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मीडिया ने भी भाषाघात किया है

Posted by संजय तिवारी on Apr 24th, 2008 and filed under कारपोरेट मीडिया. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

किसी भाषा से आप क्या उम्मीद करते हैं? यह कि वह आपको कवि बना दे या फिर चूतिया? हिन्दी इन्हीं दो विधाओं की भाषा बनकर रह गयी है. प्रकाशनों के बड़े तबके ने कवि पैदा किये. कवियों की राजनीति पैदा की और साहित्य की कोंपले फोड़ते रहे. कोंपले फूटी न फूटी लोगों के सिर जरूर फूटने लगे. फिर पुरस्कार की राजनीति घुस गयी तो अच्छे साहित्यकार दवा-दारू के भी मोहताज हो गये. साहित्यकार जी के चंपुओं की एक फौज बन गयी क्योंकि बिना साहित्यकार जी की मेहरबानी से प्रकाशक भाव नहीं देता और प्रकाशक हिन्दी सेवा करने लगा क्योंकि इस सेवा के मेवा में उसका दफ्तर चलता है.

प्रकाशकों और दोयम दर्जे के साहित्यकारों के घटिया संबंधों ने भाषा को स्थाई घात मारा है. नब्बे के दशक में भारत तेजी से बदला. एक तो भूमंडलीकरण का प्रभाव ऊपर से तकनीकि की धमक. इन बदलावों ने भाषा की ओर निहारा तो पता चला कि वहां तो पिछले तीस-चालीस साल से कोंपले ही फूट रही हैं. कुछ है ही नहीं. आधार क्या बनाएं? विरोध की बात ही छोड़िये समर्थन का क्या आधार बनाएं? प्रकाशक महोदय भी बदलाव महसूस किये तो सामग्री कहां से लायें? यहां तो कोंपले ही फोड़ते रहे थे वे अब तक. अब जब बाजार का असर अंदर तक घुस गया तो टिके कैसे रहें? क्योंकि उनके साहित्यकार लोग साहित्य की कोंपले भले ही फोड़ लें लेकिन लोकोपयोगी जानकारी का कखग भी नहीं लिख सकते.

फिर साहित्यकार यह भी साबित नहीं होने देना चाहता कि वह सर्वज्ञ नहीं है. इसलिए इस बात को जोर-शोर से स्थापित करने की कोशिश की जाती है कि साहित्य ही भाषा का प्राण होती है. होती होगी. हिन्दी के लिए ऐसा कूड़ा साहित्य का ढेर तो प्राणघातक है. जहां कविता पर राजनीति होती हो और भाषा को इतना ऐतिहासिक बना दिया गया हो कि 50-55 करोड लोगों की भाषा होने के बावजूद दिवसों के सहारे जिन्दा हो.

यही हाल हिन्दी मीडिया का है. हिन्दी अखबारों ने जानकारी से ज्यादा वर्तनी पर ध्यान दिया. मेरा ज्यादा पुराना अनुभव नहीं रहा है लेकिन जबसे है तबसे मैंने एक बात अनुभव की आपकी रिपोर्ट की क्वालिटी इस बात पर निर्भर करती है कि संपादक या वरिष्ठ पत्रकार के साथ आपके संबंध कैसे हैं. उसकी समझ से आपकी समझ मेल कैसे खाती है. आपने क्या लिखा इससे कोई मतलब नहीं उसकी समझ में कितना आया इससे सारा मतलब है.

मुक्त पत्रकारिता के दौरान एक दिन एक मैगजीन के समाचार संपादक ने मुझे कहा कि यार ऐसे तो तुम सर्वाइव नहीं कर पाओगे. मैंने कहा क्यों? उसने कहा तुम रिपोर्ट पर जैसी मेहनत करते हो उसके बदले में इतना पैसा ही नहीं मिलेगा कि तुम जी खा सको. बात सही थी. इसलिए आप हिन्दी अखबारों को देखें तो आपको पता चलेगा कि खबरों में तथ्यों आदि को गोल-मोल कर दिया जाता है और कई बार एक ही बात को घुमा-फिराकर कई बार कहा जाता है. क्योंक? क्योंकि उसे अपनी टीसी-डीसी भरनी होती है. खबर तो वह कभी लिखता ही नहीं.

रही-सही कसर टीवी चैनलों ने पूरी कर दी. टीवी चैनलों ने साबित कर दिया कि न केवल वे निरामूर्ख हैं बल्कि समाज को मूर्ख बनाने का पट्टा भी ले लिया है. ऐसे में नवजात वेब माध्यम पर भी वही सारा कोढ़ हावी हो जाए जो अब तक भाषा को भंग करता रहा है तो फिर रास्ता कहां बचेगा?

