विद्वान होने के लिए बहुत सारे लोग 33 करोड़ देवी-देवता को मिथक साबित करके भारत और भारतीयता का मजाक उड़ाते हैं. लेकिन शायद ही किसी विद्वान ने इसके बारे में समझने की कोशिश की हो कि समाज में ऐसे प्रतीक आखिर गढ़े क्यों जाते हैं? आखिर वह कौन सी समझ है जो समाज को शासन के तंत्र में नहीं बांधती बल्कि धर्म के अनुशासन में रहने को प्रेरित करती हैं. यह समझ में आये तो यह भी समझ में आयेगा कि भारत में जो धर्म प्रतीक गढ़े गये हैं वे किसी सिद्ध के दर्शन का परिणाम हैं. वे कुछ संकेत कर रहे हैं जो बुद्धि की पकड़ के बाहर है. इसलिए श्रद्धा और विश्वास की परंपरा साथ में जोड़ दी गयी है.
असल में भारत और भारतीयता दोनों ही गूंगे का गुड़ हैं. यह सीधे समझ में आती है. और आप जीने लगते हैं किसी परिभाषा वगैरह की बहुत जरूरत होती नहीं है. तर्क की तो बिल्कुल नहीं. जो करे, वह मरे.
शिवलिंग के बारे में थोड़ा बोलता हूं. शिवलिंग सृष्टि के उद्भव का संकेत है. सूत्र है. योनि में लिंग की स्थापना कोई पोर्नोग्राफिक उत्तेजना पैदा करने के लिए नहीं है. आप ध्यान से शिवलिंग देखिए. वह योनी में स्थापित होता है. कह सकते हैं वह महामैथुन है. आत्मा का प्रकृति के साथ महासंभोग. यह महासंभोग केवल बाहर नहीं है. यह हमारे अंदर भी है. तंत्र में इसे आंतरिक मैथुन कहा गया है.
असल में हम सबके दो भाव हैं. स्त्रीभाव भी और पुरूषभाव भी. हर स्त्री थोड़ी मात्रा में पुरूष होती है और हर पुरूष थोड़ी मात्रा में स्त्री होता है. यह कहने की बात नहीं है. यह सब समझते हैं. आप अपने आप को देखेंगे तो समझ में आ ही जाता है. ये दो भाव दो ध्रुव बनाते हैं. इन दोनों ध्रुवों का जो मध्यमिलन होता है वह हुआ मैथुन. जहां दोनों ध्रुव आकर टूट जाते हैं. एक दूसरे में इस तरह समाहित हो जाते हैं कि द्रष्टा बन जाते हैं. दोनों नहीं रहते. एक ही रहता है. जब मिलते हैं तभी समझ में आता है कि कभी दो थे ही नहीं.
शिवलिंग का संकेत इसी ओर है. प्रकृति और हम कभी दो है हीं नहीं. इसलिए पंचमहाभूत का सिद्धांत कहता है कि स्थूल में पांच तत्व मिलकर इस शरीर की रचना करते हैं जिनका आत्मा से संयोग होता है तो जीव हो जाता है. वियोग हुआ तो मर्त्य हो जाता है. तुलसीदास ने इन पंचमहाभूत के बारे में बड़ी सरलता से रामचरित मानस में लिखा हैः क्षिति,जल,पावक, गगन समीरा।पंच रचित यह अधम शरीरा।।
लेकिन शिवलिंग पर यह सांप क्यों है भला? मैं तो कुछ नहीं कहता लेकिन आप थोड़ा भारतीय जीवन दर्शन में व्याप्त माया के सिद्धांत के बारे में सोचिए. और यह भी सोचिए कि काल को सांप से क्यों परिभाषित किया गया है? फिर इन दो बातों को मिला दीजिए. इसके बाद जो पूरी तस्वीर बनती है वह यह कि प्रकृति और आत्मा के संयोग से सृष्टि (जीवन) का अस्तित्व आता है जिसे मायारूपी काल घेरकर बैठा रहता है.
तो अगली बार आप किसी शिवलिंग को शीश झुकाएं तो इस बात का ख्याल रखें कि आपकी श्रद्धा अंधी नहीं है. असल में आप सबसे परिष्कृत विज्ञान को समझने की कोशिश कर रहे हैं. बस.
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संजय जी देखना कोई निरपेक्ष क्रिया नहीं है. देखेगा कोई वही जो वह देखना चाहेगा. ऐसे लोग भी हैं जो देवी-देवताओं के चित्र पोर्नोग्राफिक ढंग से बना सकते हैं. और ऐसे भी, जो ऐतिहासिक सत्य की पेंटिंग को भी समाजविरोधी बता कर उसे प्रदर्शनी से उठा ले जा सकते हैं. इसलिए ३३ करोड़ देवी-देवताओं का मजाक उडाने पर कोई अफ़सोस नहीं होना चाहिए.