हमारे बिजनेस अखबार आयातित बुद्धि के प्रभाव में कंपनियों को रिपोर्ट करते समय निवेश पत्रकारिता का रूख अपनाते हैं. अखबारों और चैनलों में बिजनेस रिपोर्टिंग में हर रोज ऐसी खबरें होती हैं कि यह कंपनी यहां इतना निवेश करेगी. वह कंपनी वहां उतना निवेश करेगी. लेकिन कभी आपने यह भी सुना कि उस निवेश की जरूरत वहां है कितनी? या फिर निवेश करने का प्रभाव होगा या दुष्प्रभाव. हमारे बिजनेस अखबार इसे पत्रकारिता नहीं मानते. वह जो निवेश कर रहा है उससे उसे फायदा कितना होगा और समाज-पर्यावरण को कितना नुकसान इसका कोई आंकलन कभी हमारे बिजनेस पत्रकार नहीं करते. भाई कुएं में बाल्टी डालने की खबरें देते हो लेकिन उसने वहां से कितना पानी उलीचा कभी यह खबर क्यों नहीं बनाते?
इसीलिए मैं इन पत्रकारों को कंपनी पत्रकार कहता हूं. पत्रकार भी क्यों कहें? पी साईंनाथ ठीक कहते हैं कि असल में ये लोग स्टेनोग्राफर हैं. जो कंपनियों से डिक्टेशन लेते हैं. इस डिक्टेशन के बदले उन्हें तनख्वाह के अलावा कुछ गिफ्ट-शिफ्ट भी मिल जाता है.
पत्रकारिता तो शायद ही कहीं बची हो. हिन्दी टीवी चैनलों ने अपनी औकात दिखा दी है और यह साबित कर दिया है कि हिन्दी लुच्चों और लफंगों की भाषा है इसलिए उनकी प्राथमिकता वही लोग हैं. बिजनेस अखबर और चैनल तो कंपनियों को रिपोर्ट करने को ही पत्रकारिता समझते हैं. लगता है फिर पश्चिम से कोई हवा आयेगी तो इन पत्रकारों की बुद्धि ठिकाने आयेगी इनकी अपनी कोई समझ तो बची नहीं है.
पत्रकारिता का एक मूलभूत सिद्धांत है कि वह खबर नहीं है जो आपके पास चलकर आती है. खबर वह है जिसके पास चलकर आप जाते हैं. और इस चलने-फिरने में भी एक बात नहीं भूलनी चाहिए आपका अंतिम लक्ष्य आम आदमी की भलाई, उसका हक-हित सुरक्षित करना है न कि कंपनियों और साम्राज्यवादी ताकतों का. लेकिन अव्वल तो पत्रकारों ने चलने-फिरने से ही तौबा कर लिया है. चलते-फिरते भी हैं तो वहीं जाते हैं जहां उन्हें ले जाया जाता है.
ज्यादा कुछ तो नहीं सिर्फ इतनी प्रार्थना करता हूं कि ऐसे स्टेनोग्राफरों से भगवान इस देश की रक्षा करें.
Possibly Related Posts:
- मीडिया जगत में विस्फोट
- पत्रकार बातूनी क्यों होते हैं?
- नाजायज लाईव कवरेज बंद होना चाहिए
- गूगल गणराज्य का मालिकाना हक
- हिन्दी ब्लाग बनें वैकल्पिक मीडिया
आप ठीक कहा ,भगवान् ऐसे पत्रकारों से हमारे देश को बचाए….
संजय भाई,अच्छी नब्ज़ पकड़ी है आपने,वाकई ऐसे पत्रकार हैं जो तीन तेरह में लगे रहते हैं,उनका जनता से दूर दूर तक कोई नाता नहीं होता है…
संजय भाई ,
बडा कटु है मगर सत्य है, और ये ही सत्य है कि व्यापार के इस दौर में बस ब्यव्सायही बचा रह गया है, पत्रकारिता गयी तेल बेचने, आपने सत्य कहा बहुत सारे पत्रकार मित्र इस पर अपनी राय रखेंगे मगर करेंगे वही जो आपने लिखा है । अब उनकी मजबूरी या उनके जेब कि ये तो वो ही जाने मगर अपने कलम को उन्होने अपने मालिकान का रखैल जरूर बना दिया है
अपुन तो इसी इंतज़ार में बैठे हैं कि शायद कभी कोई सूरत निकल आए क्योंकि असली खबरें तो बाज़ार के फलने-फूलने और लोकतंत्र के लिए भी ज़रूरी हैं।
रजनीश जी दोष मालिकों का उतना नहीं है जितना पत्रकारों का है. आखिर उन्होंने ही तो अपनी शर्तों पर काम करना छोड़ दिया है. नहीं तो क्या मजाल है जी कोई मालिक किसी पत्रकार पर चढ़ जाए, एक मिनट न लगे ऐसी नौकरी को लात मारने में.
@अनिल जी, बिल्कुल सही कह रहे हैं लेकिन जब तक यह बात समझ में आयेगी भाई लोग काफी नुकसान कर चुके होंगे.
संजय जी नमस्कार,
इन स्टेनोग्राफर कम पत्रकारों से मुझे कोई गिला नही भले ही प्युरिस्ट्स का दिल दुखता हो. वैसे उनकी खबरें पढते हीं कितने लोग हैं!
मुझे चिंता है इन “सनसनी” हिन्दी चैनलों के पत्रकारों की – जिनकी दर्शक करोड़ों की जनता है.
सौरभ