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10 Responses for “मीडिया ने भी भाषाघात किया है”

  1. आभा says:

    एकदम सही, जो मै न कह सकी कह दिया ……

  2. चौपटस्वामी says:

    महाराज! बजा फ़रमाया आपने. हिंदी के हम्माम में सब ……… हैं . पर कोई तात्कालिक तकलीफ़ — कोई स्थानीय उत्प्रेरक भी है क्या ? थोड़ा और खुलें तो मामला साफ हो . इस विषय पर सैद्धांतिक चर्चा तो अनन्त काल से हो रही है .

  3. Suresh Chandra Gupta says:

    किसी भाषा पर किसी का एकाधिकार नहीं होता, चाहे वह कवि हो या फ़िर आपके शब्दों में चूतिया. आपके लेख से एक बात तो पता चली कि हिन्दी लेखन में भी गुटबंदी है. हमारे जैसे लोगों के लिए तो भाषा अपनी बात कहने का माध्यम है. पहले अंग्रेजी में कहते थे. अब तकनीकी विकास ने यह सम्भव कर दिया और हिन्दी में भी अपनी बात कहने लगे. अपनी भाषा अपनी होती है. अपनी भाषा में अपनी बात कहना अच्छा लगता है. स्वान्तः सुखाय.

  4. Pramod Singh says:

    सुन रहा हूं. वैसे अपना मानना है हिंदी कुछ मनोभावों, बेचैनियों को ज़ाहिर करने का माध्‍यम हो सकती है, बाज़ार के विस्‍तार के साथ कमाई की हुई ही है, मगर विमर्श की.. माफ़ कीजिए, बंधु, वह मौक़ा शायद हम गंवा चुके हैं, और बहुत पहले गंवा चुके हैं.. वजहों का परतदारपना चाहे इसके, उसके, किसी के जिम्‍मे रहा हो..

  5. Anonymous says:

    sahi kaha aapne. Hindi mein likhne wale aapne ko Mangal grah se aaya hua prani maante hain. Kuch vidhayein to gayab hi hain. Mujhe yaad nahi Hindi mein koi achha thriller maine padha hai ya suspense.
    Hindi ki janta is baat par bahas karti hai ki Premchand kitne Dali samrthak/virodhi ya dono the ki nahi.Lekin ye sab hone ke baad bhi Premchand aaj bhi sabse jyada padhe jaane wale lekhak kyon hai?
    Chandrakanata Santati ke liye logon ne Hindi seekhi thi. Aajkal ke sahityakaron ko wo sab kooda kachra nazar aata hai, lekin hai koi jo aaj waisa kooda likh paya ho?
    Bahar lekhkon ne apne yahan ke mahakavyon par hazaron rachnayein kar daali hai aur hamare yahan isi baat par bahas chalti hai ki Ramchandra sachritra the ya nahi.
    Aisa hi chutiayapa chalne dijiye, thode salon baad Hindi kahan sirf Mumbai ki filmon mein hogi aur wo bhi Roman lip mein likhi hui.

  6. संजय तिवारी says:

    @आभा को शुक्रिया.
    @शुरेश जी को धन्यवाद.

    @ तात्कालिक तकलीफ यह है चौपटस्वामी जी कि सामाजिक बदलावों से हिन्दी बेखबर ही जान पड़ती है इसलिए अनुवादवादी मानसिकता बढ़ती जा रही है. और मैं तो रहता ही हूं प्रकाशकों की मंडी में इसे आप स्थानीय उत्प्रेरक मान सकते हैं.

    @प्रमोद जी, मौका तो गया लगता है लेकिन ऐसे ही रहा तो कोई शिरा पकड़ में नहीं आयेगा.

    @अनाम भाई आपकी पीड़ा जायज है.

  7. masijeevi says:

    बात तो आप ठीक ही कह रहे हैं।

    वैसे देखिए अब आपने शीर्षक बदल डाला वो भी तब जब हमने आपके शीर्षक पर एक पूरी पोस्‍ट लिख डाली। आज ही तो हेडिंग बदलने पर बबाल हुआ था। :) )

  8. संजय तिवारी says:

    और अब साबित हो गया कि ब्लागवाणी पर भी हेडिंग बदल जाती है अगर आप अपने यहां हेडिंग बदलें तो.

  9. apurn says:

    sahi hai masijeevi ji us shirshak pe humne ek post mar di thi :P
    aur humne bhi shishak badal diya

  10. आशीष दाधीच says:

    सही लगा आपका चिट्ठा . यह लेख जो आपने मीडिया की कारगुजारी पे लिखा है. सही हैं जी बिल्कुल सही . यही तो हो रहा हैं, आजकल.

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