दिल्ली दरबार “पप्पू कान्ट वोट साला”

भारतनामा “शिक्षा चाहिए संस्कार नहीं”

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ज्ञानदत्त जी ऐसा कुतर्क तो गृहमंत्रालय भी नहीं करेगा

Posted by संजय तिवारी on Mar 29th, 2008 and filed under बात करामात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

मैं जानता हूं कि आर्थिक नीतियों के बारे में मेरी बातों से ज्ञानदत्त पाण्डेय शायद ही कभी सहमत होते हों. उनके अपने तर्क होंगे. उनकी अपनी पढ़ाई लिखाई और उस पढ़ाई का अपना एक परसेप्शन होगा. एक समझ होगी. अपनी उस समझ के साथ वे रहने के लिए स्वतंत्र हैं. लेकिन…..लेकिन…..लेकिन

जब गृहमंत्रालय मान रहा है कि वहां विकास रोक दिया जाए जहां नक्सलवाद पनप रहा है उसके बचाव में सिर्फ इसलिए तर्क खोज लेना क्योंकि एक ऐसा ब्लागर लिख रहा है जिसकी बातों से आप असहमत रहते हैं यह तो ठीक नहीं. इसमें तो हंसी हो जाएगी पाण्डेय जी.

सत्य तक पहुंचने के लिए जीवन में बड़ी तपस्या करनी होती है. बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है और स्वाभाविक रूप से संघर्ष का वरण करना होता है. सुविधायुक्त जीवन जीकर सत्य तक नहीं पहुंचा जा सकता. बुद्ध बनना है तो राजमहल छोड़िये. राम होना है तो 14 वर्ष का वनवास लीजिए. दुर्भाग्य से आज जो अपने आप को ज्ञानी कहते हैं वे सब सुविधाभोगी लोग हैं. आकंठ भोग में लिप्त नौकरशाह और व्यापारी जब देश की नीतियां बनाते हैं तो उनसे जनकल्याण की कल्पना करना बौद्धिक दिवालियापन होता है. वे जो कुछ नीति बनाएंगे उससे सत्यानाश ही होगा. वही हो भी रहा है.

कम से कम इतनी इंसानियत वित्तमंत्री में बची है कि वे मान रहे हैं कि विकास जरा ज्यादा तेज हो गया है इसलिए मंहगाई बेलगाम होती जा रही है. लेकिन वे लोग इस कड़वे सच को मानने के लिए भी तैयार नहीं हैं जो उन नीतियों के समर्थन में खड़े रहे हैं. हवा-हवाई योजनाएं और नीतियां और उसके हवा हवाई पालनहार. हो रही है गैंबलिंग और कहते हैं कि देश का विकास हो रहा है. अरे यार सीधे-सीधे बोलो ने पूंजीपतियों का विकास हो रहा है और उसका कुछ जूठन ऐसे पूंजीपतियों के दलालों और पिट्ठूओं को भी मिल रहा है जो उसकी चाकरी करते हैं. कुल कित्ते लोग होंगे ऐसे?

10 लाख, 15 लाख, या फिर 25 लाख. तो क्या 25 लाख लोग सियार की तरह किसी भी बात पर हुंआ-हुंआ चिल्लाने लगेंगे तो उसे सही मान लिया जाएगा? वह विकास हो जाएगा? जिन्हें प्रगति और विकास का अंतर नहीं पता, जिन्हें पर्यावरण और मनुष्य के स्वभाव का अंतरसंबंध नहीं पता, जो पिण्ड-ब्रह्माण्ड के बारे में कखग नहीं जानते वे विकास की बात करते हैं. मजा देखिए जो खुद ठीक से इंसान नहीं बने वे इंसानों के लिए योजनाएं बनाते हैं. चार अक्षर किताब पढ़ लेने से लोकमर्यादा और लोकशास्त्र समझ में नहीं आता. पढ़ने से प्रकृति के साथ तादात्म्य नहीं स्थापित होता. विकास प्रकृति की सतत प्रक्रिया है, उन्नत समझ यह है कि हम उसके साथ तालमेल बैठाना सीख जाएं.

