योगवशिष्ठ मेरा प्रिय ग्रंथ है. वैसे ही जैसे रामचरित मानस, कबीर के दोहे या फिर सुखमनी साहिब. श्रीमद्भगवगीता बहुत बौद्धिक ग्रंन्थ है. मैं पढ़ता जरूर हूं लेकिन उस अपनेपन के साथ नहीं जैसे रामचरितमानस या फिर सुखमनी साहिब को. श्रीमद्भगवतगीता में बुद्धि विलास और तार्किक विश्लेषण ज्यादा है. गीता में भाव का सिरे से ही अभाव है. अब क्योंकि मैं खुद बुद्धिवादी नहीं हूं इसलिए भी हो सकता है कि गीता में मेरी कोई खास रूचि न हो.
योगवशिष्ठ भाव के साथ सत्य का बहुत तार्किक विश्लेषण करता है. तर्क और भाव दोनों एक साथ योगवशिष्ठ में ही संभव है. और ग्रंथों में यह कहां-कहां है मुझे नहीं मालूम. लेकिन तुलनात्मकरूप से योगवशिष्ठ भगवद्गीता से प्रिय है. क्योंकि यह तर्कबुद्धि का युग है और बहुत सारे बाबाओं ने सत्य को कहने के लिए भगवद्गीता को ही सहारा बनाया इसलिए हमलोग उस ग्रंथ के बारे में ज्यादा जानते हैं. अब तो लोग हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ के बारे में बताना हो तो श्रीमद्भगवतगीता का नाम वैसे ही लेते हैं जैसे ईसाई बाईबिल या फिर मुसलमान के लिए कुरान का नाम लिया जाता है. हिन्दुओं ने भी गीता को अपना प्रतिनिधि ग्रंथ मान लिया है.
जबकि यह धारणा ही गलत है कि कभी मनुष्य का कोई प्रतिनिधि ग्रंथ हो सकता है. असल में तो किताबें भी बाधा ही होती हैं. किताब कुछ संकेत करती हैं और हम किताब पकड़कर बैठ जाते हैं. यह किताबों के साथ सबसे बड़ी बाधा है. फिर किताब पढ़नेवाला सूक्ष्म अहंकार में चला जाता है कि मैंने यह किताब पढ़ी है. क्यों पढ़ा, किताब क्या कहती है यह तो भूल ही गये किताब याद रह गयी. और बुरे में बुरा यह कि उन बातों से प्रयोग ही नहीं किये जिन प्रयोगों के कारण किसी किताब का जन्म होता है.
किताबी ज्ञान बंधन होता है. वह जो सोचा क्या वह लिखा गया? क्या उसे उसके भावों के अनुसार शब्द मिल सके जो उन भावों का प्रतिनिधित्व कर सकें जब आप वह किताब पढ़ें तो. इसलिए मुझे सुखमनी साहिब, कबीर, दादू, बुल्लेशाह ज्यादा प्रिय लगते हैं. वे जो कहते हैं वे बुद्धिवादी तर्क नहीं होते. वह तो रसायनवर्षा करते हैं. यहां होने की बात नहीं करनी है. यहां होना ही है. तर्कों के आडंबर से समझदारी नहीं बनानी है. समझ ही हो जाना है.
इसलिए योगवशिष्ठ मुझे प्रिय है. कल रात में यह श्लोक बहुत प्रिय लगा जिसका मैं यहा उल्लेख कर रहा हूं. वशिष्ठ जी राम से कहते हैं-
संतोषः परमो लाभः सत्संगः परमा गतिः
विचारः परमं ज्ञानं शमो हि परमं सुखम्।।
असल धन या लाभ है संतोष. उस समय आप उच्चतर अवस्था में होते हैं जब आप सत्संग में होते हैं. सदविचार ही परम ज्ञान है इंद्रियभोगों से अनासक्ति परम सुख. इसमें संतोष, सत्संग, सदविचार के साथ-साथ जो क्रांतिकारी बात कही गयी है वह यह कि इंद्रियभोगों से अनासक्ति ही परमसुख है. मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचता हूं वह धन न कमाएं जो संतोष तक न पहुंचाता हो, उन लोगों की संगति न करें परमगति में बाधा बनते हों, वैसे विचारों का साथ छोड़ देना चाहिए जो सत्य के मार्ग में बाधा बनते हों और उन इंद्रियभोग कल्पनाओं से मुक्ति पा लेनी चाहिए जिन्हें अभी तक हम सुख समझते रहे हैं. तभी परम लाभ, परमगति, परमज्ञान और परम सुख को उपलब्ध हो सकेंगे.
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