यह विस्फोट.कॉम के एक नियमित पाठक की टिप्पणी है. दूसरी बार ऐसा हुआ है कि उसी पाठक ने यह शिकायत की है कि विस्फोट संघियों का नया हथियार है. वैसे तो हर आदमी अपना विचार रखने के लिए स्वतंत्र है और किसी भी हालत में उसे रोका-टोंका नहीं जाना चाहिए. लेकिन अगर वह आपकी विचारधारा निर्धारित कर रहा हो तब जरूर मन में आता है कि विचारों का इतना सतही सलरीकरण करनेवालों से बात करनी ही चाहिए. यह सब मैं ब्लाग पर नहीं लिखता अगर टिप्पणी लिखनेवाले ने अपना ईमेल दिया होता. उन भक्त पाठक राजेश ने कभी यह भी उचित नहीं समझा कि कमेन्ट के साथ अपना ईमेल भी लिख देते.
वाद और धारा अच्छी नीयत से निकलती हैं. लेकिन कालान्तर में उनमें दोष आता ही है. इस दोष निवारण के लिए जो निरंतर मंथन और सफाई होनी चाहिए अगर वह न हो तो धारा और विचार दोनों एक समाय के बाद कालबाह्य हो जाती हैं. अक्सर लोग विचार और विचारधारा को एक समझने की गलती करते हैं. धारा की एक उम्र होती है, वाद की एक सीमा होती है लेकिन विचार सनातन होते हैं. और विचार भी कोई दस बीस नहीं होते. विचार तो दो ही होते हैं. नकारात्मक और सकारात्मक. या तो आप नकारात्मक हैं या फिर सकारात्मक. बाकी तो शब्दों का आडंबर होता है जिसे आप जैसे चाहें गढ़ सकते हैं. भारतीय सनातन जीवन दर्शन को आप देखेंगे तो यहां मूल में सूत्र हैं, शास्त्र और भाष्य नहीं. शास्त्र और भाष्य तो आते-जाते रहते हैं. सूत्र बना रहता है.
किसी को संघी, वामपंथी, नक्सली या असली नकली ठहरा देना अपनी वैचारिक शून्यता दिखाता है. यह बताता है कि हम घटनाओं, परिस्थितियों और विचारों का बहुत सरलीकरण करके जीने के अभ्यस्त हो गये हैं. समय बीतता है, समझ बढ़ती है तो धारा और वाद बहुत छोटे होते जाते हैं. आखिरकार सब धाराओं और वादों के मूल में जीव-जगत ही है. अगर जीव-जगत से हम सीधे संपर्क बना सकते हैं तो बीच में किसी धारा या वाद को घुसाने की जरूरत क्या है? अगर आपकी आंखें स्वस्थ हैं तो आप शब्दों को पढ़ने के लिए चश्में का सहारा क्यों लेगें? वे जिन्होंने एक धारा बहायी, वह उनकी अपनी समझ रही होगी. हो सकता है वे चेतना के उच्च धरातल पर रहे हों लेकिन अगर मेरी आंखें सक्षम हैं तो मैं किसी और का चश्मा उधार क्यों लूं?
एक बार मेरे एक मित्र से मैंने पूछा था कि अगर सब विचारधाराओं का अंतिम उद्येश्य आम आदमी का भला करना ही है तो फिर झगड़ा कहां है? इतना विवाद और मारकाट क्यों मचती है? उसने बहुत अच्छा जवाब दिया था. उसने कहा था यह सच है कि सब विचारधाराओं और वादों का अंतिम लक्ष्य आम आदमी का भला ही है लेकिन दिक्कत यह है कि संघी चाहता है कि समाज का वह अंतिम आदमी संघी हो, वामपंथी चाहता है कि समाज का वह अंतिम आदमी वामपंथी हो और समाजवादी चाहता है कि समाज का वह अंतिम आदमी वामपंथी हो. समस्या ठप्पा लगाकर पहचान करने की है. क्योंकि ठप्पा लगा देने से किसी को खारिज करना या स्वीकार करना आसान हो जाता है इसलिए हम अपनी कुंद समझ का नमूना अक्सर देते रहते हैं.
व्यक्ति को व्यक्ति के रूप में समग्रता से स्वीकार करने की कला विकसित करनी चाहिए. इससे खुद अपना बहुत आंतरिक विकास होता है. मेरे मित्र वहीं हैं जो धाराओं से बाहर अपनी धारा बहा रहे हैं. जिनकी अपनी स्वतंत्र सोच समझ है और बात-बात में किसी धारा या वाद का तर्क नहीं देते. धारा और वाद समस्या सुलझाने की बजाय समस्याओं का विस्तार ही करते हैं. आपकी बुद्धि और समझ को कुंद करते हैं. आपका नैसर्गिक विकास रोकते हैं. सत्य सनातन विचार पकड़िये, धारा के चक्कर में रहेंगे तो भंवर से कभी निकल नहीं पायेंगे. मनुष्य जीवन व्यर्थ चला जाएगा. जब तक यह बात समझ में आयेगी तब तक बहुत समय बीत चुका होगा और अगली बार फिर इंसान के रूप में आना होगा कि नहीं कौन जानता है?
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‘वाद समस्या सुलझाने की बजाय समस्याओं का विस्तार ही करते हैं. आपकी बुद्धि और समझ को कुंद करते हैं. आपका नैसर्गिक विकास रोकते हैं. सत्य सनातन विचार पकड़िये, धारा के चक्कर में रहेंगे तो भंवर से कभी निकल नहीं पायेंगे.’ सौ फीसदी सत्य लिखा है आपने।
***राजीव रंजन प्रसाद
Sateek.Bahoot hee sahee.bahut hee theek.bahut aasan hota hai buddhiheen logon dwara tarkheen asahamati kee kheez ko galee bana dena aur hathiyar ke roop me doosare ko brand karna.aksar aise log jigyasuta ke bajay tarkandhatva ka shikar hote hain.vichar kee samajh ke bajai ‘dhara’ ke dalal hote hain. Ab waqt aa gaya hai ki bachav ke bajai aise logon ko benaqab karne kaa.Vaise aap dwara bartee ja rahee shaleenata ko salam!Lekin, “moorakh hridaya na chet jo guru milahin viranchi…….”.
बिल्कुल सही लिखा है आपने। वादों का लेबल चिपकाकर लोगों को अलग अलग खांचों मे डाल देना, और उस वाद को ही उनका एकमात्र यथार्थ बना देना आज का चलन बन गया है।
वर्तमान परिस्थितियों के लिये आपका ये लेख बेहद प्रासंगिक और सटीक है।