चार महीने हो गये विस्फोट को एक साईट के रूप में तब्दील किये हुए. 25 फरवरी को वर्तमान साईट पर पहली रपट लिखी थी. इन चार महीनों में सिर्फ थोड़ा बहुत पठनीय सामग्री जुटाने की ही कोशिश करते रहे. और थोड़ी मेहनत की कि साईट देखने में अच्छी लगे. इसलिए चार महीने के आधार पर कोई निश्चित राय कायम करना जल्दबाजी होगी. लेकिन कुछ रूझान मिलने लगे हैं जिससे न केवल विस्फोट जैसी हिन्दी साईटों के भविष्य का अंदाज लग सकता है बल्कि यह भी पता चलता है आज इंटरनेट पर सबसे सक्रिय हिन्दी ब्लागर समूह किस ओर जा रहा है.
सबसे पहले विस्फोट के कुछ नतीजे आपके सामने रखता हूं जिससे हिन्दी के उस स्वरूप का पता चलता है जिससे ब्लागर अपने आप को लगातार दूर रख रहे हैं. विस्फोट पर जो कुछ ट्रैफिक आ रहा है उसका 93 फीसदी सीधे आ रहा है. हो सकता है इसमें कुछ ब्लागर साथी भी हों जो एग्रीगेटर की बजाय सीधे आना पसंद करते हों. शेष 7 फीसदी ट्रैफिक में 3 फीसदी सर्च इंजनों से आ रहे हैं और 4 फीसदी एग्रीगेटरों या ब्लाग पर दिये गये लिंक से आ रहे हैं. सर्च इंजनों में जाहिर है गूगल से सबसे ज्यादा ट्रैफिक आ रहा है जबकि दूसरे नंबर एमएसएन लाईव है. इसके बाद याहू फिर अल्टा-विस्टा आते हैं. जाहिर सी बात है अभी भी यह दावा नहीं किया जा सकता कि केवल सर्च इंजनों के माध्यम से आप हिन्दी की किसी साईट के लिए पर्याप्त ट्रैफिक पा सकते हैं.
अब एग्रीगेटरों से आनेवाले ट्रैफिक के बारे में. एग्रीगेटरों से जो ट्रैफिक विस्फोट पर आ रहा है उसमें पहले नंबर पर ब्लागवाणी है, दूसरे पर चिट्ठाजगत और तीसरे पर नारद है. इसके अलावा विस्फोट के पुराने ब्लाग के जरिए तथा बहुत सारे उन मित्रों के ब्लागों या साईटों से लोग आते हैं जहां विस्फोट का लिंक मौजूद है. लेकिन यह सब मिलाकर कुल ट्रैफिक का मात्र 4 फीसदी बैठता है.
अब मेरे कुछ सवाल हैं. आज से चार महीना पहले केवल ब्लागिंग करते हुए मेरी कुल ट्रैफिक का 60 फीसदी एग्रीगेटरों के जरिए आता था जो अब घटकर 4 फीसदी रह गया है. ऐसा क्यों हो गया? क्या विस्फोट की सामग्री के स्तर में कमी आयी है या ब्लागर हूक्ड मानस के शिकार हो गये हैं. यह हूक्ड मानस ऐसा है जो विवाद और विषाद की ओर सहज ही आकर्षित होता है. तो क्या हिन्दी के सर्वाधिक सक्रिय समूह की दशा-दिशा ठीक कही जाएगी? या फिर पूरी की पूरी ब्लागिंग निजता के ऐसे आवरण में लिपट गयी है जो नहीं छूटा तो कफन-दफन कर देगा. यह गंभीर मुद्दा है. अगर हुक्ड मानसिकता से ब्लागरी को बल मिलता है तो यह ब्लागरी ही नहीं हिन्दी के लिए भी अच्छे संकेत नहीं है.
खैर, यह मेरा अपना अनुभव है और अपने संक्षिप्त डाटा के आलोक में मैंने इसे देखने की कोशिश की है.
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