अमर सिंह ने कांग्रेस की ओर सपा को झुकाकर केवल मुलायम सिंह की राजनीतिक इति नहीं की है उनके इस फैसले से मायावती को केन्द्र की राजनीति में जमने का मौका भी दे दिया है. सब इतना तो समझ ही चुके हैं कि तीसरा मोर्चा राजनीतिक रूप से बरसाती मेंढकों के समूह से ज्यादा कुछ नहीं है जो मौके-बे-मौके टर्राने से ज्यादा कोई खास भूमिका नहीं निभा सकते हैं. लेकिन अगर पिछले कुछ सालों की राजनीतिक उठापटक और ध्रुवीकरण देखें तो तीसरे मोर्चे का होना क्षेत्रीय दलों को बड़ी ताकत और सहारा देता है. आप देखिए, जब अमर सिंह को धक्के मारकर सोनिया गांधी के दरबार से निकाला गया था तो तीसरा मोर्चा ही था जिसने सपा को राजनीतिक ढांढस बंधाया. भारत जैसे देश में यह कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है कि राजनीति दो ध्रुवीय हो जाए. यह होना भी नहीं चाहिए.
क्योंकि भारत में जो दल जितना बड़ा हो जाता है उसके स्थानीय सरोकार उतने ही समाप्त हो जाते हैं. ऐसे में थोड़े भ्रष्टाचार और नौसिखिएपने के साथ ही सही क्षेत्रीय दल स्थानीय लोगों के लिए एकमात्र राजनीतिक आशा होते हैं. दुनिया के व्यापारी देश और उनके पैरोकार अक्सर यह कहते रहते हैं कि भारत को लोकतांत्रिक परिपक्वता दिखानी है तो उसे दो दलों की राजनीतिक प्रक्रिया अपना लेनी चाहिए. ऐसा वे इसलिए नहीं कहते कि इससे भारत को कुछ फायदा होनेवाला है. ऐसी बातें इसलिए की जाती हैं कि छोटे दल अक्सर ऐसे व्यापारी देशों का खेल बिगाड़ते हैं जैसा कि अभी परमाणु समझौते के मुद्दे पर हो रहा है.
मायावती को अपने साथ मिलाकर वामपंथी पार्टियां खुश हैं और उन्हें खुश होना भी चाहिए. लेकिन वामपंथियों का साथ पाकर मायावती ज्यादा फायदे में हैं. उन्हें इस बहाने न केवल वामपंथी दलों का साथ मिला है बल्कि दो-तीन दिनों में ही वे तीसरे मोर्चे की अकेली सबसे कद्दावर नेता के रूप में उभर आयी हैं. तीसरे मोर्चे में जो हैसियत कभी अमर-मुलायम की होती थी मायावती उन दोनों हैसियतों को मिलाकर एक हो गयी हैं. संयोग से तीसरे मोर्चे वे अकेली मुख्यमंत्री हैं और उनके साथ सरकारी अमला है. इसलिए आज जब येरन नायडू के घर वे तीसरे मोर्चे की बैठक में पहुंची तो मीडिया ने उन्हें हाथों-हाथ लिया. उनके आने के बाद लगा अब किसी के आने की खास जरूरत नहीं है. यह बात दूसरी है कि उसके बाद भी कई नेता आये जिनमें देवेगौडा के बेटे कुमारस्वामी भी थे. लेकिन मायावती का रौबदाब इस कदर बढ़ा है कि उन्हें उत्तर का जयललिता कहने में भी कोई हर्जा नहीं होना चाहिए.
अभी तक के जो हालात हैं उससे साफ है कि सरकार नहीं बचेगी. अगले कुछ घण्टों में जो राजनीतिक गोटियां बिछायी जाएंगी उससे इस उम्मीद को और बल मिलेगा कि परमाणु समझौते के मुद्दे पर सरकार संसद में विश्वास मत हासिल नहीं कर सकेगी. चौधरी अजीत सिंह को जो आफर कांग्रेस से मिला था उससे बड़ा आफर मायावती ने उन्हें दे दिया. वे अजीत सिंह को आनेवाले लोकसभा चुनावों में आठ सीटें दे सकती हैं. अजीत सिंह के लिए यह ज्यादा फायदे का सौदा है. इसलिए वे तीसरे मोर्चे के साथ चले गये. इसी तरह देवेगौड़ा भी तीसरे मोर्चे के साथ जाने में ही अपनी भलाई देख रहे हैं.
कहा जा रहा है कि विश्वास और अविश्वास के बीच कोई 10-12 मतों का अंतर पड़ रहा है. अगले दस बारह घण्टों में ये दस बारह मत किस ओर जाने का ऐलान करते हैं उससे भी बहुत कुछ तय होगा. हो सकता है कांग्रेसी रणनीतिकारों ने अमर सिंह के दबाव में सीबीआई से दोबारा ताज फाईलों को खोलने का संकेत करवा दिया था लेकिन यह संकेत अब कांग्रेस के लिए ही बहुत भारी पड़ रहा है क्योंकि अब मायावती इस सरकार को गिराने में अपनी पूरी ताकत झोंक रही हैं. अगर सरकार नहीं गिरती है तो आनेवाले कुछ महीने मायावती के लिए भारी सिरदर्द के हो सकते हैं क्योंकि अमर सिंह सीबीआई निदेशक के तौर पर अपनी पसंद का आदमी चाहते हैं क्योंकि 31 जुलाई को वर्तमान सीबीआई निदेशक सेवामुक्त हो रहे हैं. इसलिए मायावती यह सारे प्रयास भले ही राजनीतिक रूप से अपनी सुरक्षा में कर रही हों लेकिन जितना वे कर रही हैं उससे ज्यादा उन्हें मिल रहा है.
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