अमित सागर का ईमेल आया तो बात थोड़ी शायराना थी. मैंने सोचा फिर देख लेंगे. दोबारा देखा. तो कोई तारतम्य न बैठता था कि आखिर कौन हैं ये और कहना क्या चाहते हैं? आखिरी पैरे में बात पकड़ में आयी कि उन्होंने मेरी कोई टिप्पणी पढ़ी है और उन बातों ने उनको प्रभावित किया है.
पहली बार लगा कि टिप्पणियां भी अपना असर करती हैं. अमित सागर अब विस्फोटक साथी हैं . दिल्ली में रहते हैं. ब्लाग भी बना ही रखा है इसलिए उम्मीद करनी चाहिए कि वे कभी-कभी लिखेंगे भी.
लेकिन अमित सागर के ऊपर मैं यह सब इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि वे विस्फोट के नये साथी हैं. बल्कि उनकी दो लाईनों की वह कविता बहुत जोरदार है जो उन्होंने ईमेल के साथ मुझे भेजी है. दिल को छूनेवाली वे दो लाईनें बहुत ताकतवर हैं -
जनमानस संबंधित हर आग में मुझे भी झुलसाया जाए,
जिधर से भी प्रवाह हो लपटों का,
आग के उस मसीहा से मुझको भी मिलाया जाए.
अमित भाई विस्फोटक जमात में आपका स्वागत है.
Possibly Related Posts:
- भगवान बुद्ध यह जूठन आपके लिए
- भूख लगे तो अखबार खाइये
- मावलंकर साहब माफ करना
- इंटरनेट हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
- नारायणभाई देसाई, गांधी और गांधी शांति प्रतिष्ठान
तिवारी जी, यह विस्फोटक ब्लॉग अपनी जमात में केवल गोला बारूद से लैस तोपची ही शामिल करता है कि कुछ शांति-सौहार्द्र की गुंजाइश भी है?
सिद्धार्थ जी,क्या आप मानते नहीं कि कई बार जंग शान्ति के लिये लड़ी जाती है तो इधर कुछ वैसे ही शान्तिदूत हैं…..