टीन, डिब्बा और प्लास्टिक के औजार गढ़ लेना विकास नहीं है. उसमें भी तो नकलची ही हैं. भारत इन सबको खारिज करता है. भारत को समझना हो तो पहले ठीक से भारती की मिट्टी से जुड़िये. नित्य प्रति उसके साथ तादात्म्य स्थापित करिए. अपनी समझ उसके ऊपर लादने की बजाय उस मिट्टी से अपनी समझ साफ करिए. क्या हम क्या आप. जरा करिए तो ऐसा आपको विकास भी समझ में आयेगा और विकास की नौटंकी भी.

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10 Responses for “ज्ञानदत्त जी ऐसा कुतर्क तो गृहमंत्रालय भी नहीं करेगा”

  1. Shiv Kumar Mishra says:

    बहुत बढ़िया लिखते हैं आप. आर्थिक विकास की बात पर बहुत कन्फ्यूजन है. और ये बात आपकी पोस्ट में बखूबी दिखाई देती है.

  2. दिनेशराय द्विवेदी says:

    मैं आप से सहमत हूँ। सारे फलदार पौधे खजूर और नारियल हो रहे हैं। कोई नीचा नहीं रह गया है। जिस से केवल गरदन का विकास हो रहा है और हर जानवर ऊँट हुआ जा रहा है। जो नहीं हो रहा है।

  3. अजित वडनेरकर says:

    बढ़िया पोस्ट।

  4. Gyandutt Pandey says:

    लेकिन मैने भी तो गृह मंत्रालय की मजम्मत ही की थी अपनी टिप्पणी में! टिप्पणी देखें:
    कैच 22 है। जहां नक्सलवाद पनप रहा है वहां विकास न हुआ तो नक्सलवाद और पनपेगा।

    कैच 22 का अर्थ है – a problematic situation for which the only solution is denied by a circumstance inherent in the problem or by a rule. और मैँ गृहमंत्रालय के तर्क के विरुद्ध ही कह रहा हूँ, अगर आपने गृहमंत्रालय को सही कोट किया है, तो।

    हां, आप अगर किसी के विरुद्ध कहें तो उसे लिंक करने का कष्ट भी किया करें।

    आप लिखते अच्छा हैं, और फनफनाते हैं तो और अच्छा लिखते हैं!

  5. Rajesh Roshan says:

    बढ़िया है, लेकिन मुझे लगता है की थोड़ा जल्द बजी में लिख दिया गया है, और उम्दा हो सकता था. फ़िर भी अच्छा है
    Rajesh Roshan

  6. PD says:

    Hummmm….

  7. बाल किशन says:

    “सत्य तक पहुंचने के लिए जीवन में बड़ी तपस्या करनी होती है. बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है और स्वाभाविक रूप से संघर्ष का वरण करना होता है. सुविधायुक्त जीवन जीकर सत्य तक नहीं पहुंचा जा सकता. बुद्ध बनना है तो राजमहल छोड़िये. राम होना है तो 14 वर्ष का वनवास लीजिए. दुर्भाग्य से आज जो अपने आप को ज्ञानी कहते हैं वे सब सुविधाभोगी लोग हैं. आकंठ भोग में लिप्त नौकरशाह और व्यापारी जब देश की नीतियां बनाते हैं तो उनसे जनकल्याण की कल्पना करना बौद्धिक दिवालियापन होता है. वे जो कुछ नीति बनाएंगे उससे सत्यानाश ही होगा. वही हो भी रहा है.”

    बुद्ध और राम बनाकर क्या होगा संजय भाई? अगर हम भगवान न बनकर ‘इंसान’ बने रहें तो वही काफी है. वैसे ये जानते हुए कि नौकरशाहों और व्यापारियों से जनकल्याण की कल्पना करना बौद्धिक दिवालियापन है, ऐसी कल्पना क्यों करते हैं? अगर ऐसी कल्पना से बचा जाय तो फिर आए दिन उनको गाली देने की जरूरत न पड़े.

