दिल्ली दरबार “पप्पू कान्ट वोट साला”

भारतनामा “शिक्षा चाहिए संस्कार नहीं”

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औधिया जी के लेख भाषण ही होते हैं

Posted by संजय तिवारी on Apr 23rd, 2008 and filed under बात करामात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

क्योंकि मैंने स्क्रीनशाट नहीं रखा इसलिए औधिया जी के लेख पर हेडिंग कैसे बदल गयी इस पर बात करने का कोई मतलब नहीं रह जाता. ऐसी गलढिढाई हो तो क्या बात करना. लेकिन कोई घोस्ट बस्टर टिप्पणी कर गये हैं कि “आप अतिवादिता के शिकार दिखते हैं इस पोस्ट में. अवधिया जी का आलेख सुंदर है. विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण विनाश के खतरों पर भी सोचने का कुछ समय आम आदमी निकाल पाये तो अच्छी बात होगी. “

जी हां, घोस्ट बस्टर महोदय. मैं तो हूं ही पर्यावरणविरोधी. लेकिन आपकी टिप्पणी बताती है कि आपने पोस्ट पढ़ी नहीं. अगर पढ़ते तो आपकी टिप्पणी कुछ और होती. मैंने लिखा है कि “पंकज जी, मुझे हेडिंग से बहुत नासमझी दिखती है. जो अभी भी अपनेआप को पर्यावरण के ऊपर समझती है.”

और हां, अनाम महोदय, औधिया जी से मैं कभी मिला नहीं लेकिन नेट पर उनके बारे में काफी खोजबीन की है. शुरूआत में उनके उन तरीकों से बहुत प्रभावित था कि कोई वैज्ञानिक ऐसे मिट्टी से जुड़कर बात कर रहा है लेकिन थोड़े ही दिनों में मायूसी हाथ लगी. हिन्दी में उनके ज्यादातर लेख भाषण ही होते हैं. इसमें अन्यथा क्या है? उन्हें मंचों से भाषण देने की आदत है. यही उनका काम भी है. हिन्दी में मैंने जितने भी लेख उनके देखे हैं उनमें अधिकांश लेखों में मुद्दे होते हैं, उनकी नाराजगी या प्रसन्नता होती है लेकिन तथ्य, अध्ययन और वैज्ञानिक विश्लेषण का पूर्णतया अभाव होता है.

हो सकता है वे समझ की उस धरातल पर पहुंच गये हों जहां तथ्यों आदि की बहुत जरूरत नहीं होती लेकिन हम तो उनसे ऐसी उम्मीद करते हैं क्योंकि हमें उस समझ तक पहुंचना है. हम उनसे इस तरह के भाषण की उम्मीद इसलिए भी नहीं करते क्योकि वे वैज्ञानिक हैं. सामान्य बात तो कोई भी कर सकता है. यह तो हमारी लोकोक्तियों में भी मिल जाती हैं. उन कहावतों, सिद्धांतों का वैज्ञानिक आधार क्या है जो हम अपने आस-पास देखते हैं और उनका हमारी पर्यावरणीय समझ से रिश्ता कैसे बनता है ऐसे तथ्यों का उनके लेख में घोर अभाव रहता है. इसलिए मैंने भाषण कहा है.

मैं उनके अंग्रेजी के लेखों को देखना चाहता था लेकिन उनके ब्लागों में जहां भी गया वहां एक इकोपोर्ट साईट का लिंक मिला. इकोपोर्ट पहुंचा तो पंकज जी का नाम डालने नतीजा आता है No Match Found for Entity. आपको कुछ मिल जाए तो लिंक मुझे भी भेज दीजिए. मैं खुद उनके कुछ तथ्यात्मक लेख पढ़ना चाहता हूं. भाषण नहीं.

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7 Responses for “औधिया जी के लेख भाषण ही होते हैं”

  1. Anonymous says:

    bravo it needs guts to say things so clearly

  2. Anonymous says:

    शीर्षक बदलने पर ब्लागवाणी में शीर्षक बदल जाता है. आप चाहें तो ये प्रयोग खुद कर सकते हैं.

  3. Ghost Buster says:

    ब्लौगवाणी शीर्षक नहीं बदलता, ऐसा हमने एक पिछले अनुभव के चलते कहा था. उदाहरण प्रस्तुत है:

    ४ अप्रैल २००८ को गौरव सोलंकी जी की पोस्ट थी, “चोरी का ‘प्रीतम’ : देखिए चुराए गए असली 29 गाने”. ब्लौग वाणी ने शीर्षक इसी रूप में दर्शाया था. बाद में गौरव जी ने ३ और गाने जोड़ कर संख्या ३२ पर पहुँचा दी. तदनुसार शीर्षक में भी बदलाव किया और वो हुआ , “चोरी का ‘प्रीतम’ : देखिए चुराए गए असली 32 गाने”.

    लेकिन ब्लौगवाणी ने ओरिजिनल शीर्षक ही दर्शाना जारी रखा और आज भी वो उसी रूप में है. यहाँ क्लिक करके देखिये.

  4. Saurabh says:

    मैंने पंकज जी के बारे में कोई रिसर्च तो नहीं की है – इतना समय नहीं है ;) – इसलिए कह नहीं सकता कि वह सिर्फ़ भाषण देते हैं या फ़िर कुछ तत्व है उनके लेखों में. हाँ मुझे कई बार उनके लेखों के पीछे कुछ मजबूत वैज्ञानिक आधार नहीं लगता है.

    अच्छा लगा यह जानकर कि ऐसा सोचने वाला मैं अकेला नहीं हूँ.
    सौरभ

  5. Neeraj Rohilla says:

    “पंकज अवधिया के लेख भाषण होते हैं”
    बडा अजीब सा लगा ये पढकर,

    मुझे तो उनके लेख काफ़ी प्रभावी लगते हैं । ईकोपोर्ट पर सर्च इंटरफ़ेस में कुछ लोचा है लेकिन उनके चिट्ठे पर आप उनके लिखे हुये लेख पढ सकते हैं (जहाँ वो ईकोपोर्ट पर उनके लेख का पूरा url देते हैं) ।

    परम्परागत औषधियों के दस्तावेजीकरण का जो काम वो कर रहे हैं वो निश्चय ही दूरगामी है । इसके अलावा पर्यावरण की उनकी समझ भी मुझे गहरी लगती है । मुझे सदैव उनकी भाषा संयत ही लगती है ।

    मैं यहाँ किसी विवाद में नहीं पडना चाहता लेकिन अगर उन्होने “विकास में भी वृक्षों को मौका मिलना चाहिए” भी कह दिया तो इसमें क्या बुरा है ???

    मुझे तो इस टाईटल में कोई दम्भ या भाषण नहीं दिख रहा । हो सकता है मुझे भाषा की समझ न हो, लेकिन आज दो बातों से निराशा हुयी है ।

    १) पहला तो बिना बाता का मुद्दा बनाकर एक पोस्ट डालना ।
    २) फ़िर उसके बाद भी मुद्दे का पीट पीट कर दम निकालने का दूसरी पोस्ट में प्रयास करना ।

    आपकी लेखनी सशक्त है, यदि आप इसे विवादों के स्थान पर कुछ मौलिक लिखने में लगायेंगे तो मेरे जैसे पाठकों को बडी खुशी मिलेगी ।

  6. अनूप शुक्ल says:

    नीरज रोहिल्ला की बात से सहमति। आप अपनी ऊर्जा को इधर-उधर क्यों खपा रहे हैं।

  7. Anonymous says:

    kambakhat TRP ki ladai yahan bhi shuru ho gayi kya ?

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