परमाणु करार के मुद्दे पर सदन का विश्वास मत हासिल करने के लिए आज लोकसभा में शुरू हुई बहस में नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने बहुत निराश किया. उनका भाषण सधा हुआ नहीं था. ऐसा लग रहा था कि उनके पास बोलने के लिए कुछ खास है भी नहीं. वे परमाणु करार के मुद्दे पर सदन में वह उत्तेजना नहीं भर पाये जैसा कि इस मुद्दे पर नेता प्रतिपक्ष से उम्मीद की जा रही थी. अगर यह मान लें कि सरकार सदन में विश्वास मत हासिल नहीं कर पायेगी तो नेता प्रतिपक्ष का यह भाषण आनेवाले लोकसभा चुनाव का केन्द्रीय मुद्दों की झलक भी दे सकता था. लेकिन ऐसे महत्वपूर्ण मौके पर विपक्ष के नेता ने पूरी तरह से निराश किया.
जिन्हें याद है उन्हें याद होगा अटल बिहारी वाजपेयी का वह भाषण जो उन्होंने 13 दिन की सरकार के विश्वास को हासिल करने के लिए सदन में दिया था. वह भाषण आनेवाले चुनावों तक लोगों के जेहन में बना रहा और इसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ. आज नेता प्रतिपक्ष के तौर पर आडवाणी उसका लेशमात्र भी असर नहीं पैदा कर सके. ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री के रूप में पहले ही इस देश में एक गैर-राजनीतिक आदमी काम कर रहा है अब नेता प्रतिपक्ष में भी कोई दम नहीं रहा. हालांकि आडवाणी जी के कुछ सवालों का जवाब देने के लिए आज मनमोहन सिंह ने जो तेवर दिखाया वह आडवाणी से बहुत बेहतर था. लगा कि हां, प्रधानमंकत्री को तो ऐसे ही बोलना चाहिए.
बहुत सारे लोग मानते हैं कि राजनीति भी वैसे ही लोगों के पास होनी चाहिए जैसे ब्यूरोक्रेसी नौकरशाहों के हाथ में है. यह ठीक नहीं है. राजनीतिज्ञ कोई क्लर्क नहीं होता जो बैठकर फाईलें निपटाता रहे. राजनीतिज्ञ लीडर होता है. और उसे लीडर जैसा व्यवहार भी करना चाहिए. परमाणु करार पर चर्चा में भाकपा के मोहम्मद सलीम ने आडवाणी से बहुत बेहतर भाषण दिया. मोहम्मद सलीम के पूरे वक्तव्य को सदन ने बहुत ध्यान से सुना और एकाध बार छोड़कर कोई खास टोका-टोकी नहीं हुईं. जिन तथ्यों, तर्कों और तेवरों की उम्मीद आडवाणी से थी उसे पूरा किया मोहम्मद सलीम ने जो उत्तर कोलकाता से भाकपा के सांसद है. बार-बार सभापति को याद दिलाने के बावजूद कि उनकी पार्टी को केवल 56 मिनट मिला है वे कोई 40 मिनट बोले और अब तक वामपंथी पार्टियों द्वारा जो भी आपत्तियां की जाती रही हैं उसका बहुत सटीक और तार्किक विश्लेषण किया.
आज अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्तित्व की कमी बहुत खल रही थी. वे सदन में नेता प्रतिपक्ष होते तो सदन में बहस का स्तर ही कुछ और होता. अभी तो यह भी पता नहीं कि वे सदन में वोट देने भी आयेंगे या नहीं?
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