अमौसी हवाई अड्डे का नाम बदलकर चौधरी चरण सिंह हवाई अड्डा हो गया. क्यों? क्योंकि मनमोहन सिंह सरकार को बचाने के लिए अजीत सिंह ने जो शर्तें रखी थी उनमें एक यह भी थी कि लखनऊ हवाई अड्डे का नाम उनके पिता के नाम पर हो. सब कुछ ठीक रहा तो आज देर शाम एक मंत्रिमण्डल विस्तार भी हो सकता है जिसमें कई लोगों को मंत्री बनाया जा सकता है. उधर मधु कोड़ा ने बयान दे दिया है कि वे शिबू सोरेन के लिए मुख्यमंत्री का पद छोड़ सकते हैं. देवेगौड़ा ने कहा है कि परमाणु करार की ऐसी कोई खास जरूरत नहीं है, यानी वे कांग्रेस के साथ नहीं जाना चाहते. फिर भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनसे बात की है. ऊंट किस करवट बैठेगा पता नहीं. टीआरएस को एक बार फिर मौका मिल गया है और वे तेलगांना राज्य पर ठोस आश्वासन चाहते हैं.
साफ है कि अगले दो तीन दिनों में बहुत कुछ बदलनेवाला है. वामदल वैसी राजनीति के माहिर नहीं है जिसे आजकल राजनीति कहा जाता है. इसलिए उनके खेमे में वैसी कोई खास भगदड़ नहीं मची है, सिवाय इसके कि सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई है जिसमें कहा गया है कि प्रकाश करात और उनकी पत्नी वृंदा करात के पास 200 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है. साफ है कई लोग हैं जो बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहते हैं. जोड़-तोड़ से ज्यादा वामपंथी पार्टियां तमाशा लगागर दर्शक की भूमिका में हैं. खेल तो अमर सिंह जैसे खिलाड़ी खेल रहे हैं.
अमर सिंह जैसे राजनीतिज्ञों के लिए यह अच्छा मौका है. मौके का फायदा उठाते हुए कुछ सौदेबाजी तो कर ही ली है जो उनके व्यावसायिक सखियों को फायदा पहुंचाता है. खबर है कि अब वे सीबीआई में भी अपनी पसंद का निदेशक चाहते हैं. अभी तीन दिन हैं और आनेवाले तीन दिनों में अमर सिंह वह हर सौदा पक्का कर लेना चाहते हैं जिससे उनके व्यावसायिक सखियों को मदद मिलती हो. संभवतः अमर सिंह जानते हैं कि उनके लिए यह चांदनी मात्र चार दिनों की ही है. सरकार बची तो भी दो-तीन महीने का खेल रहेगा और सरकार गयी तो वे तो कहीं के रहेंगे ही नहीं. इसलिए वे ऐसे कई फैसले करवा लेना चाहते हैं जो आनेवाले दिनों में उनके “दलाली” के स्कोप को जिंदा रखे.
भाजपाई तमाशबीन ही बने हुए हैं. उन्हें यह उम्मीद शायद न रही हो कि अमर सिंह जैसे आदमी से भी हमला झेलना पड़ सकता है. इसलिए थोड़ा सकते में हैं और सिर्फ यह कोशिश है कि किसी तरह से अपना वजन कम न होने दिया जाए. प्रमोद महाजन जैसे राजनीतिज्ञों की कमी तो भाजपा में अखर ही रही है. ऐसे मौकों पर प्रमोद महाजन बहुत काम किया करते थे. फिलहाल तो वह उत्साह भाजपा में कहीं दिखाई नहीं दे रहा है जो स्वाभाविक रूप से ऐसे मौकों पर होना चाहिए.
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अच्छी और मज़ेदार पोस्ट है
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