लोग चर्चा करते हैं कि अगर तकनीकि का विस्तार इसी तरह जारी रहा तो आनेवाले समय में आदमी तकनीकि का गुलाम हो जाएगा. वह समय कब आयेगा पता नहीं लेकिन आज का समय तो यह है ही कि ज्यादातर सभ्य लोग पैसे के गुलाम हो गये हैं. असभ्यों की बात कौन करे. विज्ञान,तकनीकि, उद्योग, जीवन, मरण, संबंध, विच्छेद, सबकुछ पैसे के अधिपत्य में जा चुका है. पैसा दनदनाता हुआ घूम रहा है और हम है कि उसके आगे लाचार हुए जाते हैं.
धन और द्रव्य का भेद ही खत्म हो गया है. अब द्रव्य ही धन हो गया है. ऐसे में कुछ लोगों को द्रव्य की लालसा छोड़कर धन की साधना करनी होगी. धन क्या होता है यह समझना होगा और वह द्रव्य से कैसे भिन्न होता है यह भी जानना होगा.
धन शास्वत होता है. आजकल स्थूल रूप में बहुत कांट-छांट करके उसे प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है लेकिन धन की परिधि बहुत विशाल है. मान-सम्मान भी धन है और बेटा-बेटी भी. विश्वास का रिश्ता भी धन है और अपने प्रति किसी का निश्चल प्रेम भी धन है. मां की ममता धन है तो प्रेयसी की मनुहार भी धन है. भाई का समर्पण धन है तो पड़ोसी की सदिच्छा भी धन है. शुद्ध हवा और पानी भी धन है तो पवित्र मिट्टी का कोमल स्पर्श भी धन है. कागज के नोट और लोहे तांबे के सिक्के तो धन कदापि नहीं हो सकते.
लेकिन बाजार की ताकत और मूर्खों की मंडली ने पैसे की ताकत को ऐसे स्थापित कर दिया है कि हम धन और द्रव्य का भेद ही भूल चुके हैं. यह भूल और भ्रम मिटे तो दुनिया दिखाई दे. इंसान होना समझ में आये और यह भी समझ में आये कि पिण्ड का ब्रह्माण्ड से क्या रिश्ता है? हमारे होने का दूसरे के लिए क्या अर्थ है हमारे होने के लिए दूसरे का होना कितना जरूरी है?
पैसा न हारा तो सब हार जाएंगे. सत्य हारेगा नहीं लेकिन कुछ काल के लिए नेपथ्य में अवश्य चला जाएगा. सत्य का नेपथ्य में जाना आखिरकार हमें ही नुकसान पहुंचाएगा. एक सुंदर दुनिया से बेदखल ही चले जाएंगे हम सब. अगर प्रकृति की संपूर्णता को समझना है और इसकी वास्तविक खूबसूरती को देखना है तो पैसे को किनारे कर दीजिए. कुछ काम ऐसा भी करिए जिनका कोई आर्थिक प्रयोजन न हो. जो सिर्फ काम हो. आप देखेंगे कि आप उस वक्त सबसे ज्यादा अपने साथ होते हैं जब आप पैसे के लिए काम नहीं करते.
उस अपनेपन में ज्यादा समय रहने की कोशिश करनी चाहिए. पैसा तो बाजार और सरकार द्वारा शोषण के लिए खड़ा किया गया वर्चुअल स्टेट है. उसका वास्तविकता से कुछ लेना देना नहीं है. अपनी उस सनातन समझ की ओर लौट जाईये जो आपकी मूल अभिव्यक्ति है. नहीं जा सकते तो आप अपने होने से ही मरहूम रह जाएंगे. सच बोलता हूं.
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‘मूल्य’ पर भी दर्शन दें । कुमारप्पाजी उदाहरण देते हैं : दूध का वास्तविक मूल्य उससे मिलने वाला पोषक तत्व है। इस प्रकार जब गाँव से रुपयों के बदले दूध शहर चला जाता है तब उसके वास्तविक मूल्य से गाँव वंचित हो जाता है ।
सही कहा आपने. बिल्कुल सहमत हूँ आपसे.
बिना धन की चिंता किये भी कुछ काम करें. कर रहे हैं ना जी ब्लॉगिंग
संजय जी मे आप की बात से सहमत हु,पेसा सब कुछ नही, ओर हमे सब कुछ पेसे के लिये ही नही करना चाहिये,
कुमारप्पा जी की सुनी किसने? सच्चाई तो यही है. हो भी यही रहा है.
अफलातून जी मैंने कोई दर्शन नहीं दिया है. मन में ऐसी कुछ बातें आती हैं तो ब्लाग पर लिख देता हूं. इसका अर्थ यह नहीं कि मैं कोई दार्शनिक हूं. दर्शन की क्षमता पा लेना बोध की बहुत गहरी अवस्था है. चलिए अगली पोस्ट इसी पर. सक्रियता के तीन तल.