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हिन्दी पट्टी की समस्या क्या है?

Posted by संजय तिवारी on Jul 8th, 2008 and filed under बात करामात. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

वेब मीडिया नया-नया हिन्दी का माध्यम बन रहा है. धीरे-धीरे उत्पादक और प्रयोक्ता दोनों बढ़ रहे हैं. लेकिन यहां भी हिन्दी पट्टी की वह समस्या हावी है जिसके चलते अन्य माध्यमों में हिन्दी हाशिये पर चली गयी है. वह समस्या क्या है? वह समस्या है मौन समर्थन या फिर विरोध होने पर उपेक्षा. अगर आप संन्यास में हैं तो यह बात ठीक जान पड़ती है कि आप विरोध होने पर भी मध्यमार्ग का सहारा लेते हैं. लेकिन सांसारिक जीवन में जहां चारों से आपको एक भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती हो आप इस तरह के व्यवहार से प्रासंगिक नहीं हो सकते.

आपके होने का प्रमाण देने के लिए आपको अपने आपको अभिव्यक्त करना सीखना चाहिए. अगर वेब-मीडिया को अभिव्यक्त करने के माध्यम के रूप में प्रयोग नहीं किया गया तो तमाम संभावनाओं के बाद भी यह निर्जीव बना रहेगा. हिन्दी ब्लागरी की शुरूआत करते हुए मैं भी इसी मानसिकता से काम कर रहा था कि आपने लिख दिया आपका काम हो गया. अब लोग तो पढेंगे ही. यानी निज आग्रह और विद्वता का पाखंड हमारी रगों में समा गया है. हिन्दी पट्टी के पिछड़ने का एक बड़ा कारण उसकी यह मानसिकता है. इस मानसिकता से बाहर निकले बिना चाहे जो कोशिश हो जाए कुछ खड़ा होनेवाला नहीं.

आपकी सक्रियता से ही आपकी जीवंतता खुलकर सामने आती है. जो समाज और व्यक्ति जितना जीवंत होता है वह उतना ही प्रासंगिक होता है. वेब-मीडिया में सबसे बड़ी सुविधा यह है कि यह संवादमूलक है. यहां एकालाप नहीं चल सकता. पिछले दौर में जो वेब-मीडिया हमारे सामने था वह सूचनाओं के आदान-प्रदान का जरिया मात्र था. अब ऐसा नहीं है. अब यह सूचना देने का नहीं बल्कि सूचना पर बहस, सुझाव और मुक्त समर्थन या विरोध का माध्यम हो गया है. ऐसे में पाठक के सामने बड़ा मौका है कि वह विषयों अपनी मुक्त राय रखें जिससे उस विषय पर जब कोई भूले-भटके आये तो न केवल वह विचार पढ़े बल्कि आपके दिये गये सुझाव भी उसके सामने हों.

हिन्दी पट्टी को अगर वेब-मीडिया भरपूर उपयोग करना है तो यह करना होगा.

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