हम थे वो(हिन्दी) थी, वो थी हम थे
हम थे वो थी और समा रंगीन
समझ गए न
जाते थे जापान (तकनीक की मक्का), पहूँच गए चीन,
समझ गए न,
याने याने गड़बड़ होना ही था.
ओ मन्नू (चीनी) तेरा हुआ, अब मेरा क्या होगा।
गुड़गाँवा जाना हुआ, बाज़ार घूमते एक रेड़ी पर नज़र पड़ी, भीड़ थी मानो कुछ मुफ्त मिल रहा हो। हमारे मित्र ने बताया यह मोबाइल की दुकान है। जी मोबाइल की दुकान, यहाँ चीनी स्मगल हुए सस्ते मोबाइल मिलते हैं। हमने सोचा २-४ ले लेते हैं, कभी बाँटने के काम आ जाएँगे। ४०० – ७०० रू में मोबाइल क्या बुरा है। मोबाइल देखे तो पाया, सारे मोबाइल मूलतह चीनी में हैं, अंग्रेज़ी है मगर टूटी फूटी।
फिर हम पहूँचे एक तमीज़ की मोबाइल दुकान पर, देखना था ये नामी गरामी कम्पनीयाँ क्या कर रही हैं।
सबसे पहले – विक्रेता को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि फोन में क्या-क्या भाषा है। इस से यह समझ आया हिन्दुस्तानी मोबाइल खरीदने वाला सिर्फ अंग्रेज़ी ही चाहता है या उसे पता नहीं कि हिन्दी भी सम्भव है।
नोकिया – हिन्दी, अंग्रेजी़, चीनी।
मोटोरोला – हिन्दी, अंग्रेजी़।
सोनी एरिक्सन – अंग्रेजी़, चीनी।
एल जी – हिन्दी, अंग्रेजी़।
हुआई - हिन्दी, अंग्रेजी़। (मात्र ७०० रू का फोन हिन्दी में)
भारत में आने वाले मोबाइल चीन में बन रहे हैं, तो चीनी इन में है। मगर सबसे बुरा सोनी के फोन देख लगता है, करोड़ो रु दे रितिक रोशन से विज्ञापन करा रहे हैं, मगर अपने फोन में जो यूनीकोड में है, हिन्दी नहीं डालते।
पिछली पोस्ट – सत्तू पिलाई के, ठुमका लगाई ले
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बहुत बढिया मुद्दा उठाया है आपने.
मित्र सत्य लिखा है, और ये चीनी मोबाइल का हाल तो सब जगह है, विषय पे चर्चा तो होना ही चाहिए.