पलायन तो दर्द पैदा करता है फिर भी ब्लागर इस बात पर लहालोट हैं कि प्रवासी होने के क्या-क्या फायदे हैं? प्रवासी होकर अपने सम्मान की खोज ही इस बात की ओर संकेत है कि कहीं कुछ छूट रहा है. बात ठीक है. अपने बसेरे को छोड़कर नया आशियाना खोजता कोई भी इंसान इसी तरह की बात करता है. दिलीप मंडल की यह बात ठीक लगती है कि एक प्रवासी का स्वभाव उस ट्रेन के यात्री की तरह होती है जो खुद चिरौरी करके अगर किसी तरह चालू डिब्बे में घुस जाए तो वह भी लोगों को आंखें दिखाने लगता है. यह भूल ही जाता है कि वह खुद इस डिब्बे में कैसे सवार हुआ है?
एक प्रवासी का स्वभाव बहुत अजीब होता है. मैं थोड़ा समझ सकता हूं क्योंकि मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश से आता हूं. सदियों से यह इलाका रोजी-रोटी की तलाश में पलायन कर रहा है. यह इलाका कभी रंगून जाता था. फिर कराची जाने लगा, फिर मुंबई. कुछ लोग छिटककर इधर-उधर भी चले जाते हैं. कमोबेश यही हालत बिहार, केरल और तमिलनाडु की है. ये वो राज्य हैं जहां से पलायन सबसे ज्यादा होता है. फिर राजस्थान और गुजरात का समाज है जो व्यापार के लिए बाहर जाता है. इस श्रेणी में एक नया राज्य शामिल हुआ है पंजाब, जो देश के अंदर नहीं देश के बाहर पलायन करने में अव्वल है.
मोटे तौर पर देश के हर हिस्से का नागिरक यहां से वहां भ्रमण करता ही है. लेकिन जब बहस होती है तो सिर्फ दो राज्यों पर आकर टिक जाती है- बिहार और उत्तर प्रदेश. असल में इसका कारण है. बिहार और उत्तर प्रदेश से जो पलायन हो रहा है वह व्यवसाय का नहीं बल्कि श्रम का पलायन है. बाकी प्रवासी व्यवसाय के सिलसिले में यहां से वहां जाते हैं जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार का नागरिक अपनी बेकारी से उबरने के लिए यात्रा करता है. अब इस विषय पर एक लंबा शोध लिखा जा सकता है कि प्राकृतिक और सांस्कृतिक रूप से इतना समृद्ध होने के बावजूद बेकारी में क्यों जी रहा है?
फिलहाल मैं प्रवासी के दर्द के बारे में ही लिख रहा हूं. हमारे यहां एक कहावत चलती है- कोस-कोस पर पानी बदले चार कोस पर बानी. यानी मोटा-मोटा यह मान लेना चाहिए कि चार कोस की परिधि के बाहर अगर आप बसेरा बनाते हैं तो आप परदेशी हो जाएंगे. अब दूरी और मात्रा का फर्क भले ही आ जाए लेकिन हम अपने ही देश में परदेशी की तरह जी रहे हैं. मैं इसका महिमामण्डन कैसे कर सकता हूं? अपनी जमीन से उखड़ा आदमी दूसरे की जमीन पर खड़ा होकर यह दावा कैसे कर सकता है कि यह मेरी जमीन है, जबकि सांस्कृतिक रूप से वह उस जमीन के साथ कभी जुड़ ही नहीं पाता.
अब यह तो मेरा स्वार्थ है जो अपनी कमाई-धमाई, काम-काज के चक्कर में यहां पड़े हुए हैं और चाहते हैं कि लोग हमें अपना मान लें. क्यों मान लेगा भाई? अगर हमें अपनी माटी से इतना ही मोह है तो बिना कुछ आगे-पीछे सोचे तुरंत लौट जाना चाहिए. बाकी आप कुछ भी कहें वह कुतर्क से ज्यादा कुछ नहीं होगा. अगर नहीं लौट सकते तो हमें अपमान सहने की आदत डाल लेनी चाहिए. वैसे भी प्रवासी स्वभाव धीरे-धीरे एक संकट बनता जा रहा है. आखिरकार इससे देश का सांस्कृतिक ताना-बाना बुरी तरह से क्षतिग्रस्त होगा.
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हम भी उसी परेदेशी होने की पीड़ा सह रहे हैं. लेकिन कोई उपाय नहीं है.लौटना तो चाहते हैं लेकिन पीड़ा यह है अपने क्षेत्र में रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं है इसलिये लौट नहीं सकते. मैने एक बार अपने कम्यूनिटी की किसी सभा मे कहा था जितना पैसा मेरे को यहाँ मिल रहा है यदि उसका आधा भी अपने शहर में मिलेगा तो लौट जाउंगा…मैं अब भी उस बात पर कायम हूँ.
परदेशी तो परदेशी ही रहेगा,कभी भी देशी नही हो सकता! अब तो अपने देश जाने से ही डर लगता हे
सबै भूमि गोपाल की। हम तो यही मानते हैं। जहां बस गए वही देश है, कम से कम अपने देश में। हां, लेकिन परदेशी होने की टीस तब भी सालती है।
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दुनिया की सबसे उर्वर भूमि है, विस्तृत बाजार और पूंजी भी मौजूद है, लेकिन गलत आर्थिक नीतियों और निकम्मेपन के कारण यहां का स्वाभाविक विकास बाधित है।
बैंकों में जमा अधिकांश पैसा बाहर चला जाता है। यहां के किसान और स्थानीय कारोबारियों को पांच प्रतिशत सैकड़ा/महीना सूद पर महाजनों से पूंजी लेनी पड़ती है। यही कारण है कि फलों, सब्जियों के भरपूर उत्पादन के बावजूद छोटे-छोटे उद्योगों का जाल नहीं फैल सका। हाईटेक उद्योग लगाने के लिए एनआरआई या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से रोजगार का सृजन नहीं होगा। वे आ भी नहीं रही हैं। अकेले गुड़-खांडसारी का उद्योग लाखों हाथों को रोजगार दे सकता है।
लेकिन इसको प्रोत्साहन तो दूर पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं। छोटे, कुटीर-लघु उद्योगों और कृषि के विकास से यहां के करोड़ों लोगों को सम्मानपूर्वक रोजगार मिल सकता है और उन्हें बार-बार की जिल्लत से बचाया जा सकता है।
विस्तार से पढ़ने के लिये देखें – http://www.nukkar.blogspot.com/