उग्रवाद के दो प्रकार हैं. आजकल हम जिसे उग्रवाद समझ रहे हैं वह प्रतिक्रिया में पैदा हुआ है. लेकिन असली उग्रवाद वह है जो प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित करता है. इस उग्रवाद को पिछले 200-300 सालों से व्यापार कहा जाने लगा है. आजकल पूरे भूमंडल पर इसी उग्रवाद का बोलबाला है.
इन ग्रोथ उग्रवादियों का अपना ही विज्ञान है जो पश्चिम के साम्राज्यवादी ईसाई विचारधारा का पालन-पोषण करता है. ये ग्रोथ उग्रवादी आपको दुनिया के हर हिस्से में मिल जाएंगे. सोमालिया में बंदूक बेचते हुए तो बांग्लादेश में कबाड़ के कारोबार से लोगों की जान लेते हुए या फिर थाईलैण्ड की पवित्र संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करते हुए. व्यापार के नाम पर ये ग्रोथ उग्रवादी न केवल पर्यावरण का शोषण करते हैं बल्कि समाज, व्यक्ति, जीव और जीवन सबको संकट में डाले बैठे हैं. पहले आपको कहेंगे कि ग्रोथ रेट बढ़ाओ, जब आप अपना ग्रोथ रेट बढ़ा लेते हैं तो कहते हैं कि आपका पर्यवारण नष्ट हो रहा है. आप तो जाहिल हैं. आपको पर्यावरण के बारे में कुछ पता ही नहीं है.
अपने देश में भी बहुत सारे ग्रोथ उग्रवादी पैदा हो गये हैं. सरकार तो खैर घोषित तौर ग्रोथ उग्रवादियों की गोद में बैठी हुई है. बहुत सारे विचारक, पत्रकार, वैज्ञानिक, इंजीनियर और डाक्टर भी ग्रोथ उग्रवादियों की गिरफ्त में हैं. गिरफ्त में क्या वे खुद ही ग्रोथ उग्रवादी बन गये हैं. अपने पड़ोसी को लूटना हो लूट लो, पर्यावरण का नाश करना हो कर दो, पानी को विषैला बनाना हो बना दो, हवा को जहरीला बनाना है बना दो, बस किसी तरह ग्रोथ उग्रवादियों की लिस्ट में अपना नाम शामिल कराने की होड़ लगी हुई है.
फिर अगर अलकायदा, माओवादी, नक्सली, जेहादी पैदा होते हैं तो उन्हें उग्रवादी घोषित कर दो. उनके खिलाफ शसस्त्र संघर्ष करो इससे ज्यादा स्थाई और संपन्न बनानेवाला हथियार उद्योग का ग्रोथरेट बढ़ता है. बहुराष्ट्रीय कंपनियां और दुनियाभर के शेयर बाजार असल में ग्रोथ उग्रवाद के जनक हैं लेकिन तमाशा देखिए हम उन्हें विकास के दूत मान रहे हैं.
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बिना किसी राज्य के सहयोग के बिना कही भी किसी प्रकारका उग्रवाद नही पनप सकता है । साम्राज्यवादी शक्तीयाँ अपने हित पोषण के लिए ही विकासशील देशो मे उग्रवाद बढाने के लिए अपने संसाधन देती है । देश के राज्नैतिक परिवेश के अन्दर भी उन साम्राज्यवादी मुलुको के अनेक दलाल अनेक मुखौटो मे मौजुद है , इस लिए राश्ट्रवादी शक्तिया उन उग्रवादी संगठनो का सफाया नही कर पाती है । ज्यादातर साम्रज्यवादी शक्तियो को गाली देते रहने वाले राज्नैतिक दलो के अन्दर उनके अनेक दलालो की उपस्थिती है । हम लोगो वह सोचने के मज्बुर है जो विश्व के आका चाहते है , उसके लिए उसी प्रकार सुचना की सुचना संचार तंत्रिका काम कर रही है । एसे मे आपका लेख मौलिक सुचना प्रदान करता है तथा हमे धुध के पार देखने का अवसर प्रदान करता है ।
संजय भाई
इस सार्थक आलेख के लिये बधाई देना चाहूँगा, स्वीकार करें.
संजय जी बिलकुल ठीक लिख रहे हे आप धन्यवाद
ये बात बार-बार कहे जाने की ज़रूरत है ताकि लोग समझे और याद रखें!