हम भारतीयों के मन में छोड़ने की मानसिकता बड़ी प्रबल होती है. हम सब जन्म से मृत्यु के बीच लगातार यह सीखते हैं कि आखिरकार सब कुछ छोड़ना है. हमारे आपके बीच में कल ऐसा कौन था जो आज नहीं है और आज जो लोग हैं उनमें से कल कितने लोग रहेंगे? आस पास की घटनाएं परिस्थितियां सब छोड़ने की शिक्षा देती हैं. इसकी विकसित अवस्था है त्याग. कहते हैं सन्यस्त होने के लिए हमें छोड़ने की विकसित अवस्था त्याग का रास्ता पकड़ना चाहिए. इसके लिए हजारों कहानियां, लाखों वाक्य और करोड़ों लोगों की सच्ची झूठी शिक्षाएं. छोड़ो, छोड़ो और छोड़ो.
लेकिन क्या त्याग की यह मानसिकता हमें मोक्ष तक ले जाती है या हमें जीवन और मोक्ष दोनों से दूर करती है? छोड़ते-छोड़ते हम कहां जाएंगे? और ऐसा क्या है जिसे हम छोड़ रहे हैं? बहुत मुश्किल सवाल है यह. ब्रह्माण्ड की इस विराट लीला में हम एक तिनका नया डाल नहीं सकते और एक तिनका इसमें से निकालकर बाहर नहीं कर सकते. जो है जैसा है उसके शोधन और पुनर्शोधन के अलावा हम कुछ नहीं करते. प्रकृति बड़ी है. हमारे आने से पहले वह थी और हमारे जाने के बाद वह रहेगी. उसकी लीला और कला हमारी सोच और समझ से अरब-खरब गुना व्यापक है. हम जो कुछ करते हैं वह चम्मच से समुद्र उलीचने से ज्यादा कुछ नहीं है. वह सब भी इसलिए क्योंकि प्रकृति हमें ऐसा करने का मौका देती है.
इसलिए त्याग की जैसी परिभाषाएं आज भारतीय समाज में टोटा रटंत की तरह विद्यमान हैं उनमें से ज्यादातर दूषित समाज से उपजी कहानियों से ज्यादा कुछ नहीं है. माया और द्वैत के सिद्धांत में उलझने की जरूरत नहीं है. जीवन दीक्षा के प्रयोजन में त्याग इत्यादि की बातें एक हद तक मायने रखती है. बिना इस रास्ते चले यह समझना भी मुश्किल है कि त्याग से बड़ा ढोंग कुछ और नहीं है. लेकिन त्यागने और छोड़ने की बजाय अपनाने और समाहित करने की मानसिकता विकसित करना ज्यादा उच्चतर अवस्था है. इसका मतलब यह नहीं कि आप लिप्त हो जाएं. भोक्ता बन जाएं. भोक्ता भाव ही माया है. समाहित होने की मानसिकता आपको जीवन के ज्यादा उच्चतर मायने समझाती है.
छोड़ने की मानसिकता को छोड़ना बहुत जरूरी है. पकड़ने और पालन करने की मानसिकता सत्य और सनातन है. सब हैं और सब रहेंगे. सबके साथ रहना है और सबको अपने साथ रखना है. और ज्यादा उच्चतर अवस्था तो यह है कि दूसरा कहीं कोई है ही नहीं. सबकी अपनी भूमिका है. देव की भी और दानव की भी. इस देश के प्राणपुरूष राम इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं. बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, महावीर सभी जब तक त्याग करते रहे खाली रहे. सामान्य पुरूष रहे. लेकिन जिस दिन से समग्रता में संसार को पकड़ लिया उस दिन वे संसार के वश में नहीं रहे, संसार उनके वश में हो गया. वे संसार के साथ एकाकार हो गये. वे हवा में हवा का अंश हो गये, जल में पानी की बूंद हो गये, जीवों में आत्मा का अंश हो गये. विराट पुरूष निषेध नहीं करते. वे निषेध का निषेध करते हैं.
भारतीय तंत्र भी यही सिखाता है. तंत्र में कुछ ऐसी साधनाएं होती हैं जिनके बारे में सुनकर घिन आती है. लेकिन यह निम्नतर चेतना के कारण होता है. साधनाओं का लक्ष्य उच्च है. ये सब साधनाएं उस रस के प्रति जागृत करती हैं जो राम में भी है और काम में भी है. इस शरीर में पवित्रतम आत्मा भी है तो मल का संचय भी होता है. और आप दिन-रात दोनों के साथ रह रहे हैं. जब अपने शरीर में हम अच्छे-बुरे दोनों को धारण कर सकते हैं तो समाज में अच्छे को धारण करना और बुरे का निषेध करना कहां से तर्कसंगत है?
Possibly Related Posts:
- भाजपा नेताओं का मक्काः झंडेवालान
- पीने का पानी
- फिर अविनाश डाल पर
- अभिव्यक्ति की चरम अवस्था
- विस्फोट.कॉम को चाहिए निहंग पत्रकार