मनमोहन सिंह की सरकार बच गयी है. अब वे मुस्कुराते हुए आईएईए में जा सकते हैं. अमरीका से परमाणु करार कर सकते हैं, और देश को सदियों के लिए नरक की भट्टी में झुलसने के लिए झोंक सकते हैं. वे एक ऐसी आग में देश को झोंकने के लिए स्वतंत्र हैं जो एक बार लग गयी तो शायद ही बुझे. संसद में दो दिनों तक बहस हुई. झगड़ा हुआ. फसाद हुआ. लेकिन सारी बहस मुद्दे से दूर अपने-अपने एजण्डों को भुनाने के इर्द-गिर्द घूमती रही. इस पूरी बहस का पटाक्षेप भी एक ऐसे शर्मनाक हादसे से हुआ कि सारी पोल-पट्टी खुलकर सामने आ गयी.
हो सकता है ओमप्रकाश अर्गल ने समय और तरीका गलत चुना हो लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अमर सिंह ने पैसे का बड़ा खेल किया है. भाजपा के ही एक सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह को अमर सिंह पहले ही तोड़ चुके थे. सरकार को विश्वास मत अर्जित करने में कोई चूक न रह जाए इसलिए हो सकता है यह पैसा अमर सिंह ने अर्गल के पास भिजवाया हो लेकिन जैसा कि सदन के बाहर अमर सिंह ने कहा कि अगर वे इतने ही इमानदार थे तो जिस समय पैसा दिया जा रहा था उसी समय मीडिया को बताते, पुलिस में रिपोर्ट करवाते. अमर सिंह सही कह रहे हैं. भाजपा के लोग रणनीतिक रूप से यहां भी चूक गये.
इस पूरे मसले में कई सारी रणनीतिक चूकें हुई हैं. ऐसी चूकों में भाजपा सबसे आगे है. सबसे पहले परमाणु समझौते पर जिन दो लोगों ने आपत्ति उठायी थी उनमें एक वीपी सिंह हैं और दूसरे हैं अटल बिहारी वाजपेयी. अटल जी की आपत्ति के बाद मनमोहन सिंह उनसे मिलने उनके घर गये थे. बैठक में तीन लोग थे. अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और ब्रजेश मिश्र. उस समय जो सहमति बनी थी वह यह कि भारत सरकार भी हाईड एक्ट की तर्ज पर कोई ऐसा कानून बनाए जिससे आनेवाली सरकारें बाध्य हों. इस समझौते के तहत यह भारतीय सेफगार्ड होता. कहते हैं मनमोहन सिंह इस पर सहमत हो गये थे और अटल जी ने भरोसा दिलाया था कि अगर ऐसा होता है तो भाजपा इस समझौते का समर्थन करेगी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यह भाजपा की बड़ी रणनीतिक चूक थी.
अब मनमोहन सिंह ऐसे किसी एक्ट को पारित करने के लिए भी बाध्य नहीं है. वैसे भी उनके ऊपर आरोप है कि वे ग्लोबल सरकार के लोकल प्रधानमंत्री हैं. वे जिन उद्येश्यों को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री बनाये गये थे उनमें से अधिकांश पूरे हो चुके हैं. वे अमरीका से एक ऐसे कृषि समझौते पर भी हस्ताक्षर कर आये हैं जिससे भारत की कृषि नीति अमेरिका की मर्जी से तय होगी. यह समझौता भी उसी वक्त हुआ था जब परमाणु करार पर दोनों सरकारों की आम सहमति बनी थी. लेकिन क्योंकि किसानी कोई ऐसा विषय नहीं है कि उस पर संसद में बहस होती या सरकार को गिराने तक की नौबत आती इसलिए उसकी तो आज तक मीडिया ने चर्चा भी नहीं की.
सरकार विश्वास मत जीत गयी है. सांसदों की मण्डी में उसे 275 सांसदों का समर्थन मिल गया है. लेकिन संसद हार गयी है. संसद हार गयी है कि उसके होने न होने का कोई खास मतलब नहीं रह गया. उसकी बहसों का भी कोई खास मतलब नहीं रह गया है. बहस तो एक रस्म अदायगी मात्र है फैसले तो संसद के बाहर ही हो जाते हैं. इधर संसद में बहस चल रही थी उधर अमेरिका के विदेश उपमंत्री ने बयान दे दिया कि अगर सरकार अल्पमत में भी आ जाती है तो अमेरिका डील से पीछे नहीं हटेगा. बात साफ है. तीसरी दुनिया के देशों की संसद में क्या होता है इसका कोई खास मतलब पहली दुनिया के देशों से नहीं रहता. पहली दुनिया संसदों में जो होता है उसका असर जरूर तीसरी दुनिया के देशों की संसदों पर होता है. भारत की संसद में यही हुआ है. पहली दुनिया के पहले नंबर के देश ने फैसले किये हैं कि परमाणु करार के मुद्दे पर सरकार को रहना चाहिए या नहीं. दुर्भाग्य से अभी भी हम जयचंदों से मुक्त नहीं हैं इसलिए अमेरिका जैसे देश तीसरी दुनिया के देशों में मनमाफिक फैसला कराने में सफल हैं.
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