखातीं है।
शुभकामनाएँ।
बहुत बढ़िया लेख…।
आपको नववर्ष की ढ़ेरों बधाइयाँ…।
बन्धु,
शायद आपके ब्लोग पर पहली बार टिप्पणी कर रहा हूं । पर आपका शायद ही कोई लेख हो जिसे मैने ध्यान से ना पढा हो! आप के विचारों की मौलिकता मुझे बरबस ही खींच लाती है ! आपके बाज़ार विरोधी विचार मन मैं आशा जगाते हैं। नव वर्ष पर इतना ही कह सकता हूं कि आप का जीवन संघर्ष आपको आपकी मंजिल तक पहुंचाये । आपसे मिलने की बडी इच्छा है! जब भी दिल्ली आऊगा, आपसे ज़रूर मिलूंगा ।
दीपक
दिमाग ज्योति जलाये रखें.. भविष्य के दिन अच्छे-भरे बीतें..
लेकिन अब तो आप विस्फ़ोटक विस्फ़ोट एक्सपर्ट हो ही गये है जी…
कभी-कभी कुछ लिखता हूं ये पंक्ति आपको प्रेषित कर रहा हूं।
दर्द को सिने मे बसाने की बात कर
गर मुमकिन हो तो मुझे
आजमाने की बात कर
लाख तूफा हो खुद मे दरिया समेटे हुए
डूब जाने की बात कर, पार पाने की बात कर
ललन पाण्डेय
हिम्मते मरदां, मदद-ए-खुदा । आप आयु में मुझसे जरूर छोटे हैं किन्तु मैं आपसे प्रेरणा पाता हूं ।
बीत गया सो बीत गया । इतने सारे लोग आपके आस-पास हैं ।
2008 आपके लिए यकीनन बहुत अच्छा साल होगा ।
शुभ-कामनाएं ।