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मौत, मुक्ति और उत्सव

Posted by संजय तिवारी on Jan 2nd, 2008 and filed under बात करामात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

बनारस के हरिश्चन्द्र घाट पर शरीर का अंत भले ही हो जाता है लेकिन जीवन का सफर जारी रहता है. क्योंकि आप कभी मरते नहीं, आप सिर्फ अपना चोला बदल लेते हैं. इसलिए इस शरीर के वशीभूत जो कुछ आपने किया वह यहीं छोड़ जाईये. धू-धू कर जलती चिताएं बरबस ही आपको मौन कर देती हैं. सबके मन में कुछ न कुछ चलने लगता है. सभी अंत आनंद की बातें सोचने लगते हैं. कुछ क्षण पहले जो एक शरीर था वह अब राख का एक ढेर है. उसकी गति करने के लिए कपालक्रिया करके उस शरीर का नामोनिशान मिटा दिया जाता है जो चार कांधों पर सवार हो अपनी अंतिम यात्रा करके यहां पहुंचा था.

लेकिन इस तरह के दार्शनिक भाव आपके मन में भले ही पैदा हो जाएं जो यहां रहते हैं उनके लिए यह सब नित्यकर्म है. प्राणहीन शरीर आते हैं और राख के ढेर में बदल जाते हैं. जो लोग यह कर्म करते हैं वे मल्लाह हैं और उनका एक परिवार भी है. उस परिवार में बच्चे भी हैं और उन बच्चों के लिए यह श्मशान उनका घर भी है और क्रीड़ाघर भी. वे सुबह से शाम तक यहीं धमा-चौकड़ी मचाते हैं. जिस बच्चे की परवरिश श्मशान में हो उसके लिए हम क्या सोच सकते हैं? मैं ऐसा मानता हूं वे जब बड़े होते हैं तो उनमें जीवन की गहरी समझ होती है. इसीलिए मल्लाहों को हमारे समाज ने बहुत आदर दिया है. उनके नाम पर प्रतीक गढ़े हैं और उनके साथ एक नाता विकसित किया है. क्योंकि वे जो करते हैं वह जीवन की शास्वत समझ से छनकर आता है.

मैं चिताओं की लपटों के आकर्षण में हरिश्चन्द्र घाट नहीं आया था. मैं बैंजो की उस धुन को सुनकर वहां आया था जो नट-नटी का खेल करने वाले लोग बजा रहे थे. उस धुन पर एक लड़की टेबल पर कई सारे करतब कर रही थी. मैं बगल के केदार घाट पर बैठा था और बैंजों की धुन सुनी तो यहां आ गया. नट-नटी का करतब हो और बच्चे दूर रहें ऐसा कैसे हो सकता है. ढेर सारे बच्चे वहां मौजूद थे. मेरे लिए यह बहुत महत्वपूर्ण क्षण था. सामने चिताएं भी जल रही थीं और जीवन का सामान्य उत्सव भी हो रहा था. जिस घर से ये लाशें उठकर यहां तक पहुंचाई गयी होंगी वहां कैसा मातम होगा लेकिन यहां यह एक कर्म है और कुछ नहीं. क्या मरघट के लोग इतने संवेदनहीन होते हैं कि वे गमगीन लोगों के साथ अपनी संवेदना भी नहीं बांट सकते?

गमगीन हों वे लोग जो जीवन और मौत को बांटकर देखते हैं. जो जीवन को एक शास्वत धारा में देखते हैं उनके लिए न पैदा होने की खुशी और न मरने का गम. मरे तो वह जो पैदा हो. यह तो आने-जाने का खेल है. जैसे नट आया थोड़ी देर तक खेल तमाशा दिखाने के बाद चला गया वैसे ही वह भी एक नट ही था जिसकी चिता जल रही है. जैसे यह नट आया तो बच्चे इकट्ठा हो गये. खूब तालियां बजाई. मजे लिये वैसे ही उस नट ने भी वही सब किया जीवनभर. लोगों ने मजे लिये और तालियां बजाईं. लेकिन इस नट का खेल खत्म हुआ तो बच्चे ऐसे उठकर चल दिये मानों पीछे कुछ हुआ ही नहीं. उन्होंने काल के प्रवाह में होनेवाली घटनाओं को पकड़ने की कोशिश नहीं की. क्योंकि आनेवाले काल प्रवाह में पुनः एक नयी घटना होगी. इन बच्चों की समझ है कि बीती को पकड़ने की जद्दोजहद नहीं करनी चाहिए. श्मशान के बच्चे यह समझते हैं तो हम क्यों नहीं समझ पाते कि जीवन भी एक खेल है. कुछ लोग ताली बजाएंगे तो कुछ लोग बुरा ठहराएंगे. यह सब तो होता ही है. हम इससे प्रभावित क्यों हों?

