मौत जीवन का शास्वत सत्य है. यह बात आपने भी हजार बार सुनी होगी और हमने भी. ऐसा भी नहीं है कि हम मौत के प्रति बहुत उदासीन हैं. रोज-ब-रोज हम अपने आस पास कम होते लोगों को देख रहे हैं. कल जिससे मिले, बातें हुई आगे की योजनाएं बनी आज उनमें से कोई नहीं भी हो सकता है. आज जो हमारे आस-पास हैं उनमें से कल कोई कम हो सकता है. यह सिलसिला तब तक चलता रहेगा जब तक हमारी अपनी आंख बंद नहीं हो जाती. तब तक मिलने-बिछुड़ने का अंतहीन सिलसिला चलता ही रहता है.
लेकिन बचपन में हम जिनके आस-पास बड़े हुए उनके बिछुड़ने की कमी पूरे जीवन महसूस होती है. बचपन की कोमल अवस्था में बुद्धि सिरहाने होती है और हृदय कुलाचें मार रिश्तों की डोर जोड़ता है. हम जिनके बीच बड़े होते हैं वे जब हमारे बीच से चले जाते हैं तो बड़े होकर भी हम कितने असहाय और अकेले रह जाते हैं इसका अहसास आपको भी होता ही होगा. जीवन की आपाधापी इतनी आततायी हो जाती है कि जानेवालों को हम याद भी करें तो कब? नये रिश्तों की बुनावट इतनी तेज है कि उधड़ते धागों की चिंता करने का वक्त ही नहीं बचता. लेकिन क्या वे धागे जो उधड़ गये उनके होने का कोई मतलब ही नहीं था?
रिश्तों की वो डोर जो अब टूट चुकी है उसे मानसिक रूप से जोड़े रखने के लिए पितृपक्ष सर्वाधिक महत्व का मौका है. जो लोग आजकल सोशल नेटवर्किंग के जरिए रिश्तों की डोर को बागडोर बना देना चाहते हैं उन्हें भी इसके बारे में बताना चाहिए. संबंध भले ही दिमाग से बनते हों लेकिन रिश्ते तो दिल से ही बनते हैं. जिन लोगों से मेरे जीवन के कुछ हिस्से जुड़े हैं और दिल से जुड़े हैं उनमें से अगर कोई हमारे बीच नहीं है तो क्या हमें उसे याद नहीं करना चाहिए?
पितृपक्ष का पिण्डदान तो कौवा खा लेता है. लेकिन उसके साथ जिस भाव का हम तर्पण करते हैं उसकी डोर उन यादों से जुड़ती है जिनके सहारे हम बड़े हुए हैं. जिनके सामने हमने सपने बुने आज जब सपने आकार लेने लगे हैं तो उनमें से बहुत सारे लोग नहीं है. आज हमारे सपने पूरे भी हो जाएं तो बताने किसे जाएं? दादी को डींग मारते थे कि देखना एक दिन मैं कुछ करके दिखाऊंगा. दादा की बड़ी सारी अठन्नी-चवन्नी चुराई. आज मैं उनकी अठन्नी-चवन्नी का हिसाब चुकाना चाहता हूं. लेकिन कहां लौटकर जाऊं? पीछे लौटता हूं उनमें से शायद ही कोई बचा हो जिनकी डांट-फटकार ने गलत रास्तों पर जाने से बचा लिया.
वे श्रेष्ठ लोग थे. जीवन को ज्यादा गहराई और अर्थपूर्ण तरीके से समझते थे. मुझे याद है, बचपन में दादा ने एक बार कहा था कि अब कंपनियां ही खेती करेंगी. हम लोग तो मजदूर बना दिये जाएंगे. यह कोई 25 साल पहले की बात है. स्मृति में इतना ही शेष है कि उन्होंने कुबड़हऊ मिसिर से कंपनियों के खेती की बात की थी. उस समय गांव में कोई अखबार नहीं आता था. टीवी नहीं था. फिर इतना साफ और दूरदर्शी विचार कहां से कौंधा होगा? वे कौन से लक्षण रहें होंगे जिनके बल पर वे ऐसी बात कह सके? आज लौटकर जाना चाहता हूं और उन्हें बताना चाहता हूं कि आपने बिल्कुल सही कहा था क्योंकि इस देश के सबसे बड़े कृषि विशेषज्ञ देवेन्द्र शर्मा भी अपने 25 साल के काम के बाद इसी नतीजे पर पहुंचे ही फूड फैक्टरी का जमाना आ रहा है. कंपनियां फूडपार्क बनाने की योजना पर काम कर रही हैं और ग्रामीण आबादी को शहर के शेल्टरों में दबा देने की पूरी योजना तैयार है. कुछ घोषित और कुछ अघोषित.
ऐसे विपरीत समय में जब मैं अपने दादा की वह भविष्यवाणी सच होते देखता हूं तो लगता है मैं उन्हें सीधे जाकर बता नहीं सकता तो क्या हुआ उन दुष्चक्रों के खिलाफ लड़ तो सकता ही हूं जिसे लेकर कोई पच्चीस साल पहले वे चिंतित थे. क्या यह मेरा निजी पिण्डदान नहीं होगा?
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