    और जहाँ तक वित्तमंत्री में इंसानियत की बात है तो केवल ये मान लेने से कि विकास बढ़ने से ही मंहगाई बढ़ रही है, इससे बड़ी बेवकूफी और कुछ नहीं हो सकती. विकास बढ़ने से मंहगाई का बढ़ना एक स्तर तक ठीक है. लेकिन इस तरह की मंहगाई के बढ़ने के पीछे केवल विकास की दर ही जिम्मेदार नहीं है. खाद्य सामग्री से लेकर अन्य चीजों को सही समय पर सही जगह पहुंचाने के लिए जिस इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, वह हमारे पास नहीं है. वित्तमंत्री अगर इतने ही ईमानदार हैं, तो इस बात को स्वीकार क्यों नहीं करते? सडकों की हालत पर गौर कीजिये. बंदरगाहों की हालत पर गौर कीजिये. खाद्य पदार्थों की स्टोरेज सुविधा पर गौर कीजिये. उसके बाद अपने ईमानदार वित्तमंत्री से प्रश्न पूछिए कि साहब, आपने इन सुविधाओं को सुधारने के लिए क्या कदम उठाया? आज हालत यह है कि खाने के तेल से लेकर दाल तक, सबकुछ आयत होता है. विकसित देशों की बात तो जाने दें, कई विकासशील देशों में भी बंदरगाहों पर एक जहाज की आवाजाही पर दो से ढाई दिन लगते हैं. हमारे देश में औसतन चार दिन का समय लगता है. एक जहाज को रोकने का एक दिन का खर्च बहुत देना पड़ता है. तीन साल में एक बंदरगाह पर जहाज रोकने के लिए जो पेनाल्टी दी जाती है, उससे एक नया बंदरगाह बन जायेगा. ये जो पेनाल्टी दी जाती है, उसका खर्चा कहाँ जायेगा? उसी सामन के दाम में घुसेगा जिसे ये जहाज ले आएगा.

    अब ईमानदार वित्तमंत्री की बात चली है तो कुछ बात मुद्रास्फीति की दर पर जारी किए गए सरकारी आंकडों की बात कर ली जाय. जनवरी के अन्तिम सप्ताह तक तो क्या फरवरी के मध्य तक मुद्रास्फीति की दर चार प्रतिशत से नीचे थी. अचानक ऐसा क्या हुआ कि ये दर केवल चार हफ्तों में साढ़े छ प्रतिशत से ज्यादा हो गई. इस बात का जवाब है ईमानदार वित्तमंत्री के पास? नहीं है. इसका एक ही जवाब है. जब तक आपको अपने देश की अर्थव्यवस्था के बारे में ढिंढोरा पीटना है, तब तक आप सरकारी आंकडों को अपने हिसाब से जारी करते रहें. इस मामले में भारत और चीन दोनों एक से निकले.

    ऐसा नहीं है कि ये मंहगाई अचानक रातों-रात आई है. अभी एक महीने पहले ही आपके ईमानदार वित्तमंत्री व्याज दरों को घटाने की बात कर रहे थे. एक महीने में ऐसा कौन सा बदलाव आ गया कि मुद्रास्फीति की दर इतनी बढ़ गई कि अब व्याज दर बढ़ाने की बातें हो रही हैं.

    और एक बात. अपने-अपने क्षेत्रों में काम करने वालों की हालत कैसी है, ये इस बात से पता चलता है कि मीडिया में काम करते रहने के बावजूद आपको ये नहीं पता कि हमारे देश में नक्सलवाद के पनपने की पीछे लोग एक ही कारण बताते हैं और वह है विकास का न होना. जिन पाण्डेय जी की हंसी उडाने की कोशिश की है आपने उन्होंने अपनी टिपण्णी में ऐसा क्या लिखा है जिससे उनकी हंसी उडाई जा सकती है. या फिर शायद ऐसा है कि कैच २२ किस बात के लिए इस्तेमाल किया जाता है, आपको उ

  8. संजय तिवारी says:

    बालकिशन जवाब तो मैं दे सकता हूं लेकिन मेरी दिक्कत यह है कि मैं बहस करता हूं विवाद नहीं. आप जिस तरह लिख रहे हैं वह विवाद को निमंत्रण है.

  9. बाल किशन says:

    संजय भाई,
    मेरा इरादा विवाद खडा करना नहीं है. जहाँ तक बहस की बात है तो बहस होनी चाहिए. बहस की जा सकती है. आप ऐसा न समझें कि मैं विवाद खडा करना चाहता हूँ. मैंने अपनी टिपण्णी में ऐसा कुछ भी नहीं लिखा जिससे ये पता चले कि मेरा ध्येय विवाद को बढावा देना है. आख़िर ये मुद्दा कोई ब्लागिंग ने जुदा हुआ मुद्दा नहीं है. इसलिए जब भी बहस होगी तो सार्थक ही होगी.

    बहस तो जरूर कीजिये.

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