उसी भीड़ से एक लड़की ने मुझे फोटो लेते देख लिया. उसने मना किया कि ऐसा मत करो. मैंने उससे पूछा क्यों? उसने कहा कि यहां फोटो लेना मना है. अभी कोई देखेगा तो तुम्हारा कैमरा भी तोड़ देगा और तुम्हारी बुरी हालत हो जाएगी. मुझे झटका लगा. मैंने कितनी बड़ी नादानी कर दी थी इसका मुझे अहसास हो गया. तब तक जलती चिताओं के कई फोटोग्राफ मैं ले चुक

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6 Responses for “मौत, मुक्ति और उत्सव”

  1. अनिल रघुराज says:

    वह भी एक नट ही था जिसकी चिता जल रही है. जैसे यह नट आया तो बच्चे इकट्ठा हो गये. खूब तालियां बजाई. मजे लिये वैसे ही उस नट ने भी वही सब किया जीवन भर. लोगों ने मजे लिये और तालियां बजाईं. लेकिन इस नट का खेल खत्म हुआ तो बच्चे ऐसे उठकर चल दिये मानों पीछे कुछ हुआ ही नहीं…
    बड़ी गहरी लाइनें हैं संजोकर रखने लायक, कहीं भी कोट करने लायक।

  2. Kakesh says:

    गहरी बातें हैं.सचमुच जीवन एक उत्सव है लेकिन इस उत्सव को कितने लोग जी पाते हैं.

  3. mamta says:

    मन को झंझोर देने वाली बातें लिखी है।

    आपने फोटो डिलीट करके अच्छा ही किया है।

  4. Sanjeet Tripathi says:

    जब भी अपने शहर के मुख्य श्मशान घाट जाना होता है उससे सटी हुई बस्ती (दरअसल किसी जमाने मे यह श्मशान घाट सूनी जगह पर रहा होगा पर अब तो उसके चारों ओर सटी हुई बस्ती है) में खेलते बच्चों या दरवाजे पर बैठी महिलाओं को घर के काम निपटाते देखकर यही सब भाव आते हैं। उनके लिए यह आम बात है, दिन में कई चिताओं को जलते देखना, रोते-बिलखते परिजनों को देखना।
    अगर रोज-रोज दिन में कई बार यही प्रक्रिया देखी जाए तो मन मे एक निस्पृहता का भाव आ जाना स्वाभाविक सा लगता है।

    वाकई यह कभी कभी नादानी लगती है कि हर मौके हर बात को लिखा जाए या उसे कैमरे में क़ैद किया जाए पर लेखन जब आपका मुख्य ध्येय हो तो आप तत्काल तो नादानी से उपर उठ कर लिखने या कैमरे में क़ैद करने का सोचेंगे ही भले ही बाद में न लिखे या कैमरे मे क़ैद तस्वीरों का उपयोग न करें!
    मेरे विचार से तो आपने फोटो डिलिट कर सही किया!

  5. Mired Mirage says:

    आपकी यह पोस्ट सहेजने योग्य है । नट की उपमा बहुत उपयुक्त दी । पढ़कर अच्छा लग रहा है ।
    नववर्ष की शुभकामनाएँ ।
    घुघूती बासूती

  6. CresceNet says:

    Gostei muito desse post e seu blog é muito interessante, vou passar por aqui sempre =) Depois dá uma passada lá no meu site, que é sobre o CresceNet, espero que goste. O endereço dele é http://www.provedorcrescenet.com . Um abraço.

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